मुकेश भारद्वाज : अभी आपने जो कदम उठाया है, उससे क्या आपको यह खौफ नहीं रहा कि राजनीति में आपके लिए रास्ता बंद भी हो सकता है?
अली अनवर : बिल्कुल खौफ लगा कि मैं अलग स्टैंड ले रहा हूं तो पार्टी मुझे निकाल सकती है। पार्टी मुझे तीसरी बार संसद में नहीं भेज सकती है। मैं नीतीश कुमार जी के बहुत करीब था और पहली बार 2005 में चुनाव में पूरे बिहार में उनके साथ घूम कर प्रचार किया। फिर 2006 में उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद मैं राज्यसभा में आया। तबसे उनके साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध रहे हैं।
मनोज मिश्र : पहले भी आप भाजपा के साथ चुनाव लड़े, उसके साथ नीतीश जी ने सरकार चलाई, फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि आपको इतने कड़े कदम उठाने पड़े? ’उस समय की भाजपा मोदी जी की भाजपा नहीं थी। दूसरी चीज कि पंद्रह सालों तक जो लालू यादव ने किया था, उसमें हम लोगों ने महसूस किया कि बदलाव होना चाहिए। लालू जी के समय में बिहार में एक अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। पूरे बिहार में लोग बदलाव चाहते थे। उन्हीं दिनों मैंने पसमांदा मुसलमानों की स्थिति को लेकर एक संगठन बनाया था- बिहार पसमांदा मुसलिम महाज। उसके कारण मुझसे लाखों लोग जुड़ गए थे। बाद में हमारे संगठन के काम को इतनी सराहना मिली कि देश भर से लोग जुड़ने लगे और उसे अखिल भारतीय मंच बनाना पड़ा। उसका नाम हो गया आल इंडिया पसमांदा मुसलिम महाज। उस संगठन की मांगों को पूरा करने का नीतीश जी ने भरोसा दिलाया था। इस तरह हम लोगों ने उनका समर्थन किया और मैं उनके और करीब आ गया। उस समय की भाजपा इतनी उग्र, इतनी आक्रामक नहीं थी। ऐसा नहीं कि उनकी विचारधारा को हम लोग मानते थे, नीतीश जी ने साफ कहा था कि उनके एजंडे को नहीं चलने देना है। हम अपने एजंडे पर काम करते थे। नीतीश जी का कहना था कि देखिएगा, भाजपा बदल जाएगी। उन्होंने कहा कि जब भाजपा को मुसलमानों का वोट मिलने लगेगा तो मुसलमानों के प्रति उसकी आक्रामकता खत्म हो जाएगी। हमारा भोला मन इस बात पर यकीन कर गया कि ऐसा हो जाएगा।
सूर्यनाथ सिंह : नीतीश कुमार ने जब भाजपा के साथ जाने का फैसला किया तो क्या आप लोगों को इसकी भनक नहीं थी?

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