बड़ी संघर्ष पूर्ण रही ताजुद्दीन की ज़िन्दगी.....

आज जब नियुक्ति पत्र मुझे दिया जा रहा था बज़ाहिर मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट थी... सुकून था.....लेकिन मै रो रहा था.... आँखों मे आंसू नही थे ....अब्बा का चेहरा बार बार आँखों के सामने आ रहा था....काश आज वो होते.....

 

आज अलाउद्दीन चचा (बरसाती ) मरहूम (अल्लाह ताला करवट करवट जन्नत नसीब करे अमीन ) ज़िंदा होते तो बहुत ही खुश होते, क़दम ज़मीन पर नही पड़ते, होता भी ऐसा । उन्होंने अपने बच्चों को बड़ी मेहनत से पढ़ाया। ना अच्छा खाया ना ही अच्छे कपड़े पहने लेकिन बच्चों की परवरिश और शिक्षा मे कोई कमी नही होने दी । एक टूटी हुई सायकल से रात दिन मेहनत करते, उनका एक खुवाब था कि हमारे दौर मे उतने साधन नही थे कि आला तालीम हासिल कर सके लेकिन आज हमारी कोशिशों से बच्चे पढ़ सकते हैं उन्होंने सब कुछ दांव पर लगा कर बच्चों को पढ़ाया आज नतीजा हम सब के सामने है ।

ताजुद्दीन गांव के मदरसा अशरफुल उलूम मे कुछ पढ़ नही पाया लेकिन जब नव्वागांव मे ( उस वक्त एक नया मांटेसरी स्कूल खुला था ) कक्षा एक मे एडमिशन हुआ तो कुछ दिन के बाद उसने एक लय पकड़ ली और वहा कक्षा 5 तक बड़ी मेहनत से पढ़ा वहा के टीचर ताजुद्दीन की ज़हानत की बड़ी तारीफ करते थे ।

मुण्डेरवां मे पढ़ाई के मामले मे 'गुलाबी देवी ' बड़ा मशहूर स्कूल था बरसारती चचा ने कक्षा 6 मे वहा एडमिशन कराया । यहाँ पर भी ताजुद्दीन ने कक्षा 8 तक मेहनत से पढ़ा । गन्ना विकास इंटर कालेज मुण्डेरवां से ही हाई स्कूल और इंटर किया । ताजुद्दीन कुछ शरारती तबियत का था इस लिए टीचर नाराज़गी का भी इज़हार करते लेकिन बोर्ड एग्जाम मे जब मैथ के नंबर टीचरो ने देखे तो बहुत खुश हुए और बड़ी दुआएं दे कर रुख़सत किया ।

यहां तक तो लड़कपन का ज़माना था........

2003 मे फर्स्ट डिवीज़न इंटर मीडियट पास करने के बाद ताजुद्दीन ने बस्ती का रुख किया और किसान डिग्री कॉलेज मे बीएससी मे एडमिशन लिया और यहां से शुरू हुई संघर्ष पूर्ण ज़िन्दगी........

इंटर पास करने तक 17-18 साल की उम्र हो जाती है किशोर अवस्था खत्म और जवानी का ज़माना शुरू होजाता है जिसको बड़ा नाजुक और खतरनाक ज़माना कहा जाता है । इस उम्र मे अगर बच्चा संभल गया तो ठीक वरना तबाही के इलावा कुछ हासिल नही होता....
आगे इस तरह पढ़ें.........

KDC बस्ती मे एडमिशन तो करा लिया । लेकिन अब तक मामला ये था कि रोज़ सायकल से स्कूल जाता और घर आ जाता जो कुछ मयस्सर होता खा लेता । मगर अब बस्ती से रोज़ अप डाउन करना खासा मुश्किल था । बस्ती मे रहना खाना पीना किताब कॉपी स्कूल के खर्च और दूसरी ज़रूरियात कैसे पूरी होती छोटे भाई बहन भी पढ़ रहे थे बड़ी बहनो की शादियां सिर्फ अब्बा अकेले कमाने वाले सारे खर्चे कैसे पूरे होते कब तक अब्बा के ऊपर बोझ बनता......

उसके बावजूद अब्बा ने यह कभी नही कहा बेटा अब कुछ सहारा बनो । उन्होंने हमेशा यही हौसला दिया बेटा अभी हम ज़िंदा है खूब पढ़ लो उसके बाद ज़िन्दगी भर कमाना ही है अब्बा की इन बातों से मुझे क़दम क़दम पर हौसला मिलता.....

