भारत मे मुसलमानों के लिए इन्साफ़ की लड़ाई आमतौर पर कोर्ट रूम के बाहर लड़ी जाती है
केसेस की पैरवी का काम बड़ी खामोशी,सब्र,हिकमत और अक्लमंदी से और काफी लंबे वक़्त तक करना पड़ता है वरना लेने के देने पड़ सकते हैं
BY : अखलाक अहमद
भारत मे मुसलमानों के लिए इन्साफ़ की लड़ाई आमतौर पर कोर्ट रूम के बाहर निम्न स्तर की फैक्ट फाइंडिंग,छोटे-मोटे धरना- प्रदर्शन,प्रेस-कॉन्फ्रेंस,प्रेस-स्टेटमेंट इत्यादि के माध्यम से लड़ी जाती है।
ज़ाहिर है आप बाहर चाहे जो कर लें इंसाफ तो आप को कोर्ट से ही मिलेगा।अब ये इंसाफ चाहे आधा हो या पूरा,देर से मिले या जल्दी,आसानी से मिले या मुश्किल से,मिलना तो उसे कोर्ट से ही है।
अब कोर्ट रूम जहाँ से इंसाफ़ मिलने की उम्मीद होती है उसका हाल सुन लीजिए।वहाँ उन केसेस की पैरवी करने वाला तक कोई नहीं होता।यहां तक कि कोई ढंग का वकील भी नहीं खड़ा किया जाता।जो वकील सरकारी लीगल एड के माध्यम से मिलते हैं उनसे तो अल्लाह ही बचाये।
जो वकील पीड़ित को विभिन्न संगठनों की तरफ से दिए जाते हैं वो भी अक्सर किसी डर/लालच की वजह से विरोधी पक्ष से मिलकर पीड़ित पक्ष के ही ख़िलाफ़ काम करते हुए दिखाई देते हैं।तो कभी अत्यंत गम्भीर अपराधों के लिए भी पीड़ित को किसी तीसरे दर्जे का वकील देकर कोरम पूर्ति कर ली जाती है।
यानी जहां सबसे ज़्यादा तवज्जो देनी चाहिए वहां सबसे ज़्यादा लापरवाही दिखाई जाती है और अपनी सारी ताक़त कोर्ट के बाहर उपरोक्त "ज़रूरी"कामों में ख़र्च की जाती है।ज़ाहिर है काम करने की इस उल्टी तरतीब का जो नतीजा निकलना चाहिए वही निकलता है।
वर्षों तक मुकदमा चलने के बावजूद पीड़ित को इंसाफ नहीं मिलता।एक तो कोर्ट रूम में वैसे ही अच्छी खासी तादाद मनुवादियों की है जो कमज़ोर तबक़ात पर जुल्म और नाइंसाफ़ी को जाएज़ समझते हैं।रही -सही कसर केसेस की पैरवी के ताल्लुक़ से मिल्लत की इंतिहाई दर्जे की गैर- जिम्मेदाराना लापरवाही और इंतिहाई कमज़ोर पैरवी पूरी कर देती है।
नतीजा ये होता है कि वर्षों तक केसेस चलने के बाद आखिर में पीड़ित के खिलाफ ही फैसला हो जाता है और मिल्ली तंजीमें और उनके रहनुमा सिस्टम की मुसलमानों के लिए Biased approach के पर्दे के पीछे अपनी कोताहियों और नाकामियों को बड़ी आसानी और कामयाबी के साथ छुपा लेते हैं।
मिल्लत भी सिस्टम को बुरा-भला कहकर अपना फ़र्ज़ पूरा कर लेती है।केसेस की पैरवी का काम बड़ी खामोशी,सब्र,हिकमत और अक्लमंदी से और काफी लंबे वक़्त तक करना पड़ता है वरना लेने के देने पड़ सकते हैं।जाहिर है इस रास्ते से तुरन्त मिल्लत का चैंपियन/मुजाहिद और नेता बनने की संभावना भी बड़ी धूमिल होती है।जबकि उपरोक्त "कामों" के ज़रिए आप बहुत जल्द ऐसे अलक़ाब से नवाज़े जा सकते हैं।
तो नतीजा ये निकलता है कि पीड़ित तो वर्षों तक जेलों में सड़ता रहता है या उसे सजा हो जाती है और बाहर उसे इंसाफ दिलाने का नारा देने वाले दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक़्क़ी करते रहते हैं।मुसलमानों से जुड़े हर केस की कहानी कुछ ऐसी ही है।यक़ीन न हो तो कोर्ट रूम में जाकर इन केसेस की पैरवी अपनी खुद की आंखों से देख लें,यक़ीन हो जाएगा।

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