हमारे बीच के कट्टरपंथियों को बाहर निकालने का समय
डॉक्टर एम जे खान , अध्यक्ष, इम्पार
सत्य हिंदी डॉट कॉम में प्रसिद्ध पत्रकार कमर वहीद नकवी का एक लेख पढ़ रहा था, जो उनके हालिया ट्वीट्स की एक श्रृंखला का संकलन है।मैं उनके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ कि मुस्लिम समाज को जो करने की आवश्यकता थी हम उसके ठीक विपरीत अभी तक करते आये हैं।
सांप्रदायिक राजनीति और सांप्रदायिक पार्टियों को कोसना और फिर भी जानकार या अहमकाना हरकतों से उन्हें ही मजबूत करने के लिए अब तक कार्य करते रहे हैं।
दीर्घकालिक राजनीतिक योजनाओं की कमी, सक्षम और प्रतिबद्ध नेतृत्व की अनुपस्थिति और कमजोर, भ्रष्ट और जातिवादी नेताओं पर एक तरफ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर निर्भरता और दूसरी ओर धर्म की हमारी समझ को अर्ध-साक्षर और संकीर्ण दृष्टि वाले मौलवियों को गिरवी रखना काफी महंगा पड़ा है।
समय तेजी से बदल रहा है। यह धारणा बनती जा रही है कि मुसलमान बहुसांस्कृतिक समाज में रहने के लायक नहीं हैं। दक्षिणपंथी लोग या दूसरे क्या कर रहे हैं, इस लिए हम भी वैसा कर सकते हैं, हमारे इस तर्क को बाजार में अब कोई लेने वाला नहीं है। हमारे उलेमा की संकीर्ण विश्वदृष्टि और आध्यात्मिकता से ज्यादा कर्मकांड पर भारत के मुसलमानो को चला कर समुदाय के एक बड़े हिस्से को लगभग अंधा कर दिया है। नहीं तो टीवी डिबेट के लगभग दो हफ्ते बाद अचानक हुई हिंसा को कैसे जायज ठहराया जा सकता है?
नरमपंथियों के विशाल बहुमत के लिए समय आ गया है कि वे दोनों समुदायों के 5% कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ खड़े हों। सोशल मीडिया में अपशब्दों और आक्रामक हमलों के डर से हमें धार्मिक उन्मादियों और कट्टरपंथियों पर नो तो चुप्पी मारनी चाहिए न ही नरम होना चाहिए।
हमें मजबूत सामाजिक नेतृत्व विकसित करने की जरूरत है जो समझदारी से बात कर सके और समझदारी से काम ले सके। उन्मादी भाषणों के हिमायती ये गुमराह मुल्ला तबाही ही मचा सकते हैंI भारतीय मुसलमानों ने इस संकीर्ण सोंच के धार्मिक नेतृत्व के तहत काफी कुछ झेला है और हमारे बड़े बड़े इदारों ने भी सिर्फ गुमराह और अंध भक्त बनाने का ही काम किया है। इसे बदलने के लिए समय आ गया है।
हमारे बीच कट्टरपंथियों को बाहर निकालने का आह्वान करने का समय, चाहे वे हमें टीवी स्क्रीन पर बदनाम करने वाले स्वम्भू नेता और मौलवी हों या समाज में फसाद फ़ैलाने और दुश्वारी पैदा करने वाले ठेकेदार। दुनिया अब हमारी मज़लूमियत की कहानी को खरीदने को तैयार नहीं है। हाल के दिनों में जो हिंसा हुई उसे 'भावनाओं को ठेस पहुंचाने' के नाम पर जायज नहीं ठहराया जा सकता।
हम समाज में तेजी से सहानुभूति खो रहे हैं और यदि सिलसिला ऐसा ही चलता रहा तो जल्द ही हम बचे हुए हमदर्दों को भी खो देंगे। ये बड़े बड़े धार्मिक इदारे और संगठन और उनके घोषित नेता आज क्या कर रहे हैं? क्या ये नेता सिर्फ मदरसे के नाम पर जकात जमा करने के लिए हैं? क्या इन नेताओं की मूर्खता की भारी कीमत चुकाने वाले गरीब मुसलमान के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है, जो आग लगाकर सोने चले जाते हैं? और बाद में जब स्थिति शांत हो जाती है तो प्रेस बयान जारी करने या मीडिया में फोटो खिंचवाने के लिए हाज़िर हो जाते हैं ?
क्या हम 5% विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को अपने गलत कार्यों और बयानों से जमीन पर 95% असहाय गरीब मुसलमानों के लिए पैदा की जा रही परेशानी के लिए शर्म नहीं करनी चाहिए? यह महत्वपूर्ण समय है और इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, हमें दीवार पर साफ़ साफ़ लिखे को पढ़ना चाहिए और समझदारी के साथ तत्काल बदलाव के लिए कदम उठाने चाहिए।

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