पश्चिमी विचारधारा के प्रभाव से निकाल कर मिल्लत की वैचारिक मज़बूती का काम, समय की मांग : मलिक मोतसिम ख़ान

नई दिल्ली : अल्लाह ने हर इन्सान को कुछ न कुछ योग्यता देकर दुनिया में भेजा है और साथ ही उसने जीवनयापन की एक विचारधारा भी दी। बाद के इन्सानों ने विशेष रूप से पश्चिमवालों ने ख़ुदा के दिए निज़ाम को अपने मन-माने तरीक़े से चलाने के लिए विभिन्न विचारधाराएं गढ़ लीं और उनका ख़ूब प्रचार-प्रसार किया। नतीजा यह हुआ कि आज हमारा समाज भी पश्चिमी विचारधारा से दूषित होता जा रहा है। सच तो यह है कि घर और परिवार तक इन विचारधाराओं की आँच पहुंच चुकी है। अत: इस चैलेंज को रोकने की ज़रूरत है।

ज़रूरत इस बात की है कि पश्चिमी विचारधारा को काउंटर करने के साथ ही इस्लामी सोच को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही इस्लाम की वैचारिक बहसों को समाज के आख़िरी दर्जे तक पहुंचाने के लिए जिद्दो-जेहद करनी चाहिए। ऐसा कर के ही हम बातिल विचारधारा से मिल्लत को सुरक्षित रख सकते हैं और ऐसा करके हम अपने सामाजिक ताना-बाने को भी मज़बूत कर सकते हैं।ऊपर वर्णित विचारों की अभिव्यक्ति जनाब मलिक मोतसिम ख़ान (नायब अमीर, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद) ने गत दिनों मरकज़ जमाअत में आयोजित सेमिनार, “अस्रे-हाज़िर में उभरने वाली तब्दीलियां और हक़ीक़ी मुस्लिम मुआशरे की तशकील में वैचारिक व अमली चैलेंजेज़” की अध्यक्षता करते हुए की। सेमिनार का आयोजन जमाअत-ए-इस्लामी हिंद हलक़ा दिल्ली और इंस्टीटियूट आफ़ स्टडी ऐंड रिसर्च दिल्ली (ISRD) के संयोजन से किया गया था ।

उन्होंने आगे कहा कि स्कूलों-कॉलेजों में नैतिक मूल्यों को बढ़ाबा देना मिल्लत के नौजवानों की अहम तरीन ज़िम्मेदारी है और इदारों को भी चाहिए कि वे अख़लाक़ी क़दरों को बढ़ावा दें।सेमिनार में चार लेख पेश किए गए। पहला लेख “बच्चों के वैचारिक और व्यवहारिक विकास के वर्तमान साधन, चैलेंजेज़ और संभावनाएं” शीर्षक से मुहम्मद आसिफ़ इक़बाल, सेक्रेट्, ‘तहक़ीक़ व तसनीफ़’, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद, हलक़ा दिल्ली ने पेश किया ।

उन्होंने बच्चों के विकास में रुकावटों का जायज़ा लेते हुए संभावनाओं पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि ज़रूरी है कि इस्लामी अक़ीदे और विचारधारा को बेहतरीन अंदाज़ में बच्चों के मन में बिठाया जाए।दूसरा लेख, “नौजवानों की वैचारिक, बौद्धिक और व्यवहारिक स्थिति और योजना” के शीर्षक से तय्यब अहमद बेग, संपादक ‘कान्ति’ साप्ताहिक ने पेश किया। इस में उन्होंने नौजवानों में आई वैचारिक गिरावट और शैक्षिक गिरावट को उजागर किया। साथ ही समाज में मिल्लत के नौजवानों को दरपेश अमली मसाइल पर रोशनी डालते हुए क़ुरआन व सीरत को योजना के तौर अपना मार्गदर्शक बनाने की ओर ध्यान दिलाया।“ घर और रोज़गार से जुड़ी महिलाओं की हालत और वैचारिक एवं व्यवहारिक रुझान” के शीर्षक से तीसरा लेख शाइस्ता रिफ़अत ने पेश किया। जबकि “वर्तमान आर्थिक विचारों पर आधारित व्यवस्था और मुसलमानों की इस्लामी आर्थिक व्यवस्था से उदासीनता के नतीजे” के शीर्षक से मुहम्मद सिकन्दर ने पेश किया और आर्थिक व्यवस्था और देश का स्थिति समस्याओं और संभावहाओं पर चर्चा की।डाक्टर मुजाहिदुल-इस्लाम, शाज़िया बारी, सनोबर जीलानी, ख़लीक़ुज़्ज़मां, ज़ाहिद हुसैन, अदनान यूसुफ़ और उमर यूसुफ़ ने विभिन्न लेखों पर अपने इंटरवेंशंस पेश किए। इस प्रोग्राम के कन्वीनर जनाब साजिद उमैर थे, जिन्हों ने प्रोग्राम का आरंभिक भाग पेश किया और सेमिनार के मक़सद पर नज़र डाली।

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