राजनाथ सिंह के बयान पर उठा बवाल

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान पर उबाल आया हुआ है जिसमें उन्होंने सावरकर के अंग्रेजों से माफी मांगे जाने को महात्मा गांधी से जोड़ दिया है। राजनाथ सिंह ने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में बोलते हुए कहा था कि सावरकार ने माफी महात्मा गांधी की सलाह पर मांगी थी। इस बयान के बाद सियासी हलकों व  इतिहासकारों की दुनिया में तूफान मच गया।

सभी नेताओं ने राजनाथ सिंह के बयान को इतिहास के विरुद्ध षडयंत्र करार दिया। नेताओं के अलावा इतिहासकारों ने भी राजनाथ सिंह को सही इतिहास पढ़ने की सलाह दे डाली। दरअसल राजनाथ सिंह का बयान जल्दी में या जानकारी के अभाव में दिया गया बयान नहीं है कि बल्कि आरएसएस के उस एजेंडे का हिस्सा है जिसे पूरा करने की जल्दी अब आरएसएस के लोगों में दिखाई दे रही है।

आरएसएस ने आजादी के बाद से ही  सत्ता प्राप्ति के लिए मेहनत की करनी शुरू कर दी थी जिसका मकसद देश को हिंदू राष्ट्र  घोषित करना था। 2014 में पहली बार मोदी सरकार बनने के बाद  आरएसएस ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कवायद तेज कर दी थी और दोबारा भाजपा की सत्ता प्राप्ति के बाद यह जल्दी और बढ़ गई है। इस जल्दी के पीछे और भी कारण हो सकते हैं। कोरोना ने जिस प्रकार दुनिया को बदला है उससे  देश के राजनीतिक समीकरण बदले बदले नजर आ रहे हैं। कोरोना काल में जनता को हुए जानी व माली नुकसान के बाद मोदी सरकार की छवि कमजोर हुई है।

इससे भाजपा और आरएसएस के लोगों को लगने लगा है कि शायद अगली बार मौका हाथ ना आए और अपने सपनों का भारत ना बना सकें। इसलिए बहुत जल्दी में ऐसी बहस देश में छेड़ना चाहते हैं जिससे देश में ऐसा माहौल बनाया जाना मुमकिन हो सके जो उनके हिंदू राष्ट्र बनाने के सपने को जल्दी से जल्दी पूरा करने में सहायक हो.  जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी सक्रिय हुई हैं और मीडिया कवरेज प्रियंका गांधी को मिलनी शुरू हुई है उससे तो यही लगता है कि अब भारतीय जनता पार्टी बहुत दिनों तक सत्ता पर काबिज रहने का सपना नहीं देख सकती।

जिस प्रकार अमित शाह कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते रहे हैं लेकिन अब किसी भी तरह से नहीं लगता ऐसा मुमकिन होने जा रहा है। उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रियंका गांधी की तरफ जनता का ध्यान जितना बढ़ेगा उतना ही कांग्रेस 2024 में भाजपा को कड़ी टक्कर दे पाएगी। इसलिए भाजपा नेता बहुत जल्दी अपने एजेंडे और मकसद को पा लेना चाहते हैं, इसलिए संघ से संबंध रखने वाले राजनाथ सिंह जैसे पढ़े-लिखे नेता ऐसे बयान देने पर मजबूर हैं।

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