संभल हिंसा की रिपोर्ट का सिलेक्टिव लीक, मुसलमानों को निशाना बनाने पर हंगामा

 

लखनऊ। नवंबर 2024 की संभल हिंसा पर गठित न्यायिक आयोग की गोपनीय रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपे जाने के कुछ ही घंटों बाद मीडिया में लीक हो गई। लेकिन इसमें केवल वही हिस्से प्रकाशित किए गए, जिनमें हिंसा के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया गया। इस सिलेक्टिव लीक ने राजनीतिक तूफ़ान खड़ा कर दिया है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

यह 450 पन्नों की रिपोर्ट नौ महीने की जांच के बाद तीन सदस्यीय आयोग ने तैयार की थी, जिसकी अध्यक्षता इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस देवेंद्र कुमार अरोड़ा ने की। आयोग के सदस्य सेवानिवृत्त आईएएस अमित मोहन और सेवानिवृत्त आईपीएस अरविंद कुमार जैन थे। 28 अगस्त 2025 को रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी गई। प्रमुख सचिव (गृह) संजय प्रसाद ने इस रिपोर्ट को “गोपनीय” बताते हुए कहा था कि इसे पहले कैबिनेट में रखा जाएगा और फिर विधानसभा में पेश किया जाएगा। लेकिन अगले ही दिन अख़बारों में रिपोर्ट के अंश प्रकाशित हो गए, जिनमें केवल मुस्लिम नेताओं और संगठनों को हिंसा का साज़िशकर्ता बताया गया।

लीक अंशों के अनुसार, आयोग ने संभल सांसद जियाउर रहमान बर्क, पूर्व विधायक इक़बाल महमूद के बेटे सुहैल इक़बाल और जामा मस्जिद कमेटी पर हिंसा की साज़िश रचने, भीड़ जुटाने और विदेशी हथियार इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। रिपोर्ट में हिंसा को कथित जनसांख्यिकीय बदलाव, “तुष्टीकरण की राजनीति,” “लव जिहाद” और “गज़वा-ए-हिंद” जैसी कथाओं से भी जोड़ा गया।

महत्वपूर्ण बात यह है कि मीडिया रिपोर्टों में प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर कोई ज़िक्र नहीं था, जबकि माना जा रहा है कि आयोग ने उन पर भी सवाल उठाए थे। केवल मुसलमानों को निशाना बनाने वाले हिस्सों के लीक होने से यह आरोप तेज़ हो गया है कि जानबूझकर रिपोर्ट को सिलेक्टिव तरीके से लीक किया गया ताकि मुस्लिम समुदाय को बदनाम किया जा सके और सरकार तथा प्रशासन की नाकामी पर पर्दा डाला जा सके।

नागरिक समाज के नेताओं ने इस लीक की निंदा की है। पूर्व आईपीएस अधिकारी और आज़ाद अधिकार सेना के अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इसकी जांच की मांग की। उन्होंने कहा, “गोपनीय रिपोर्ट के सिलेक्टिव हिस्से लीक करना घोर आपत्तिजनक है। इससे सामाजिक सौहार्द को चोट पहुँचती है और राजनीतिक मंशा पर संदेह पैदा होता है।”

विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा पर रिपोर्ट को प्रोपेगंडा के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “सरकार विश्वास पैदा करने, सौहार्द कायम करने और रोज़गार देने में पूरी तरह विफल रही है। हिंदुओं के पलायन की यह कहानी दरअसल सरकार की असफलता का ही प्रमाण है।”

इस लीक ने योगी आदित्यनाथ सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सबसे अहम सवाल उठ रहे हैं—आखिर गोपनीय रिपोर्ट को लीक करने की इजाज़त किसने दी? केवल मुसलमानों को दोषी ठहराने वाले अंश ही क्यों उजागर किए गए? और संभल हिंसा को एकतरफा तरीके से पेश करने से किसे राजनीतिक फ़ायदा मिल रहा है?

फिलहाल, सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया है।
courtesy:indiatomorrowhindi.com

 

 

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