SC ने JSW स्टील की ₹19,700 करोड़ की समाधान योजना को दी मंजूरी, हजारों नौकरियों को मिला सहारा

शीर्ष अदालत ने अपने पिछले आदेश के संदर्भ में कहा कि जेएसडब्ल्यू कंपनी में काफी निवेश पहले ही कर चुकी है

सर्वोच्च न्यायालय ने आज भूषण पावर ऐंड स्टील (बीपीएसएल) के लिए जेएसडब्ल्यू स्टील की 19,700 करोड़ रुपये की समाधान योजना को बरकरार रखा और पूर्व प्रवर्तकों एवं कुछ ऋणदाताओं की आपत्तियों को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने अपने पिछले आदेश के संदर्भ में कहा कि जेएसडब्ल्यू कंपनी में काफी निवेश पहले ही कर चुकी है। ऐसे में उसकी योजना को रद्द करने के घातक परिणाम होंगे।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाले पीठ ने 2 मई के उस फैसले को वापस ले लिया जिसमें जेएसडब्ल्यू की योजना को रद्द करते हुए परिसमापन का आदेश दिया गया था। न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी (अब सेवानिवृत्त) और न्यायमूर्ति एससी शर्मा के पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि बीएसपीएल के लिए जेएसडब्ल्यू की समाधान योजना ‘अवैध’ और ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी), 2016 के प्रावधानों के ‘​खिलाफ’ है। उन्होंने कहा था कि भूषण स्टील की लेनदारों की समिति (सीओसी) को समाधान योजना को स्वीकार नहीं करना चाहिए था और राष्ट्रीय कंपनी विधिक पंचाट (एनसीएलटी) को उसे मंजूरी नहीं देनी चाहिए थी।

विशेषज्ञों ने कहा कि यह फैसला आईबीसी के तहत संभवत: ऐसा पहला मामला है जहां न्यायालय ने पिछले फैसले को पलट दिया है।

गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर रहील पटेल ने कहा, ‘फैसले में यह बदलाव बिल्कुल सही है क्योंकि समाधान योजना को लागू करने में हुई देरी की वजह जेएसडब्ल्यू नहीं बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्यवाही है।’ मगर कोचर ऐंड कंपनी के पार्टनर शिव सपरा ने कहा कि किसी फैसले को वापस लिए जाने से भविष्य के मामलों में चिंता बढ़ सकती है। उन्होंने कहा, ‘इस बात की क्या गारंटी है कि किसी अन्य ताकतवर वादी अथवा ढांचे में बदलाव के कारण भविष्य में समीक्षा नहीं होगी?’ कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि इस फैसले ने आईबीसी ढांचे को कमजोर करने के बजाय उसके बुनियादी सिद्धांतों की पुष्टि की है कि लेनदारों की समिति की व्यावसायिक समझदारी का सम्मान किया जाना चाहिए। 

एसकेवी लॉ ऑफिसेज के पार्टनर सुहैल बुट्टन ने कहा कि जब किसी समाधान योजना को मंजूरी मिल जाती है और उसे सफल बोलीदाता द्वारा लागू कर दिया जाता है तो वही अंतिम हो जाती है।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपने फैसले में कहा कि पूर्व प्रवर्तकों के पास तकनीकी तौर पर आईबीसी की धारा 62 (एनसीएलएटी के आदेश के विरुद्ध अपील) के तहत अपील करने का अधिकार है, लेकिन उनकी आपत्तियां गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दी गईं। 

उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल देरी ही किसी समाधान योजना को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है, खास तौर पर ऐसे मामलों में जब ऐसा मुख्य तौर पर धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्यवाही के कारण हुआ हो। 

पीठ ने कहा कि लेनदारों की समिति की व्यावसायिक समझदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि किसी स्वीकृत योजना को दोबारा खोलने से ‘भानुमती का पिटारा खुल जाएगा’ और आईबीसी ढांचे की पवित्रता नष्ट हो जाएगी।

न्यायालय ने इस पर गौर किया कि जेएसडब्ल्यू ने बीपीएसएल को पुनर्जीवित करने और आधुनिक बनाने के लिए पर्याप्त निवेश किया जिससे वह मुनाफा देने वाली कंपनी बन गई। न्यायालय ने यह भी कहा कि कंपनी के चालू रहने से हजारों कर्मचारियों की आजीविका बरकरार रही।

 

 

 

 

courtesy:hindi.business-standard.com

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