अमेरिका में बोलने की आजादी की सच्चाई

 

अमेरिका में जार्ज फ्लॉयड की मौत को लेकर विरोध प्रदर्शन अब भी जारी हैं, जिससे नस्लीय भेदभाव की समस्या पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है। बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों से अमेरिका में बोलने की आजादी की सच्चाई लोगों के सामने आई है।

 
ब्रिटिश अखबार द गार्जियन के विश्लेषण से जाहिर है कि 26 मई से 2 जून तक 148 पत्रकारों को विरोधी प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करते समय गिरफ्तार किया गया या उन पर हमला किया गया है। कई संवाददाताओं ने अपनी हैसियत दिखाई, लेकिन पुलिसकर्मियों ने फिर भी उन पर हमला किया। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गठित समिति अमेरिका का एक एनजीओ है।

इस समिति ने यह भी कहा कि सिर्फ एक हफ्ते में पत्रकारों पर हमले करने के 300 से अधिक मामले दर्ज हुए। अमेरिका में संवाददाताओं के खिलाफ इतनी ज्यादा हिंसक घटनाएं चौंकाने वाली हैं।


आपको बता दें, सीएनएन के संवाददाताओं को रिपोर्टिंग करते समय पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया, फॉक्स न्यूज के संवाददाताओं पर प्रदर्शनकारियों द्वारा हमला किया गया, एनपीसी के संवाददाताओं पर पुलिस द्वारा काली मिर्च का छिड़काव किया गया, फोटोग्राफर की आंखें रबड़ की गोली का निशाना बनीं। अमेरिकी पत्रकारों के अलावा, अन्य देशों के पत्रकार भी नहीं बच गए।

ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, नॉर्वे, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा के संवाददाताओं पर भी नुकसान पहुंचा। जब ऑस्ट्रेलिया के संवाददाता लाइव प्रसारण कर रहे थे, तब पुलिस ने जोर से फोटोग्राफर को मारा। लाइव कार्यक्रम में आधे मिनट तक बाधा पैदा हुई।

क्या यह बोलने की आजादी है? अमेरिकी राजनीतिज्ञ हमेशा से बोलने की आजादी और प्रेस की आजादी को अमेरिका का बुनियादी सिद्धांत बताते हैं, तो संवाददाताओं पर हमला करने की घटना निस्संदेह बड़ी विडंबना है।


अमेरिका में महामारी फैलने के बाद अमेरिकी राजनीतिज्ञ झूठ बोलने से खुद की जिम्मेदारी से बचते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रतिस्पर्धा पर कालिख पोतने से नागरिकों का ध्यान बांटते हैं। बोलने की आजादी अमेरिका के लिए अन्य देशों, विशेषकर चीन पर हमला करने का हथियार बन गई है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट की थी कि न्यूयॉर्क में कोरोना वायरस के मामले यूरोप से आए हैं। रिपोर्ट में दसेक विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि अगर सक्रिय कदम उठाए, तो अमेरिका और जल्दी से वायरस का पता लगा सकता है।

लेकिन यह रिपोर्ट चीन पर जिम्मेदारी लादने के व्हाइट हाउस के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है, इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी आलोचना की। इंटरव्यू लेते समय ट्रंप बहुत अभिमानी हैं और अकसर संवाददाताओं की निंदा करते हैं। अमेरिकी राजनीतिज्ञों की कार्रवाई से लोगों को और स्पष्ट से अमेरिका में बोलने की आजादी की सच्चाई समझ में आई।


एक तरफ अपने देश में पत्रकार पर हमला करता है और मीडिया पर दबाव डालता है, दूसरी तरफ दुनिया में दूसरों पर झूठे आरोप लगाता है और कालिख पोतता है। क्या यह बोलने की आजादी है? 

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