जाति जनगणना की प्रतीक्षा करते असमिया मुसलमान, बांग्लाभाषी प्रवासी मुस्लिमों पर तेज़ हुआ मुस्लिम विरोधी राजनीतिक विमर्श
नई दिल्ली | असम के सात मुस्लिम समुदाय लंबे समय से एक राज्य-स्तरीय जातीय जनगणना की मांग करते रहे हैं, जिससे कि उन्हें बांग्लाभाषी अप्रवासी मुस्लिम आबादी से अलग पहचाना जा सके। अब केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में लिए गए निर्णय के बाद पूरे देश में होने वाली जाति जनगणना से उन्हें बड़ी उम्मीदें हैं।
राज्य सरकार द्वारा इस मुद्दे पर ठंडी प्रतिक्रिया देने के बाद, स्थानीय असमिया मुस्लिमों का मानना है कि जाति जनगणना उनके पहचान की रक्षा के प्रयासों को मज़बूती देगी। जुलाई 2022 में असम की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने ब्रह्मपुत्र घाटी के गोरिया, मोरिया, देशी, सैयद और जुलाहा, तथा बराक घाटी के किरेन और माइमल मुस्लिम समुदायों को “स्वदेशी समुदाय” के रूप में मान्यता देने का निर्णय लिया था।
हालांकि, एक सटीक जनगणना कराने की चुनौती के कारण राज्य सरकार अब तक इनके मुद्दों को प्रभावी रूप से संबोधित नहीं कर सकी है। दूसरी ओर, बांग्ला भाषी मुसलमानों, जिन्हें आमतौर पर ‘मियाँ’ कहा जाता है और जिन्हें अक्सर बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासी बताया जाता है, को असम की पहचान और संस्कृति के लिए खतरा बताया जाता रहा है।
बांग्लाभाषी मुसलमान वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा निष्कासन, घृणास्पद भाषणों और सोशल मीडिया पर धमकियों का सामना कर रहे हैं। भाजपा सरकार विशेष रूप से बंगाली मुसलमानों को निशाना बना रही है और इन तनावों का लाभ उठाकर उन्हें राज्य से बाहर करने की कोशिश कर रही है।
असम में मुस्लिम विरोधी भावनाएं कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन भाजपा और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की अगुवाई वाली दक्षिणपंथी सरकार ने इस भावना को और बढ़ावा दिया है। 2021 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से सरमा अपने मुस्लिम विरोधी बयानों को लेकर कई बार सुर्खियों में आ चुके हैं।
राज्य में बढ़ते तनाव के बीच, सदौ असम गोरिया जातीय परिषद के अध्यक्ष मोइनुल इस्लाम ने कहा कि केंद्र सरकार को जातीय जनगणना की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए, क्योंकि राज्य के समुदायों को अपनी पहचान खोने का गंभीर खतरा है।
इस्लाम ने तेजपुर (उत्तर असम) से मीडिया को बताया कि, “स्वदेशी मुसलमानों को बांग्लाभाषी मुसलमानों के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, जो बांग्लादेश या पूर्वी पाकिस्तान से असम आए थे। हम भाषाई और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर अलग हैं। हमारी पहचान की रक्षा का पहला कदम है समुदाय की एक सटीक जनगणना”।
इस्लाम ने कहा, “हमारे आकलन के अनुसार, गोरिया समुदाय की जनसंख्या करीब 10 से 11 लाख है। लेकिन कुछ लोग इसे उससे भी अधिक बता रहे हैं। कई बंगाली मुसलमान, जिन्होंने असमिया सीखी है या हमारे समुदाय में शादी की है, अब खुद को गोरिया बताने लगे हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए जनगणना कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण देना चाहिए कि बंगाली मुसलमान खुद को असम का मूल निवासी मुस्लिम न बता सकें।
