ये तस्वीर क्या कहती है ?

वैसे मैं राजनीतिक टीका टिप्पणी और कहा सुनी से दूर रहता हूं लेकिन वर्तमान भारतीय राजनीति को देखकर आपके समक्ष एक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा हूं जो हमें एकजुटता, सहयोग और समन्वय की राह दिखाने के लिए काफ़ी हैं!

देश के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन नरसिम्हाराव अपने साथ पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर का हाथ पकड़कर चलते हुए और फिर अटलबिहारीवाजपेई जो उस समय विपक्ष के नेता थे वो चन्द्रशेखर का हाथ पकड़े हुए।

आज इन तीनों पूर्वप्रधानमंत्रीयों की तस्वीर वर्तमान भारतीय राजनीति से सवाल पूछ रही है कि क्या वर्तमान सत्ता और विपक्ष के आचरण ऐसे ही हैं. सत्ता और विपक्ष के बीच एक और पक्ष होता है वो निष्पक्ष कहलाता है जिसका निर्वाह हमारे गुरु पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने जीवन भर किया।

आज ज़रूरत है कि वैचारिकमतभेदों के बावजूद हम सभी देश दुनिया के सामने एक मिली जुली तस्वीर पेश कर सकें ताकि हमारी नईपौध ( पीढ़ी) सहमति और समन्वय के मूलमंत्र को अपनाकर देश की तरक्की में अपनी क्षमता, योग्यता ,बुद्धि ,विवेक और परिश्रम का सदुपयोग कर सके।

आज भारतीय राजनीति टकराव, कटुता और नफरत के ईद गिर्द घूम रही है। जहां सत्ता पक्ष की नीतियों का विरोध करना अपराध माना जाने लगा है। सत्ता के लोग संवाद और जनसरोकार के मुद्दे पर समन्वय स्थापित करने को अपना अपमान समझने लगे हैं, वहीं सरकार की नीतियों पर जनता की असहमति व्यक्त करने को विपक्षी दल मात्र विरोध के लिए विरोध करने पर विवश है।

सत्ता और विपक्ष में बढते टकराव को कम करने और सबको मिलकर टीम इंडिया के रुप में काम करने के लिए प्रेरित करने वाली निष्पक्ष शख्सियत का अभाव साफ़ दिखाई दे रहा है। चाटुकारिता, जी हुजूरी और अपने अपने सियासी आकाओं को खुश करने की होड़ लगी हुई है।
ऐसे में ये तस्वीर हमें एकजुट होकर काम करने की दिशा में सोचने के लिए राह दिखाती है।

तमाम वैचारिक मतभेद होने के बाद भी पहले इतनी गिरावट नहीं थी जो आज है। मतभेद को मनभेद की संज्ञा देने का नापाक कार्य हमारे लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति के साथ अशुभ है। वैसे जिस स्कूल का विद्यार्थी रहा हूं वहां सहयोग, सहमति, समन्वय, स्वदेशी और स्वालंबन को भारत की खुशहाली और तरक्की का मूलमंत्र बताया गया था जिसको आत्मसात करके हमारे जैसे कईयों ने अपना जीवन इसी उद्देश के लिए खपा दिया।

 

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