ब्रह्मण समाज की हालत विकास दूबे से विजय मिश्रा तक
डाक्टर सलीम खान
उतर प्रदेश में योगी सरकार ब्रह्मणों को नाराज करने पर तुली हुई है। इस की ताजा-तरीन मिसाल उस की अपनी हलीफ निशाद पार्टी के रुकन असैंबली विजय कुमार मिश्रा की मध्य प्रदेश से गिरफ्तारी है। ये हुस्ने इत्तिफाक है कि जब से मध्य प्रदेश में नरोत्तम मिश्रा नामी ब्रह्मण वजीरे दाखि़ला बना है विकास दूबे से लेकर विजय मिश्रा तक हर कोई वहीं जाए पनाह ढूंढता है। विजय मिश्रा जी भदोही से रुकन असैंबली हैं । ये ब्रह्मण की ब्रह्मण से लड़ाई है । मिश्रा के रिश्तेदार कृष्ण मोहन तिवारी ने एम एल ए समेत उनके पूरे खानदान पर घर पर गासिबाना कब्जे का इल्जाम लगाया और उन्हें सूबा छोड़कर फरार होना पड़ा लेकिन बात नहीं बनी तो आगरा में उन्होंने ख़ुदसपुर्दगी कर दी और यूपी पुलिस गिरफ्तार करके ले आई। विजय मिश्रा पर जुमला 73 मुकदमे हैं ।
वैसे विजय मिश्रा के मुताबिक फिलहाल सिर्फ 11 मुकदमे बाकी हैं उनमें से भी वजीर नंद गोपाल नंद को रीमोट बम से हमले के अलावा कोई संगीन मामला नहीं है। 4 बार एम एल ए बनने वाले दबंग ब्रह्मण सियासी रहनुमा का अगर ये हाल है तो आम ब्रह्मणों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। ब्रह्मण उनके अंदर बसे खौफ व दहश्त का पता विजय मिश्रा की वकील बेटी ऋचा मिश्रा के इस बयान से भी लगाई जा सकती है कि ख़ुदा करे रास्ते में गाड़ी ना पलटे ।
विकास दूबे के फर्जी इनकाउंटर को एक महीना गुजर गया लेकिन उत्तरप्रदेश में उसका भूत अब भी मंडला रहा है। अब ये मसला एक फर्द से हट कर ब्रह्मण समाज का हो गया है। फिलहाल उत्तर प्रदेश में बिलखसूस और हिन्दी बेल्ट में बिलउमूम ब्रह्मणों की दाखिली कैफीयत को हाल में हथियार डालने वाले ओमा कांत शुक्ला की ख़ुद सुपुर्दगी से लगाया जा सकता है। शुक्ला पर 50 हजार रुपये के इनाम था । सरेंडर होने के लिए वो जिस वक्त बीवी और बेटी के साथ चैबे पूर थाने पहुंचा तो उसकी गर्दन में एक तख्ती टंगी हुई थी जिसमें लिखा था मेरा नाम उमाकांत शुक्ला उर्फ गु़न वलद मूलचन्द शुक्ला है । मैं बकरो थाना चैबे पूर का रहने वाला हू़। इस तख्ती के मजमून को पढ़ कर बेसाख्ता विकास दूबे की वीडीयो में उसका चीख़ चीख़ कर ये कहना याद आता है कि ‘‘मैं विकास दूबे हूं, विकास दूबे कानपूर वाला।’’ ये ऐलान किसी दिलेरी की अलामत नहीं है। इस के अंदर फर्जी इनकाउंटर के जरिया मुतवक़्क़े कत्ल का खौफ बोल रहा है।
मुहज्जब मुआशरे में इनकाउंटर यानी मावराए अदालत कत्ल का इस कदर आम हो जाना कि मुल्जिम अज ख़ुद अपना नाम वीडीयो पर बताने लगे या तख्ती लगा कर आने लगे सरकारी दहशतगर्दी का गम्माज है। मुजरिमीन को गिरफ्तार करके उन्हें करार वाक़ई सजा दिलाने और पुलिस के जरिया उन्हें जाली इनकाउंटर में हलाक करने में बड़ा फर्क़ है। इस तरह पुलिस राज को कबूलियत आम मिल जाने से अदलिया बेमाना हो जाती है। ऐसे में सियासतदानों को इंतिजामिया के जरिया अपने मुखालिफीन का कांटा निकालने की खुली छूट मिल जाती है। उमाकांत पुलिस थाने में पहुंच कर पहले तो सज्दारेज हो गया और उसके बाद बताया कि वो कानपूर देहात के अतराफ अपने रिश्तेदारों के पास छिपा हुआ था मगर अब बार बार की छापा मारी से डर गया है। अपने एहसासे जुर्म का एतिराफ करने के बाद उसने जानी तहफ्फुज की गुहार लगाई । पुलिस के सामने उमाकांत ने कत्ल आम में अपने मुलव्वस होने की तसदीक की । इस के घर से पुलिस के लूटे हुए कारतूस बरामद हुए। विकास दूबे को उसने सफ्फाक दरिन्दा करार दे दिया । उमाकांत को तो खैर गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन मजकूरा हमले में शामिल उस का भाई श्रीकांत हनूज फरार है।