इन मुस्लिम समुदायों ने या तो इस्लाम अपनाया था या वे 13वीं सदी में असम में मुग़ल-अहॉम युद्धों में युद्धबंदी बने थे। लेकिन विभाजन के बाद बंगाली मुसलमानों की बढ़ती आबादी ने उनकी पहचान को लेकर चिंता पैदा कर दी है।
परिषद के प्रचार सचिव राजीब चौधरी ने कहा, “हम मांग करते हैं कि एक उचित जाति जनगणना के बाद असमिया मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में शामिल किया जाए और उन्हें शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण दिया जाए, जैसे अन्य स्थानीय समुदायों को मिलता है।”
मुख्यमंत्री सरमा पहले ही एक जाति जनगणना की घोषणा कर चुके हैं, जिससे स्वदेशी मुस्लिम समुदायों की अलग पहचान सुनिश्चित हो सके। यह क़दम मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ चर्चा और विभिन्न विकास के पहलुओं पर रिपोर्टों की प्रस्तुति के बाद उठाया गया था। राज्य सरकार ने एक व्यापक जाति जनगणना कराने की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं।
सरमा ने कहा था कि ये सात समुदाय लगातार यह कह रहे हैं कि भले ही इस्लाम उनका धर्म हो, लेकिन उनकी जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक विशेषताएं उन्हें प्रवासी मुस्लिम आबादी से अलग बनाती हैं। उन्होंने कहा, “इन समुदायों ने अपनी विशिष्ट परंपराओं, बोलियों और ऐतिहासिक कथाओं को संरक्षित रखा है, जो असम की सभ्यतागत विरासत और सांस्कृतिक परिदृश्य में गहराई से जुड़ी हुई हैं।”
स्वदेशी मुसलमानों की संख्या राज्य की मुस्लिम आबादी का लगभग 37% मानी जाती है, जबकि शेष 63% बांग्ला भाषी प्रवासी मुसलमान हैं। जातीय जनगणना की यह पहल राज्य की विविधता को पहचानने और संरक्षित करने की प्रतिबद्धता का प्रमाण मानी जा रही है।
जहां राज्य स्तरीय जनगणना अब तक नहीं हो सकी है, वहीं आगामी राष्ट्रीय जनगणना में प्रस्तावित जातीय जनगणना स्वदेशी मुस्लिम समुदायों के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। इससे उन्हें औपचारिक पहचान मिलने की संभावना है और वे अपनी विशिष्ट पहचान के साथ जी सकेंगे। यह समावेशिता को बढ़ावा देने, सांस्कृतिक संरक्षण सुनिश्चित करने और इन समुदायों की आवाज़ को सुनने व उनके योगदान को मान्यता देने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
हालांकि, मियाँ मुसलमानों को भाजपा सरकार की ओर से विभिन्न तरीकों से निशाना बनाया जा रहा है। राज्य सरकार ने बांग्ला भाषी निवासियों पर कामरूप ज़िले के जनजातीय ब्लॉक और बेल्ट में अवैध रूप से ज़मीन कब्ज़ाने का आरोप लगाया है, जो विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित हैं। हाल ही में लगभग 151 परिवारों को बेदखल कर दिया गया और कई ढांचों को ध्वस्त कर दिया गया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प में दो लोगों की मौत हो भी हुई।
इसी तरह के निष्कासन अभियान गोलपारा ज़िले के आरक्षित वन क्षेत्र में चलाए गए, जिसमें लगभग 450 परिवार विस्थापित हुए। जैसे-जैसे असम 2026 के आगामी राज्य विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने बंगाली मुसलमानों को निशाना बनाना और तेज़ कर दिया है।
चूंकि धार्मिक ध्रुवीकरण पहले के चुनावों में भाजपा की रणनीति का हिस्सा रहा है, इसलिए आने वाले दिनों में इसके और अधिक बढ़ने की आशंका है। सरमा ने बंगाली मुस्लिम मज़दूरों को सुरक्षा देने के बजाय चेतावनी तक दे डाली है कि वे स्थानीय असमिया आबादी की सहमति के बिना ऊपरी असम में नहीं जाना चाहिए।
courtesy:hindi.indiatomorrow.net

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