आंध्र के निस्वार्थी डॉक्टर’ की कहानी, कभी कम फ़ीस, तो कभी मुफ्त इलाज करते थे डॉ.इस्माइल
डॉ.इस्माइल की मौत से सच में केवल कर्नूल ही नहीं बल्कि तेलुगु क्षेत्र और इंसानियत का बड़ा नुक्सान हुआ है
हैदराबाद: (अर्शिया मोईनदीन / दक्कन डायरी ) दुनिया में जहां लोग सत्ता, शोहरत, पैसों के पीछे भाग रहे हैं, थोड़े बहुत पैसे कमाने के लिए वैध या अवैध का ख़याल नहीं रखते हैं, संपत्ति के नाम पर अपनों के खून बहाने के लिए तैयार रहते हैं, जहां शिक्षा और चिकित्सा जैसी सेवाएं भी व्यवसाय का साधन बन गयी हैं, उसी दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो खुद का फायदा नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा करना चाहते हैं। वे अपनी ख़ुशी से पहले दूसरों की ख़ुशी चाहते हैं, अपने फायदे से पहले दूसरों का फायदा चाहते हैं।
आंध्र के कर्नूल शहर में एक ऐसे ही डॉक्टर थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी में अपने पेशे को कभी केवल एक पेशे के तौर पर नहीं देखा बल्कि दूसरों की सेवा और भलाई के जरिये के तौर पर देखा। जब दुनिया में चिकित्सा व्यवसाय बन गयी और इलाज के दाम आसमान छूने लगे, तब इस चिकित्सक ने मरीजों के लिए अपने अस्पताल और घर दोनों के दरवाजे हमेशा खुले रखे। पैसे हों या न हों, दिन हो या रात हो, यह डॉक्टर हमेशा उपलब्ध रहते थे। मरीज इनके पास किसी भी हालत में, किसी भी वक्त आने से हिचकिचाते न थे।
इस डॉक्टर के बारे में इतना कुछ जानने के बाद, इनकी इतनी तारीफ सुनने के बाद जाहिर सी बात है कि आप उत्सुक हो रहे होंगे कि यह डॉक्टर आखिर हैं कौन? ये हैं कर्नूल के डॉ.के.एम.इस्माइल हुसैन, जिन्होंने कर्नूल मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और एमडी पूर्ण किया और फिर हॉस्पिटल व मेडिकल कॉलेज में शिक्षक और अधीक्षक के तौर पर काम किया। करीब 25 साल पहले सेवानिवृत्ति के बाद डॉ.इस्माइल ने वन टाउन क्षेत्र में केएम हॉस्पिटल नामक अपना एक निजी चिकित्सालय शुरू किया।
डॉ.इस्माइल अपने निजी अस्पताल केएम हॉस्पिटल में शाम के 7 बजे से मरीजों को देखना शुरू करते थे और तब तक अस्पताल में रहते, जब तक आखरी मरीज से मिल न लें। इस कार्यविधि में वे इतने व्यस्त हों जाते कि समय का ख़याल ही न रहता और रात के 1 या 2 बज जाते।
उनके अस्पताल की एक और खासियत यह है कि उसमें एक कार्डबोर्ड का डिब्बा है, जिसमें मरीज इलाज के पैसे डालते। मरीज उस डब्बे में जितने चाहे पैसे डाल सकते और छुट्टे भी खुद से ले सकते थे। कुछ लोग 10 रूपए डालकर 5 ले लेते, तो कुछ 50 डाल कर 30 ले लेते। यदि कोई कुछ न भी डालना चाहे तो उनसे किसी प्रकार का सवाल नहीं किया जाता था। लोग उसमे जितना भी डालते, अपनी मर्जी से डालते। दिलचस्प बात यह है कि डिब्बे में जमा हुए अधिकतर पैसे गरीब मरीजों के इलाज में इस्तेमाल किये जाते थे।