कहते है ना शिक्षा कही पर भी बेकार नही जाती

चुंकि टीचरों की मेहनत और माँ बाप की दुआओं से मै बचपन से ही पढ़ने मे बहुत तेज़ था दीगर सब्जेक्ट के साथ साथ मैथ फिज़िक्स और इंग्लिश मेरी बहुत अच्छी थी । घर के हालात को देखते हुए मै कालेज कम जाता और कोचिंग पढ़ाना शुरू कर दिया और ऐसा भी नही किया कि अपनी एजुकेशन पर फोकस कम कर दिया और कोचिंग से कमाना जिंदगी का मक़सद बना लिया जहाँ मै कोचिंग पढ़ाता वही अपनी स्टडी पर खास तवज्जो देता....अब्बा और घर के हालात के बारे मे सोचता तो कभी कभी काफ़ी टेशन मे आ जाता.....

इस लिए देर रात तक घरो मे भी बच्चों को पढ़ाने जाता उसके बाद खुद आ कर पढता । इस तरह मेरे अपने खर्चे पुरे हो जाते और अगर कुछ पैसे बचते तो छोटे भाई बहनो की एजुकेशन मे काम आ जाते.....इस तरह से अब्बा के सिर से थोड़ा सा बोझ हलका हुआ.......

वक़्त गुज़रता रहा........

2007 मे मैने मैथ से बीएससी पास की और 2009 मे सरला देवी कालेज अकबर पुर से बीएड भी कर लिया । धीरे धीरे मेरी कोचिंग और टीचिंग ऑफ़ मेथेड की हर तरफ तारीफ होने लगी.....

इसी संघर्ष के ज़माने मे संत इंटरनेशनल अकादमी मे 6 महीना पढ़ाया, यूनिक साइंस अकादमी मे 5 महीना, द सी एम यस मे एक साल पढ़ाया जहाँ बेस्ट टीचर का अवार्ड मिला, संत ज़ेवरियस मे 8 साल तक पढ़ाया और इस वक़्त सिटी इंटरनेशनल स्कूल बस्ती मे पढ़ा रहा था ।
प्राइमरी मे पढ़ाने के लिए टेट का इम्तिहान पास करना होता है मैने वो भी किया उसके बाद सुपर टेट भी किया ।

उत्तर प्रदेश की योगी हुकूमत ने प्राइमरी मे सहायक अध्यापक के लिए 69000 टीचरों की वैकेंसी निकली जिसमे मे मेरा सलेक्शन होगया । मामला कोर्ट मे चला गया । हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने हमारे खिलाफ फैसला दिया । मामला डबल बेंच के पास गया तो फैसला हमारे हक़ मे आया । विरोधी सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए । माननीय सुप्रीम कोर्ट ने विरोधियों की दलीलों को ख़ारिज करते हुए हम लोगो की नौकरी पर मोहर लगा दी और उप की योगी होकूमत को आदेश दिया कि इन लोगो को तत्काल प्रभाव से नियुक्ति पत्र दिया जाय ।

इस तरह अब्बा ने ऊँगली पकड़ा कर मदरसा अशरफुल उलूम से नव्वागांव और मुण्डेरवां होते हुए बस्ती का रास्ता दिखाया था और जो खुवाब देखा था आज पूरा हुआ......
आज मै बहुत खुश हूँ, मेरा घर, मेरे दोस्त अहबाब और मेरे पुरे गांव के लोग सब खुश है मोबारक बाद का सिलसिला जारी है.....

आज जब नियुक्ति पत्र मुझे दिया जा रहा था बज़ाहिर मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट थी... सुकून था.....लेकिन मै रो रहा था.... आँखों मे आंसू नही थे ....अब्बा का चेहरा बार बार आँखों के सामने आ रहा था....काश आज वो होते.....

घर पहुंचा अम्मा का चेहरा फूल की तरह खिला हुआ था... घर का हर फर्द खुश था....लेकिन इस ख़ुशी के मौके पर अब्बा की जुदाई का जो दर्द मेरे सीने मे हो रहा था उसका इज़हार मै कैसे करता.....आज जब आराम करने का वक़्त आया तो पहले ही चले गए....

सीधा अब्बा की क़ब्र पर पंहुचा...ख़ुशी का इज़हार करता तो कैसे करता....रोता तो अब्बा की रूह को तकलीफ पहुँचती...... फातेहा पढ़ी मग़फ़िरत की दुआ की..... काफ़ी देर तक अब्बा की क़ब्र को देखता रहा.....

मेरी कामयाबी के पीछे उनकी एक एक बातें मेरे ज़ेहन मे गर्दिश कर रही थीं .........

 

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