“रिज़वना तुम जहां भी रहना, शरारत भरी मुस्कान के साथ रहना”
अपनी मेहनत और लगन की बजह से ही वो यूथ की आवाज़ से लिखते-लिखते वायर हिन्दी, बीबीसी हिन्दी, द प्रिंट तक को अपने अर्टिकल भेजने लगी

रिज़! तुम बहादुर और नेक दिल लड़की थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतनी बहादुर और इतना बोलने वाली लड़की ऐसे बिना बोले चुपचाप चली जाएगी। लेकिन शायद हम लोग जैसे दिखते हैं, अन्दर से वैसे नहीं होते हैं। खैर, मैं तुम्हारे जाने का दुख इसमें नहीं लिखूंगी।
मैं चाहती हूं, लोग मीडिया की दुनिया की तेजतर्रार पत्रकार की कहानी जानें। तुमने ये सब हालिस करने के लिए बहुत मेहनत की है, तुमको एक चुलबुली-सी रिज़ से एक गम्भीर रिज़ बनते देखा है मैंने। आज से करीब 3 साल पहले खबर लहरिया के साथ जुड़ी तो पहले-दूसरे दिन रिज़ को नहीं देखा था। वो अपने घर यानी वाराणसी गई थी। तीसरे दिन ऑफिस में सुबह से ही सब बोल रहे थे कि रिज़ कब आ रही है। रिज़वाना को हम सब लोग प्यार से रिज़ बोलते थे। सबके मुंह से उसका नाम सुनकर मैंने सोचा होगी कोई सबकी चहेती।
जब वो ऑफिस में आई, तो देखा एक छोटी-सी बच्ची खूब सारी बातों के साथ लौटकर आई है। वो सबके पास जाकर चहक रही है। उसने मुझे देखा और मेरे पास आई , बोली मैं रिज़वाना। मैं हैरान इतनी-सी बच्ची की आवाज भारीपन के साथ गम्भीरता भी ली हुई थी लेकिन आंखों में शरारत थी।
खैर, मेरे और रिज़ के वर्क स्टेशन के बीच में एक वर्क स्टेशन और था लेकिन उस वर्क स्टेशन में कोई बैठता नहीं था। बहुत ही जल्दी मेरी और रिज़ की दोस्ती हो गई। वो बहुत हंसमुंख थी, इसी कारण से ऑफिस में सबसे उसका याराना था। यहां तक की वो हमारी सीनियर का भी मजाक बना देती थी और मुझे याद है, एक-दो बार को छोड़कर कभी किसी ने उसको इसके लिए कुछ कहा होगा।
रिज़ गज़ब की हाजिर जबाब थी। जब किसी को जबाव देती तो लोग बुरा माने के बजाय हंस देते थे। बचपने से भरी बातें करने वाली रिज़ आपको सलाह दें, तो आप उसको देखेंगे कि ये लड़की कितनी गम्भीर बात भी कह सकती है। रिज़ मेरे को हर दिन एक या दो जोक सुनाती थी, काम के बीच थोड़ी-सी राहत पाने के लिए वो मेरे को बोलती थी कि अलका, एक जोक आया हैं , फिर जोक पूरा ऑफिस सुनता और हंसता।

कभी नहीं सोचा था कि कितना हंसाने वाली लड़की जाते समय कितना रूला देगी। मेरी और उसकी खूब जमती थी, मुझे याद नहीं कि हम दोनों ने कभी लड़ाई की हो। हां, सुबह की मीटिंग में खबरों में अपने मत के लिए खूब बहस करते थे और मीटिंग खत्म होने के बाद ही सब पहले जैसा सामान्य भी कर लेते थे। जब रिज दिल्ली छोड़कर वाराणसी जा रही थी, तो मेरे को लगा कि शायद अब ये हमारी दोस्ती खत्म होने का समय आ गया है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैं और रिज फोन पर एक-दूसरे के बारे में हालचाल लेते रहे।
वाराणसी में रिज अपने को एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में स्थापित कर रही थी। साथ ही अपने लेखन में भी सुधार कर रही थी। वो ता और ती में गड़बड़ करती थी। उसने मुझे एक बार बताया था कि अच्छे लेखन के लिए एडिट लेख को पढ़ना और उसे अपने लेख से तुलना करना ज़रूरी है।
इस ही काम को करते हुए जल्द ही उसकी ये गड़बड़ ठीक भी हो गई थी। अपनी मेहनत और लगन की बजह से ही वो यूथ की आवाज़ से लिखते-लिखते वायर हिन्दी, बीबीसी हिन्दी, द प्रिंट तक को अपने अर्टिकल भेजने लगी। मुझे आज भी उसकी पहली वायर हिन्दी वाली न्यूज़ याद है, जो उसने प्रकाशित होने के बाद मुझे फोन पर उसकी खुशखबरी दी। उसके बाद तो ये सिलसिला चल पड़ा।

वो ऐसे पत्रकारिता के नामी शिक्षण संस्थान से नहीं थी कि काॅलेज के सीनियर खबरों को छापने में उसकी मदद कर दें। उसने बिना किसी मदद के अपने से ये रास्ते बनाए थे। हम हाल ही में पिछले साल अक्टूबर में मिले थे। वो अब जमीन की बात कहने वाली पत्रकार बन गई थी, अपनी खबर समय से लिखने के लिए एकदम पाबंद हो चुकी थी। लेकिन इन सबके बावजूद भी उसने आपने अन्दर की वो शरारती लड़की कहीं गुम नहीं होने दी थी।
आज जब मैं उसके ना होने की खबरें पढ़ रही हूं, तो कई बार उसके फोन नम्बर को देख रही हूं और सोच रही हूं कि अब ये नम्बर भी मेरी बात रिज़ से नहीं करा सकता है। आखिर में बस इतना ही कहूंगी कि रिज़! तुम जहां भी हो वहां खुश रहना अपनी शरारत भरी मुस्कान के साथ रहना।
तुम मेरी दोस्त हो और हमेशा रहोगी
अलका

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