बिहार के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी आज़ाद हिंद फौज के बहादुर सिपाही सैयद कमरुल हसन रिज़वी को नमन

पटना/नई दिल्ली (एशिया टाइम्स विशेष ) भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में बिहार का इतिहास बलिदान और वीरता की कहानियों से भरा हुआ है। इस गौरवशाली गाथा में कई नाम मशहूर हैं, लेकिन अनगिनत ऐसे भी हैं जिनका नाम इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं हो पाया। इन्हीं गुमनाम नायकों में एक हैं सैयद कमरुल हसन रिज़वी का है , जिन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) में शामिल होकर अपना यौवन मातृभूमि की आज़ादी के नाम समर्पित कर दिया।


उनके करीबी रिश्तेदारनूर नूरऊल्लाह बताते हैं कि बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में बिहार के जहानाबाद के दौलतपुर में सय्यद मेंहदी हसन रिज़वी के यहाँ जन्मे रिज़वी साहब पर उस दौर की राष्ट्रवादी लहर का गहरा असर पड़ा। 


जब नेताजी ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ाई के लिए आज़ाद हिंद फौज में शामिल होने का आह्वान किया, तो उन्होंने बिना किसी हिचक के अपना जीवन इस संघर्ष के लिए अर्पित कर दिया। घर-परिवार की सुख-सुविधा छोड़कर उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण लिया और कई मोर्चों पर सेवाएं दीं,जिसका प्रमाण उनके परिवार के पास सुरक्षित दुर्लभ तस्वीरों में मिलता है।


औपचारिक सैन्य परेडों में भाग लेने से लेकर राइफल के साथ अभ्यास ड्रिल, और विमान व फील्ड यूनिट्स के पास साथियों के साथ खड़े होने तक, रिज़वी साहब का INA जीवन अनुशासन और त्याग का प्रतीक था.  कमरुल हसन रिज़वी ने पूरी सादगी और गरिमा के साथ नागरिक जीवन में वापसी की। मिशन से वापसी पर उन्हों ने भारतीय रेल्वे में पुलिस विभाग में दारोगा के पद पर जॉइन किया. लेकिन उनका किस्सा केवल परिवार की यादों और पुरानी तस्वीरों में ही सीमित रह गया।
आज, जब भारत अपने स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत का सम्मान कर रहा है, तब यह उचित समय है कि सैयद कमरुल हसन रिज़वी का नाम भी इतिहास के पन्नों पर उजागर हो। 


उनका साहस, समर्पण और मौन सेवा यह याद दिलाती है कि आज़ादी केवल प्रसिद्ध नेताओं की देन नहीं, बल्कि उन हजारों-लाखों साधारण लोगों के बलिदान का परिणाम है जिन्होंने सपनों के भारत के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया।सैयद कमरुल हसन रिज़वी को सलाम — एक भूला हुआ सपूत, जो आज़ाद हिंद फौज की पंक्तियों में और बिहार के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में सदा अमर रहेंगे।


एशिया टाइम्स की विशेष पेशकश

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