ये हकीकत अब खुल चुकी है कि विकास दूबे को क़ब्ल अज वक्त पुलिस कार्रवाई की जानकारी फोन से दी गई थी। इसके बाद ही उसे अपने साथियों को जमा करके पुलिस टीम पर धावा बोलने का मौका मिला। मुखबिरी का इल्जाम चैबे पूर पुलिस स्टेशन के इंचार्ज विनय तिवारी और सब इन्सपेक्टर के के शर्मा पर है जिन्हें मुअत्तल करने के बाद एसटी एफ ने गिरफ्तार कर लिया है। इस मामले का एक अहम पहलू ये भी है कि सब इन्सपेक्टर के के शर्मा ने गुजिश्ता माह 13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से रुजू कर के बीवी विनीता सिरोही समेत अपनी जान की हिफाजत का मुतालिबा किया था। इस मुआमले में पहली बार एक तरफ पुलिस के कत्ल में पुलिस के मुलव्वस है दूसरी तरफ पुलिस के जरिया पुलिस की जान को ख़तरा लाहिक है । मुअत्तल इन्सपेक्टर के के शर्मा ने अदालते उज्मा से अपने खिलाफ दायर एफ आई आर की गैर जानिबदाराना, आजादाना और कानून के दायरा में जांच का जिम्मा किसी आजाद एजेंसी के हवाले किए जाने या सेंट्रल ब्यूरो आफ इनवेस्टीगेशन (सी बी आई से कराने की हिदायत देने की खातिर दरख़ास्त की है। इस मामले की तफतीश करने वाले जस्टिस चैहान के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में दरख़ास्त की गई है कि इनके भाई बी जे पी में हैं इसलिए उनका तकर्रुर मौजूं नहीं है। रियासती इंतिजामिया पर सरकारी अफ्सर का अदमे एतिमाद तो तश्वीशनाक है ।
इस तनाजुर में समाजी राबते के जराये इबलाग के अंदर कोरोना की मानिंद फैलने वाले आडियो को देखना चाहिए। इस में हलाक होने वाले सी ओ देवेंद्र मिश्रा और देही इलाकों के इस पी बृजेश कुमार शिवासनू की गुफ्तगु है। इस आडीयो में देवेंद्र मिश्रा ने साफ कहा था कि मुअत्तल एस ओ विनय तिवारी बदनामे जमाना विकास दूबे की क़दम-बोसी करता है और वो थाने के दो-चार लोगों को मरवा देगा। इस आडियो में ये इन्किशाफ भी किया गया है कि तिवारी ने अपनी जान बचाने के लिए साबिक़ कप्तान को पा़च लाख रुपय दिये थे। इस आडियो से लखनऊ में हंगामा मचा दिया । एस पी ने तो फिलहाल ये कह कर अपनी जान छुड़ा ली कि उनकी बात तो हुई थी लेकिन ये याद नहीं कि किस सिलसिले में क्या बात हुई? इस तरह गोया पुलिस क़त्ले आम में निचले दर्जा के अहलकारों समेत आला आफसरान की लापरवाही भी शामिल हो गई है । आडियो की तफतीश के दायरे में साबिक़ कप्तान अनंत देव तिवारी और आई पी एस अफ्सर निखिल पाठक भी आ जाऐंगे। उन्होंने अपनी जांच में सी ओ समेत सभी पुलिस आफसरान को क्लीन चिट दी थी।
मुजरिम पेशा लोग हर मुआशरे में पाए जाते हैं । उनके जराइम का मजहब या समाज से कोई ताल्लुक नहीं होता । इस पूरे मुआमले में मरने वाले, मारने वाले, मुख़्बिरी करने वाले और बचाने की कोशिश करने वाले सब के सब इत्तिफाक़ से ब्रह्मण समाज के लोग हैं लेकिन इस वारदात को सनातन धर्म से जोड़ना या ब्रह्मणों को इस के लिए मोरिदे इल्जाम ठहराना गलत है। मगरिब के जराय इबलाग ने इस्लाम दुश्मनी में ये किया कि जब कोई ईसाई किसी तशद्दुद की वारदात में मुलव्वस होता तो उसे उसका जाती अमल करार दिया जाता और नफसियाती मरीज बताकर इस से हमदर्दी जताई जाती लेकिन अगर वो मुस्लमान होता तो मजहब इस्लाम के खिलाफ महाज खोल कर पूरी उम्मत मुस्लिमा को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता।
हिन्दुस्तान के फिर्क़ा परस्तों ने भी मगरिबपरस्ती में यही तर्जे अमल इख्तियार किया । वो लोग किसी मुस्लमान को पकड़ कर टेलीविजन पर ले आते और उससे पूछते आपकी कौम इसकी मज़म्मत क्यों नहीं करती? आप ऐसा करते हैं या नहीं? इस वावेला का असर ये हुआ कि मुस्लिम रहनुमा अजखु़द अपनी सफाई में मुजाहिरे करने लगे । उस के बरअक्स उत्तरप्रदेश में हिन्दुओं से तो दूर ब्रह्मणों से भी कोई इस तरह के ऊ़टपटांग सवालात नहीं करता । उल्टा ब्रह्मण रहनुमा डंके की चोट पर ये कहते नजर आते हैं कि विकास दूबे का इनकाउंटर गलत है। इसको फर्जी इनकाउंटर में हलाक करने के बजाय गिरफ्तार करके कानून के मुताबिक सजा देनी चाहिए थी। मुस्लिम रहनुमाओं और तन्जीमों को इस तरह का मोकिफ इख्तियार करना चाहिए।

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