असल प्रोटोकॉल जनता की सेवा है ,अधिकारी शासक नहीं, सेवक है - IAS , Dr. Heera Lal
जब किसी गांव में पानी लौटने पर शादियां फिर से होने लगीं, वह सबसे बड़ा संतोष था।
साक्षात्कार (अशरफ अली बस्तवी) :
आज हमारे साथ हैं उत्तर प्रदेश के एक ऐसे प्रशासनिक अधिकारी IAS , Dr. Heera Lal जी , जिनकी किताब डायनेमिक डीएम हिंदी, गुजराती और अंग्रेज़ी—तीनों भाषाओं में चर्चा का विषय बन चुकी है। यह किताब उनके अब तक के प्रशासनिक अनुभव, गांवों में किए विकास कार्यों और ज़मीनी बदलाव की कहानियों को सजीव रूप में प्रस्तुत करती है। सबसे पहले आपका स्वागत है।
प्रश्न : आपने प्रशासनिक जीवन के अनुभव बड़े सरल और संवादात्मक अंदाज़ में लिखे हैं। लिखने का यह सफ़र कैसा रहा?
उत्तर : किताब लिखना मेरे लिए आत्मसंवाद जैसा था। सरकारी सेवा में आने वाले युवाओं, सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे छात्रों और आम परिवारों,सबके लिए यह एक तरह की प्रैक्टिकल गाइड है। इसमें पानी की समस्या, प्लास्टिक प्रदूषण, महिला विकास, गांव के विकास जैसे विषय शामिल हैं। किताब को अब तक पचास हज़ार से ज़्यादा पाठक पढ़ चुके हैं और आज तक किसी ने नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी—यही इसकी असली सफलता है।
प्रश्न : अकसर देखा गया है कि अधिकारी प्रशिक्षण के बाद सिस्टम में खो जाते हैं और जनता से दूर हो जाते हैं, लेकिन आप लगातार लोगों से जुड़ते रहे। यह संभव कैसे हुआ?
उत्तर : सिस्टम आपको अपनी तरफ खींचता है। सुविधा, स्टेटस मिलते ही कई लोग अपनी जड़ों को भूल जाते हैं। मैंने हमेशा अपनी पुरानी मुश्किलें याद रखीं। गांव में पले-बढ़े अनुभवों ने मुझे सिखाया कि असली संतोष तभी है जब आप सेवा का आनंद लें। अधिकारी शासक नहीं, सेवक है,यही सोच मुझे जनता से जोड़कर रखती है।
प्रश्न : आपके पिता हेल्थ डिपार्टमेंट में साधारण पद पर थे और आपने वहां से सिविल सर्विस तक का सफर तय किया। उस प्रेरणा को कैसे याद करते हैं?
उत्तर : यह सपना मेरे पिता का था। उन्होंने ही मुझे सिविल सर्विस की महत्ता समझाई। गांव की कठिनाइयों को नज़दीक से देखने का अनुभव आज भी मेरे फैसलों की नींव है।
प्रश्न : उत्तर प्रदेश में बांदा ज़िले में पानी बचाने का आपका प्रयास मिसाल बन गया। आपने लोगों को कैसे समझाया?
उत्तर : सरकार और समाज के बीच जो खाई है, उसे पाटना जरूरी है। मैं दो महीने में अपने व्यवहार से यह भरोसा दिलाता हूं कि अधिकारी जनता का है। जब लोग विश्वास करने लगते हैं तो पानी बचाने जैसी पहल में वे खुद आगे आते हैं।
प्रश्न : ‘मॉडल विलेज’ प्रोजेक्ट के बारे में बताइए।
उत्तर : गांव का असली विकास सिर्फ सड़क -बिजली नहीं, हरियाली और जलस्रोतों के संरक्षण से होता है। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के ‘रूरल अर्बनिटी’ विज़न को आधार बनाकर हम गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहे हैं। तकनीक और सोशल कम्युनिकेशन के ज़रिए गांव के लोग खुद अपना “विलेज मेनिफेस्टो” तैयार कर सकें, यही हमारा अगला चरण है।
प्रश्न : प्रोटोकॉल तोड़कर आप ज़मीन पर बैठकें करते हैं, पत्तल में भोजन करते हैं। इस पर अधिकारियों की क्या प्रतिक्रिया रहती है?
उत्तर : असल प्रोटोकॉल जनता की सेवा है। दिखावे के प्रोटोकॉल हमने ही बनाए हैं। जब अधिकारी खुद जमीन पर बैठता है तो पूरा माहौल बदल जाता है, डर मिटता है और असली संवाद शुरू होता है।
प्रश्न : अब तक का सबसे संतोषजनक पल और कोई अधूरा सपना?
उत्तर : जब किसी गांव में पानी लौटने पर शादियां फिर से होने लगीं, वह सबसे बड़ा संतोष था। अधूरा सपना नहीं कहूंगा—निरंतर कोशिश ही जीवन है। हर नए दिन कुछ नया करने का अवसर है।
Video Interview

0 comments