आज़ादी के बाद राष्ट्रवाद पे राजनीति
हमारे देश भारत को आज़ाद हुए 70 साल हो गए हैं, अब हमारा देश भारत इतना सक्षम है कि प्रलय के दिन तक इसको कोई भी शक्ति तोड़ नहीं सकती! अब राष्ट्रवाद पे राजनीति, सत्ता पाने या सत्ता में बने रहने के लिए अवसरवाद और छलवाद ही है! अब हम कोई एंडरसन की ‘काल्पनिक समुदाय’ (Imagined Community) नहीं और ना ही हरडर और फिशे की सांस्कृतिक समुदाय मात्र है! पिछले सत्तर सालों से हम रूसो वाली संपूर्ण संप्रभु देश हैं और हमारे देश की रक्षा के लिए सीमाओं पे लाखों सुयोग्य, सशत्र और क्षमतावान सैनिक हैं! हम हर प्रकार के आन्तरिक उठापटक और बाहरी आक्रमण से निपटने में पूरी तरह से सक्षम है। आन्तरिक सुरक्षा में भी अगर हमारे राज्यों की पुलिस और विभिन्न विभाग के अधिकारियों को नेता रूपी बाज़ के चंगुल से आज़ाद करा दिया जाए तो इनका भी दुनिया में कोई मुक़ाबला नहीं!
बस हमें राष्ट्रीयता से ज़्यादा भारतीयता अपनाने की आवश्यकता है! भारत तो प्रलय के दिन तक एक और अखण्ड रहेगा, बस शर्त यह है कि हम कैसे भारतीयता (भारत में रहने वाले सभी लोग) को खंडित होने से बचाते हैं! हम एक हज़ार क्या, एक लाख किलो की खिचड़ी बनाएँ परन्तु अगर कोई बच्चा (भारत माता की संतान) भात-भात कहता भूख से अपनी जान गंवा दे तो ऐसी खिचड़ी का कोई औचित्य नहीं! अगर कोई औपचारिक रूप से संगठित भीड़ अगर किसी निहत्थे निर्दोष की जान ले ले और दूसरी भीड़ देखती रहे तो ऐसी भीड़ से देश नहीं चिड़ियाघर बनता है!
यहाँ देश कौन बना रहा है?, कोई धार्मिक स्थल, कोई गाँधी जी के हत्यारे की मूर्ति, कोई अपनी संपत्ति, कोई अपनी जाति, कोई धर्म, कोई संप्रदाय और कोई समुदाय इत्यादि! अगर DNA टेस्ट किया जाए को भारत का अधिकांश मुसलमान दलित ही होगा, फिर भी अगर दलित पे अत्याचार हो तो मुसलमान अपने घर में अफ़सोस करेगा और अगर किसी मुसलमान के साथ हो तो दलित! नेतागण कहीं मिलें या ना मिलें पर चुनाव के समय, मुशायरों और त्योहार मिलन समारोह में ज़रूर मिलेंगे! पर उनकी भी ग़लती नहीं, हम भी तो सामाजिक कार्यकर्ताओं का कितना साथ देते हैं! नेता जब ख़ुद के पैसों या चाटुकारिता से बनेंगे तो वो अपने दल से परे समाज की क्यों सोचेंगे! आज क्या यह संभव है कि किसी ग़रीब का बच्चा बिना पैसा ख़र्च किये चुनाव जीत जाए! यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि जिस समाज ने राजनीति छोड़ी, राजनीति ने उस समाज को कहीं का नहीं छोड़ा! मुसलमान और दलित नेता तो क़रीब-क़रीब हर पार्टी में मिलेंगे (फिर भी दोनों का क्या हाल है यह किसी से छुपा नहीं) पर मुसलमानों या दलितों का आज कोई नेता नहीं जो उनपे हो रहे अत्याचार पे पार्टी से इतर कुछ बोले! राजनीति कोई पर्यटन (टूरिज्म) नहीं कि छुट्टियों में आये और आनन्दित होके चल दिये! हर काम की तरह यह भी एक संवेदनशील काम है परन्तु जब तक पूरा समाज सक्रिय नहीं होगा तब तक राजनैतिक प्राणियों में असंवेदनशीलता बनी रहेगी!
पर अगर इस देश को बचाना है तो हर शोषित को एक साथ अपना धर्म, जाति और संप्रदाय छोड़कर (सामूहिक जीवन से दूर रखकर) सड़क पे आना होगा! और अपनी व्यक्तिगत पहचान को अलग कर देश बचाना होगा! जिस किसी समाज के लोगों ने एक घंटा और एक रूपया प्रति दिन अपने समाज के लिये समर्पित कर दिया उस समाज को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता!
आज अगर राजनीति देश का भविष्य तय कर रही है तो हमें भी आज ही अपनी राजनीति तय करनी चाहिए!हमारे रग में राष्ट्रीयता से ज़्यादा भारतीयता बसनी चाहिये, जिसने भी भारत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ग़ुलामी से आज़ाद कराया और इस देश को अपना कर्म भूमि बनाया वो सभी भारतीय हैं!
अगर भारत माँ है तो यहाँ रहने वाले सभी इसकी संतान हैं परन्तु अगर एक भाई दूसरे भाई को शोषित और वंचित रखना चाहता है तो वो अपनी माँ की नज़र में अच्छा कभी नहीं हो सकता! और जो सभी भाईयों को आपस में लड़ाने वाला वो तो किसी का भी सगा हो ही नहीं सकता, वो तो चाहेगा ही कि सभी भाई आपस में लड़ता रहे ताकि परिवार कभी भी सुखी-सम्पन्न ना बन पाए! वो एक लकड़ी और लकड़ी का गट्ठर और एक उंगली एवं मुट्ठी वाली कहावत तो हम सब ने सुनी है! एक को तोड़ना आसान है पर अगर सब साथ हो तो तोड़ पाना ना मुमकिन!
परिवार का मुखिया अगर घर चला पाने में अक्षम है तो वो सभी भाई को बता दे या सभी भाई एक हो के काम करे और घर ख़ुद चलाये!
लेखक- शाहनवाज़ भारतीय

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