उत्तर प्रदेश के 6 युवकों की कहानी, जो हमेशा के लिए खमोश हो गये
मेरठ: 6 महीने की गर्भवती पत्नी को छोड़ गया पति
मेरठ की हिंसा में दो आसिफ मारे गए। एक घर का इकलौता कमाने वाला था, तो दूसरे की पत्नी गर्भवती है। पहले बात दूसरे आसिफ की, जो टायर रिपेयर करने का काम करता था। रोजाना चार-पांच सौ रुपए कमा लेता था। दो बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। पत्नी 6 महीने की गर्भवती है। आसिफ की पत्नी के भाई रेहान कहते हैं कि जो पुलिस हमारे बहनोई को गोली मार सकती है, वह कुछ भी कर सकती है। आखिर हम क्या करें? हम इंसाफ चाहते हैं, लेकिन किसी झमेले में नहीं पड़ना चाहते।
मेरठ: घर का इकलौता कमाने वाला चला गया
मेरठ हिंसा में एक और आसिफ की मौत हुई। वो ई-रिक्शा चलाता था। घर का इकलौता कमाने वाला था। परिवार में दो बहनें, दो भाई और अब्बू-अम्मी हैं। सबकी जिम्मेदारी उसके ऊपर थी। बहनों की शादी करनी थी। खुद आसिफ की शादी के लिए घरवाले रिश्ता ढूंढ रहे थे। लेकिन, अब सब खत्म हो गया। आसिफ के चाचा नौशाद कहते हैं- माहौल खराब था, सवारियां मिल नहीं रही थीं। इसलिए आसिफ अपना ई-रिक्शा खड़ा करके घर आ गया था। जिस गली में वो रहता था। वहां पुलिस गोलीबारी कर रही थी। इनमें से एक गोली आसिफ को आकर लगी और वो हमें छोड़कर चला गया। भावुक नौशाद कहते हैं- अब हम गरीब लोग हैं, सरकार से कोई लड़ाई तो लड़ नहीं सकते।
मेरठ: दुकान से लौट रहा था अलीम, पर घर नहीं पहुंच सका
मेरठ हिंसा में मारे गए 5 लोगों में अलीम भी शामिल था। वो रोटी बनाने का काम करता था। दिन के चार-पांच सौ रुपए कमाता था। इसी से घर का खर्च चलता था। माहौल खराब होने के कारण उस दिन दुकान बंद थी तो अलीम घर लौट रहा था। लेकिन, वो घर नहीं पहुंच सका। रास्ते में गोली का शिकार हो गया। अलीम के दिव्यांग भाई सलाउद्दीन आरोप लगाते हैं कि गोली तो पुलिस वालों ने ही मारी है। जब मुझे सूचना मिली तो मैं हॉस्पिटल पहुंचा फिर पोस्टमार्टम हाउस पहुंचा, लेकिन भाई की शक्ल तक देखने को नहीं मिली। तकरीबन 14 घंटे की जद्दोजहद के बाद मेरा भाई मिला, जिससे मैं अब कभी बात भी नहीं कर सकता।
लखनऊ: हफ्ते भर से नहीं बोली पत्नी, रोते-रोते हो जाती है बेसुध
यूपी में हिंसा की शुरुआत लखनऊ के हुसैनाबाद से हुई थी। इस हिंसा में वकील नाम के एक शख्स की मौत हुई। वकील पुराने शहर में कुड़ियाघाट के पास रहता था। वह ई-रिक्शा चलाता था। साल भर पहले ही उसकी शादी हुई थी। पत्नी ने जब वकील की मौत की खबर सुनी तो बोलना बंद कर दिया। बस रोती रहती है। रोते-रोते निढाल होकर सो जाती है। घरवाले उसे जबरदस्ती खाना खिला रहे हैं। वकील के भाई शकील कहते हैं- मां ने उसे घर का सामान लेने भेजा था। तनाव के चलते मोहल्ले की दुकानें बंद थी तो वो हुसैनाबाद चला गया। वहां हो रहे उपद्रव में वकील फंस गया। जहां उसकी गोली लगने से मौत हो गई। वकील की मां रोते हुए सवाल उठाती हैं- मेरे बच्चे को कौन इंसाफ देगा? उसका क्या कसूर था?
बिजनौर: आईएएस की तैयारी कर रहा था सुलेमान
बिजनौर में हुई हिंसा में दो लोगों की मौत हुई थी, इसमें सुलेमान भी था। सुलेमान यूपीएससी की तैयारी कर रहा था। पिता खेती करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। फिर भी बेटे को आईएएस अफसर बनाने के लिए उसे पढ़ने के लिए नोएडा भेजा था। अम्मी ने कुछ नहीं बोल रही, बस रोए जा रही है। अब्बू तो जैसे पत्थर हो गए हैं। बस यही कह रहे हैं कि ऊपर जाने की उम्र मेरी थी, अल्लाह ने बेटे को क्यों बुला लिया? बहनें गुमसुम हैं। इस दुख की घड़ी में उन्होंने ही परिवार संभाल रखा है। सुलेमान के मामा अनवार कहते हैं कि सब जुमे की नमाज पढ़कर निकले थे। पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। भगदड़ मची और गोली चला दी। सुलेमान गोली की चपेट में आ गया। उसकी मौत हो गई।
मेरठ: मृतक के भाई ने कहा- समय से मिल जाता इलाज तो आज जिंदा होता मोहसिन
मोहसिन भी मेरठ की हिंसा में मारा गया था। वो कबाड़ का काम करता था। उसका 6 महीने का बच्चा है। तीन साल की बेटी भी है। माहौल ठीक नहीं होने के कारण उस दिन मोहसिन नमाज पढ़कर घर आ गया। थोड़ी देर बाद जब माहौल शांत हुआ तो घर का कुछ सामान लेने निकला। लेकिन, ये उसकी जिंदगी का आखिर सफर बन गया। मोहसिन के भाई इमरान कहते हैं- गोली लगने के बाद मैं उसे हॉस्पिटल ले गया, लेकिन उसे एडमिट नहीं किया गया। मैं उसे मेडिकल कॉलेज ले गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया। अगर समय से इलाज मिल जाता तो शायद मेरा भाई जिंदा बच जाता। प्रशासन ने दबाव में शव को दफना दिया। इरफान आरोप लगाते हैं कि जहां मोहसिन को गोली मारी गई वहां हिंसा नहीं हुई थी। पुलिसवालों के साथ सादे कपड़ों में कुछ लोग थे जो गोलियां चला रहे थे। अभी हमारा मुकदमा भी नहीं लिखा गया है न ही हमें पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मिली।

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