आज फिर जय प्रकाश वाले आंदोलन याद आ गये

इस जीत के लिय अपने आप को कुरबान कर देने की जिद्द थी,मिट जाने की जिद्द थी,जीत जाने की जिद्द थी

 

गजनफर इकबाल 

आज फिर जय प्रकाश  वाले आंदोलन  याद आ गये,आजादी के बाद 1972 का जेपी आंदोलन और उसके बाद यह किसान आंदोलन दोनों ही इतिहास में दर्ज रहेंगे  ,जेपी आंदोलन भी करीब दो वर्षों तक चला था,और आपातकाल लगने तक जारी था,दोनों ही आंदोलन मुख्य रूप से प्रधानमंत्री के खिलाफ ही थे,इंदिरा सरकार में भ्रष्टाचार को लेकर और यहाँ किसान विरोधी बिल को लेकर ,सरकार किसानों को आंक नही पाई .

शायद यह बिल बहुत जल्दबाज़ी में बना दिया गया या युं कहें कि किसानों की शक्ति और एकजुटता को समझने में भूल हो गई,तो कया यह मान लिया जाये के दोनों सदनों के सांसदों ने क्रषि बिल को मंजूरी देते समय किसानों के हित को अंदेखा किया,बगैर बहस के महज एक दिन में ही बिल को मंजूरी मिल गई,नीति आयोग भी बिल के ड्राफ्ट का ठीक से न ही सपषटिकरण कर पाया और ना ही क्रियान्वित करने की रूपरेखा तैयार कर सका,बिल के ड्राफ्टिंग करने वालों ने  राष्ट्र के सबसे व्यापक और पारम्परिक उद्योग और किसानों की मूल संरचना को समझने में भूल कर दी,बिल 2019.में ही पास होकर कानूनी रूप ले चुका था,विरोध और कोरोना के कारण अमल में नही आया था,क्रषि प्रणाली ,बाजारीकरण और औधोगीकरण को जबरदस्ती किसानों पर थोपने का प्रयास किया गया.

यह सब तब हुआ जब देश बहुत बडी आर्थिक और मौद्रिक मंदी से गुजर रहा था,विपक्ष इतना बिखरा हुआ ,कमज़ोर,और अल्पमत में था के महज़ वह राजयों में किसी भी तरह सरकार के गठन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के फिराक में था,या कुछेक तो अपना अस्तित्व बचाने के लिये बडे़ पार्टियों से हर सम्भव समझौता करने को मजबूर था,अंतराष्ट्रीय सीमाओं पर तनाव बरकरार था,देश जटिल परिस्थितियों से गुजर रहा था.

आम आदमी तो महंगाई और कोरोना काल की आपदाओं से निपटने की जद्दोजहद में लगा था,मीडिया इंडस्ट्री भी समझौते कर रही थी ,मतलब किसान बिलकुल ही अकेला पर चुका था इस लड़ाई में ,लेकिन बात अपने अस्तित्व की थी,बात अपने हक और पुरखों की विरासत की थी,एम एस पी की गारंटी की थी,बात दाल-रोटी और पेट की थी,लड़ाई स्वभाविक थी,आंदोलन तय था,जिस लड़ाई में जानें भी गई,मुकदमे भी हुए और भाड़ी आर्थिक क्षति भी हुई

मतलब इस जीत के लिय अपने आप को कुरबान कर देने की जिद्द थी,मिट जाने की जिद्द थी,जीत जाने की जिद्द थी,बगैर किसी राजनैतिक संरक्षण के आंदोलन विकराल होता जा रहा था,छिटपुट हिंसा भी हो रही थी,आंदोलन में भले ही तीन चार राज्य के किसान ही मुख्य रूप से शामिल थे लेकिन इनको जनसमर्थन हासिल था,महिलाओं की भी भुमिका रही,बच्चे और युवा भी शामिल थे,अंततः किसान जीत गये.

सरकार को बिल वापस लेने को मजबूर होना पडा,आगामी चुनाव जीतने को महज ऐसा नही किया गया बल्कि किसानों के इस लंबे समय तक चले अभियान रूपी आंदोलन की वजह से हुआ जिसका आगे भी राजनीति प्रभाव देखा जायेगा ,दशकों तक इसकी वयाख्या की जायेगी ,सरकारों को भी बिल ड्राफ्ट करते समय बहुत कुछ समझना होगा ,खैर यह जीत किसानों की जीत है जिसका पूरा देश अभिनंदन करता है,

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