सेक्युलरिज़्म का भविष्य उज्ज्वल है

By Imamuddin Aig

 

मुसलमानों की सियासी क़यादत के उभार से देश का सेक्युलर तबक़ा मायूसी, चिंताओं और आशंकाओं से घिर गया है। हालांकि, मुसलमानों के इस नए रुझान से आगे चल कर परिस्थितियां क्या करवट लेंगी और अन्य समुदायों और बिरादरियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इस संबंध में किये जा रहे सारे दावे काल्पनिक हैं। ईश्वर के सिवा कोई भी नहीं जानता कि भविष्य के गर्भ में क्या है। हमारा मानना है कि सेक्युलर तबके को बिल्कुल भी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अल्लामा इक़बाल के इस मिसरे "पासबाँ मिल गए काबे को सनम-खाने से" के मिसदाक़ आगे चल कर यही मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियां सेक्युलरिज़्म का झंडा उठा सकती हैं। ऐसा क्यों, कैसे और कब होगा इसे जानने के लिए पहले यह समझने की ज़रूरत है कि क्या मुसलमानों का समर्थन हासिल करना ही इन पार्टियों का आखिरी लक्ष्य है? जवाब है बिल्कुल नहीं।

राजनीति में किसी भी राजनीतिक पार्टी का एकमात्र लक्ष्य सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना होता है। दरहक़ीक़त, मुस्लिम नेतृत्व को स्थापित होने के लिए मुसलमानों का समर्थन जुटाना पहला चरण/मरहला है। इसके बाद राजनीतिक पार्टियों के बीच अपनी पहचान, अपना स्पेस बनाने और स्वीकृति पाने के लिए गठबंधन की राजनीति करना दूसरा चरण होगा। गठबंधन का अवसर इन पार्टियों को परिस्थितियां खुद प्रदान करेंगी। इसके लिए इन्हें कुछ खास करने की ज़रूरत नहीं होगी, बस बाहें खोले मौके का इंतज़ार करना होगा।

इसके बाद तीसरे चरण में इन पार्टियों की कोशिश अन्य समुदायों और बिरादरियों का समर्थन प्राप्त करना और उनका प्रतिनिधित्व करना होगा ताकि आखिरी लक्ष्य सत्ता तक पहुंचा जा सके और इसके लिए उन्हें हर हाल में सेक्युलर बल्कि इतना सेक्युलर बनना पड़ेगा कि आप फिलवक्त अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते। क्योंकि 15 फीसद आबादी के साथ लोकतंत्र में सत्ता तक तभी पहुंचा जा सकता है जब कोई अन्य बड़ी कम्युनिटी भी आपका समर्थन करे और यह डायरेक्ट मिलना मुमकिन नहीं लग रहा है। मेरे ख्याल से इस चरण को पार करने के लिए मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों को अन्य समुदायों की लीडरशिप को खुद से भी आगे करना पड़ेगा और खुद को उनके पीछे या नीचे रह कर ही काम निकालना पड़ेगा।

बहरहाल, आगे क्या होता है वो आगे ही पता चलेगा लेकिन सेक्युलर तबके को तनिक भी चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है। न ही सेक्युलर मुसलमानों को इस बात के लिए परेशान होने की ज़रूरत है कि अपनी क़यादत के खड़ी होने से हर पार्टी मुसलमानों का दुश्मन बन जाएगी और मुसलमानों का वुजूद खत्म हो जाएगा। केरला, तिलंगना में बरसों से मुस्लिम क़यादत है और वहां मुसलमान ज़िंदा भी हैं और खुशहाल भी। इसलिए, न तो मुसलमानों का वुजूद और न ही सेक्युलरिज़्म खतरे में है। दोनों का भविष्य उज्ज्वल है। बस जितनी तेजी से फ़र्ज़ी सेक्युलरिज़्म और ज़ुबानी सेक्युलत पार्टियों का पतन होगा और मुस्लिम क़यादत का उभार होगा, उतनी ही जल्दी असली और खालिस सेक्युलरिज़्म का उदय होगा।

 

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