डॉक्टर इस्माइल का जीवन सिद्धांत रहा कि “इलाज पहले, फ़ी बाद में”। इसीलिए लोगों में वे “2 रुपए डॉक्टर” के नाम से मशहूर हो गए थे। डॉक्टर कहते थे कि मैं मरीज़ों से फ़ीस कैसे ले सकता हूँ, क्योंकि मेरे 90% मरीज़ ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले होते हैं। डॉ.इस्माइल एक भरोसेमंद पारिवारिक डॉक्टर थे, जो हमेशा अपने मरीजों की कदर करते थे। एक मरीज का कहना है कि इस दौर में, जहां कई निजी अस्पताल व्यावसायिक हैं और मरीजों से ज्यादा से ज्यादा पैसे वसूल करने की कोशिश करते हैं, वहीं डॉ.इस्माइल केवल जरूरत पड़ने पर ही टेस्ट और दवा देते थे। ऐसे में भी यदि कोई मरीज टेस्ट और इलाज के पूरे पैसे नहीं भर सकता, तो वे जितना भर सकते हैं, उतना दे सकते थे।
डॉ.इस्माइल की प्रसिद्धि किसी स्थान या मजहब की सीमाओं के परे थी। वे केवल कर्नूल के मुसलमानों का इलाज नहीं करते हे, बल्कि शहर के कई हिन्दू, जैन और मारवाड़ी परिवारों का इलाज भी करते थे। पडोसी राज्यों के करीबी जिलों से भी लोग इलाज के लिए इनके पास आते थे। कुछ मरीज तेलंगाना के गढ़वाल और कर्णाटक के रायचूर से भी आते थे।
डॉ.इस्माइल के एक दोस्त ने बताया कि जब कभी वे काम के सिलसिले से कर्नूल जाते तो डॉक्टर के घर पर रुकते थे। एक बार जब वे डॉक्टर के घर में थे तब रात को करीब 2 बजे एक व्यक्ति पेट दर्द की वजह से डॉ.इस्माइल के घर आया था। डॉ.इस्माइल ने उसकी जांच की और दवाई की सलाह भी दी जिसके बाद व्यक्ति ने डॉक्टर का शुक्रिया अदा किया और वहां से चला गया। दोस्त ने बताया कि उस व्यक्ति ने डॉक्टर को फीस देना जरूरी नहीं समझा और किसी ने उससे फीस के बारे में पुछा भी नहीं था।
डॉ.इस्माइल मरीजों का इलाज करना इतना पसंद करते थे कि वे रमजान के महीने में भी हर वक्त उपलब्ध रहते थे। इतना ही नहीं, जब कोरोना वायरस महामारी शुरू हुई तब डॉ.इस्माइल हुसैन ने अस्पताल जाना छोड़ दिया था, परन्तु वे इतने उपलब्ध और प्रसिद्ध थे कि मरीज इलाज के लिए उनके घर तक पहुँच गए। वे चाहते तो कोरोना के डर से मरीजों को इलाज के लिए मना कर सकते थे, परन्तु ऐसी परिस्थिति में भी डॉक्टर ने कभी किसी मरीज को किसी भी वजह से इलाज से इंकार नहीं किया।
घर के सामने लम्बी कतार में डॉक्टर का इंतजार करना मरीजों केलिए असुविधाजनक होता इसलिए एक हफ्ते बाद डॉक्टर अस्पताल जा कर काम करने लगे। हमेशा की तरह डॉ.इस्माइल देर रात तक काम करने के बाद अस्पताल से घर लौटे परन्तु उन्हें क्या पता था कि वो दिन उनके काम का आखरी दिन था। रात को आराम करने के बाद जब अगले दिन सुबह उनकी आँख खुली, तब उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी। घर वाले उन्हें अस्पताल ले गए। कुछ दिन तक अस्पताल में उनका इलाज जारी रहा और 14 अप्रैल को कर्नूल गवर्नमेंट जनरल हॉस्पिटल में 76 की उम्र में उन्होंने अपनी आखरी सांस ली। मौत के अगले दिन, 15 अप्रैल को डॉ.इस्माइल कोरोना संक्रमित पाए गए और डॉक्टर के निजी के.एम.अस्पताल को सील किया गया।
