किशोरों की अवैध हिरासत और यातना के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार को हलफनामा दायर करने का आदेश दिया है। याचिका में सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान किशोरों की अवैध हिरासत और यातना का आरोप लगाया गया है। 

याचिकाकर्ता एनजीओ का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, सौतिक बनर्जी और तन्मय साध ने किया। प्रतिवादी राज्य का प्रतिनिधित्व सरकारी अधिवक्ता द्वारा किया गया था।

मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (जेजे एक्ट) के साथ सांविधिक अनुपालन के संबंध में सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

खंडपीठ ने कहा कि हम यूपी राज्य से प्रतिक्रिया उचित समझते हैं। अधिनियम, 2015 के प्रावधानों के आवेदन के संबंध में सरकार को राज्य के सभी जिलों से संबंधित सभी विवरणों को दर्ज करना है। 

खंडपीठ एक गैर सरकारी संगठन यानी एचएक्यू सेंटर फॉर चाइल्ड राइट द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी,  याचिका में उनके द्वारा तैयार की गई फैक्ट फाइडिंग रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया गया था कि सीएए के विरोध प्रदर्शन को रोकने की प्रक्रिया में कई नाबालिग थे। उत्तर प्रदेश  में पुलिस द्वारा हिरासत में लिया गया और प्रताड़ित किया गया।

रिपोर्ट “Brutalizing Innocence-Detention, Torture and Criminalization of Minors by UP police to quell anti - CAA protests” शीर्षक के साथ पहली बार 31 जनवरी 2020 को प्रकाशित हुई थी। इसमें कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस की कार्रवाई की गंभीरता बच्चों के शोषण में सबसे अधिक दिखाई देती है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विधानों के बावजूद 41 नाबालिगों को हिरासत में लिया गया है।

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