स्कूलों ने जब टीचरों का वेतन आधा से भी कम कर दिया तो फीस कम क्यों नहीं कर रहे हैं ?
अभिभावक इस के खिलाफ छेड़ेंगे अभियान या इस ज़्यादती को यूँ ही सहते रहेंगे ?
By Aaditya Kanchan
पूरे देश में महामारी का दौर चल रहा है। लोगों के व्यवसायों में लगातार घाटा हो रहा है, उसी बीच हमारे देश के कई शिक्षण संस्थान, नामी स्कूल कॉलेज अपना धंधा करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। लगातार पूरी फीस मांगने में पीछे नहीं हट रहे हैं। जबकि कोरोना के बहाने टीचरों का वेतन आधे से भी काम कर दिया है।
स्कूलों और कॉलेजों वाले नहीं दे रहे फीस में छूट
ऑनलाइन शिक्षा ने सबका काम आसान बना दिया है लेकिन कॉलेज वाले और स्कूल वाले ज़बरदस्ती पूरी फीस वसूलने का कार्य कर रहे हैं एवं तरह-तरह की बातें भी हो रही हैं। जब बात आती है स्कूल जाने की तो कोरोना के कारण स्टूडेंट्स क्लास अटेंड करने के लिए शिक्षण संस्थान नहीं जा रहे हैं, घर से ही काम कर रहे हैं और शायद अध्ययन में रुकावट ना आए इसलिए ऑनलाइन पढ़ाई की ज़रूरत पड़ रही है।
इसका फायदा यह हुआ है कि बच्चों की पढ़ाई कम-से-कम रुकी नहीं है। हां, कुछ तबके ऐसे हैं जिन्हें डिजीटल डिवाइड के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है लेकिन दूसरी तरफ तमाम स्कूल और कॉलेज प्रशासन को अपनी मेंटेनेंस पर ज़्यादा खर्चा नहीं करना पड़ा है। जब तक ऑनलाइन क्लासेज़ चल रही हैं, फीस में छूट देनी चाहिए क्योंकि ज्यादातर स्टूडेंट्स अपना ही इंटरनेट यूज़ कर रहे हैं।
फीस कम करो ना
जब तमाम स्कूलों और कॉलेजों आदि द्वारा ऑनलाइन क्लास की घोषणा की जाती है तो इंटरनेट का पैसा हमारी जेब से क्यों जाता है? यहां तक कि कुछ कॉलेज वाले इतने शातिर हैं कि वे आज भी लाइब्रेरी से लेकर कैंटीन की फीस आदि अन्य चार्जेज़ भी ले रहे हैं, जो कि गैर-कानूनी है। कोरोना के बहाने टीचरों का वेतन आधे से भी काम कर दिया है।
महामारी के कारण सबकी जेब पर काफी ज़्यादा असर हुआ है। लोगों की सैलरी भी कट रही है, जिसका नतीजा हम लोग देख सकते हैं। हाल के कुछ दिनों में स्कूल और कॉलेज भी अपनी फीस ले रहे हैं लेकिन कई कॉलेज और स्कूल हद से ज़्यादा फीस मांग रहे हैं। समस्या फीस मांगने में नहीं है, समस्या हद से ज़्यादा पैसा लेना है।
कई जगह ऐसा भी हुआ है कि स्कूल पर टीचर्स को नौकरी से भी निकाल दिया गया है। अर्थात बेरोज़गारी की परिस्थिति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में कॉलेज प्रशासन को फीस तो लेनी चाहिए लेकिन इतनी भी नहीं जिससे मध्यमवर्ग के परिवार कंगाली में आ जाए।शैक्षिक संस्थानों को अपने स्वार्थ से बाहर निकलना होगा
देश में ऐसे भी किस्से हैं कि स्मार्टफोन खरीदने के चक्कर में एक किसान को अपनी गाय बेचनी पड़ी ताकि उसके बेटे को ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त हो सके। अर्थात जब भी महामारी का समय चल रहा है तो कॉलेज और स्कूल प्रशासन को और बेहतर तरीके से मैनेज करने के तरीके को अपनाना चाहिए जिससे दोनों को आर्थिक क्षति ना पहुंचे।
जिस समय स्कूल और कॉलेज प्रशासन को एक विद्यार्थी और माँ-बाप का सबसे ज़्यादा साथ देना चाहिए था, उस समय भी देश में ऐसे तमाम शिक्षण संस्थान सिर्फ अपना प्रॉफिट देख रहे थे। कई माता-पिता विवश हो गए होंगे कर्ज़ लेने के लिए।
बच्चे तो बच्चे शिक्षकों पर भी गहरा असर पड़ रहा है। कुछ शिक्षण संस्थान ऐसे भी हैं जो लगातार पांच से 6 घंटों की क्लास कर रहे हैं। इसमें कई बच्चों को इंटरनेट की सुविधा एवं कईयों को पीठ दर्द और आंखों में समस्या जैसी भी तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है।ऐसे भी कई दृश्य सामने आए हैं। शिक्षकों की सैलरी भी काटी गई है और उनसे ज़बरदस्ती काम भी कराया जा रहा है।अधिकांश को नौकरी से निकाल दिया गया।

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