अस्पताल के कर्मचारी और हाल ही में इलाज के लिए आये मरीजों को क्वारंटाइन सेंटर भेज दिया गया। डॉक्टर की पत्नी और बेटे और 3 बेटियों सहित 6 परिवार के सदस्य भी कोरोना संक्रमित पाए गए और उन्हें क्वारंटाइन में रखा गया है।
उनका अंतिम संस्कार भी प्रशासन द्वारा दिए गए नियम द्वारा उनके बेटे सहित केवल 5 लोगों की मौजूदगी में हुआ।स्थानीय लोग बताते हैं कि बड़ी दुःख की बात है कि उनका देहांत ऐसे हालात में हुआ। यदि हालात सामान्य होते तो आधे से ज्यादा कर्नूल उनकी दफ़न यात्रा में भाग लेता।कुछ महीने पहले 5 दिसंबर को डॉ.इस्माइल 76 वर्ष के हुए थे। डॉक्टर को अच्छी तरह से पहचानने वाले लोग इस बात से बिलकुल आश्चर्यचकित नहीं थे कि डॉक्टर ने अपने आखरी लम्हे मरीजों के इलाज में बिताये। बता दें कि, कर्नूल के मुस्लिम समाज में इनके अलावा डॉ.ग़फ़्फ़ार को भी ग़रीबों की सेवा के लिए याद किया जाता है, जिनका देहांत 1980 में हुआ था।
एक तीसरे डॉक्टर अब्दुल सत्तार हैं, जो कर्नूल मेडिकल कॉलेज के प्रिन्सिपल के तौर पर रेटायर होने के बाद से अब तक कन्सल्टेशन फ़ीस की परवाह किए बग़ैर अनथक जनसेवा में लगे रहे। बता दें कि, कर्नूल में बड़ी लोकप्रियता के बावजूद डॉ.इस्माइल ने कभी राजनीति में जाने के बारे में नहीं सोचा। 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनटीआर ने डॉ.इस्माइल को एमएलए टिकट और कैबिनेट में जगह देने का प्रस्ताव दिया था। परन्तु डॉ.इस्माइल ने प्रस्ताव में बिलकुल दिलचस्पी नहीं दिखाई। डॉ.इस्माइल पूर्व मुख्यमंत्री कोटला विजय भास्कर रेड्डी के भरोसेमंद लोगों में से एक थे और टीडीपी, तब की बीजेपी और अन्य राजनीतिक दलों में भी समान रूप से सम्मानित थे।
डॉ.इस्माइल के देहांत को कुछ समाज दुश्मन प्रवृत्तियाँ धार्मिक तथा साम्प्रदायिक रंग में रंगने की कोशिश करती देखी गयी। डॉक्टर पर यह आरोप लग रहा है कि उन्होंने तबलीगी जमात से जुड़े कुछ लोगों का इलाज किया होगा। इस बारे में डॉ.इस्माइल के एक पुराने ब्राह्मण दोस्त कुराडी चंद्र्शेखर कालकुरा ने एक वेब पोर्टल को यूँ जवाब दिया कि “उनकी सारी दिलचस्पी मरीज़ को जाँचने में होती थी। कोई भी डॉक्टर अपने मरीज़ से कभी यह नहीं पूछते कि वह पिछले दिनों किसी धर्मसभा या कार्यक्रम में गए थे या नहीं।”
स्थानीय विधायक हफ़ीज़ खान ने भी डॉ.इस्माइल की निस्वार्थ सेवा की तारीफ़ की और उनके जीवन तथा बाद में किसी विवाद से साफ़ इंकार किया। डॉ.इस्माइल की उदारता, कृपा व निस्स्वार्थता को देख कहा जा सकता है कि डॉ.इस्माइल की मौत से सच में केवल कर्नूल ही नहीं बल्कि तेलुगु क्षेत्र और इंसानियत का बड़ा नुक्सान हुआ है और उसने एक अमूल्य सुपूत को खोया है।

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