तो क्या इस्लामी फ़िक़्ह में ये दो बातें : मुसलमानों में नस्ल परस्ती और नस्ली श्रेष्टवाद को बढ़ावा देने की वजह बन रही है ?

इमामुद्दीन अलीग

इस्लामी फ़िक़्ह में दो बातें ऐसी हैं जो इस्लामी मसावात के जर्रीन उसूल से टकराती हैं और एक लंबे समय से मुसलमानों में नस्ल परस्ती और नस्ली श्रेष्टवाद को बढ़ावा देने की वजह बन रही है। पहली बात जो बेशुमार मुसलमानों को गुमराह करने की वजह बन रही है, वो है सय्यदों को ज़कात न देने का फैसला।

दूसरी बात दरूदे ब्राहीमी में मौजूद " आले मोहम्मद (स)" से नस्ले मोहम्मद(स) का मतलब निकलना। यह दोनों बातें बल्कि बड़ी गलतियां कहें तो मुनासिब होगा, मुसलमानों में नस्ल परस्ती को फरोग देने की वजह बन रही हैं और इन्हीं दोनों फिक़ही गलतियों की वजह से ही सय्यदों में नस्ली श्रेष्ठता का भाव परवान चढ़ा।

इन दोनों गलतियों से न सिर्फ इस्लाम का निज़ामे मसावात तार-तार हुआ है बल्कि इससे इस्लाम मे नस्ल परस्ती को एक हद तक मज़हबी मान्यता भी मिल गई है। यह दोनों ही नज़रिए मसावात से मुताल्लिक क़ुरान की बेशुमार मोहकम आयात से साफ तौर से टकराते हैं, इसलिए जरूरी है कि इन दोनों बातों की तावील की जाए या फिर उसूले फ़िक़्ह के मुताबिक क़ुरानी मौकिफ़ को तरजीह देते हुए उन्हें मंसूख किया जाए।

सैयदों को ज़कात न देने का अब तक का जो नज़रिया रहा है उसकी सबसे मुनासिब तावील ये मालूम पड़ती है कि उस हुक्म को सय्यदों के लिए खास न करके मंसबे खिलाफत/इमामत पर फ़ाइज़ हर खानदान पर नाफ़िज़ किया जाए।

खानदाने रिसालत पर ज़कात खाने पर पाबंदी लगाने का मक़सद बुनियादी तौर पर यही मालूम पड़ता है कि बैतूल माल में जमा ज़कात व सदक़ात की हिफाज़त के लिए एक उसूल तय करना था ताकि बैतूल माल की इसराफ़-व-तसरीफ, बेजा खर्च और नाजायज़ क़ब्ज़े पर हमेशा के लिए रोक लगाई जा सके।

ऐसे में ज़कात न खाने का यह हुक्म हर उस खानदान पर नाफ़िज़ होगा जो किसी भी दौर में मंसबे मंसबे खिलाफत/इमामत पर फ़ाइज़ हो। वो हुक्म सिर्फ सय्यदों के लिए खास करने से सय्यदों को खुद-बखुद दूसरे मुसलमानों पर एक तरह की फ़ज़ीलत हासिल हो जाती है इसलिए उसे किसी नस्ल और ज़ात के लिए हरगिज़ खास नहीं माना जा सकता। अगर इस  तावील से भी काम न बने तो उसूले फ़िक़्ह के मुताबिक उस हुक्म और इससे मुतालकीक़ सभी हदीसों को मंसूख माना जाएगा।

रही बात दरूदे ब्राहीमी की तो वहाँ भी "आल" से मुराद नस्ले मुहम्मद न लेकर औलादे मुहम्मद ही लिया जाना चाहिए। किसी नस्ले खास पर दरूद भेजने का मतलब नस्ल परस्ती, नस्ली फ़ज़ीलत और बरतरी के सिवा कुछ हो ही नहीं सकता। औलादे रसूल चूंकि तरबियत और आमाल के लिहाज से एक आला मक़ाम पर फ़ाइज़ थे इसलिए दरूदे ब्राहीमी में आल से मुराद सिर्फ औलादे मोहम्मद (स) और औलादे इब्राहीम(स) ही लिया जाना चाहिए न कि उनकी क़यामत तक की नस्लें ताकि मसावात से मुताल्लिक क़ुरान की मोहकम आयात पर कोई हर्फ न आ सके और इस्लाम के दामन को नस्ल परस्ती से दागदार होने से बचाया जा सके।

समानता और ऊंच-नीच से क़ुरान का मौकिफ़ बिल्कुल वाज़ेह है। इस बारे में क़ुरान क्या कहता है खुद पढ़ें:
“ऐ लोगों! हमने तुम को एक पुरुष और महिला से पैदा किया फिर तुम से क़ौमें और क़बीले बनाए ताकि तुम एक दूसरे को पहचान सको। निश्चित रूप से तुम में अधिक सम्माननीय वह है जो अल्लाह से सबसे अधिक डरता है।" (सूरह हुजरात: 13)
इस इस आयत की सबसे अच्छी व्याख्या हज के दौरान अराफात के मैदान में खुद पैगंबर मुहम्मद (स) द्वारा की गई थी। इस्लामी समानता की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा: 
“हे लोगों! तुम्हारा ईश्वर  एक है और तुम सब एक पिता आदम की संतान हो। किसी भी अरबी को किसी भी ग़ैर अरबी पर किसी प्रकार की श्रेष्ठता हासिल नहीं है, न किसी भी ग़ैर अरबी को किसी भी अरबी पर कोई श्रेष्ठता हासिल है, किस भी काले को किसी भी गोरे पर कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है और इसी तरह किसी भी गोरे को किसी भी काले पर कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है। श्रेष्ठता का पैमाना केवल तक़वा है। ”(मसनद अहमद 22978)
इसी तरह कुरान ने यहूदियों और ईसाइयों की श्रेष्ठता के दावे को भी बड़ी मुखरता से खारिज किया है। अल्लाह कहता है:
"यहूदी और ईसाई कहते हैं: हम अल्लाह के बेटे हैं और उसके चहेते हैं। कहो: फिर वह तुम्हारे पापों पर वो तुम्हें सज़ा क्यों देता है? बल्कि अन्य जीवों की तरह तुम भी एक आम मानव हो, वो जिसे चाहे माफ करेऔर जिसे चाहे सज़ा दे।" (सूरह अल- माइदा:18)
एक बार हज़रत अबू ज़र गफ़्फ़ारी (र) हज़रत बिलाल बिन रबाह (र) से नाराज़ हो गए और उनसे कहा, "ऐ काली माँ के बेटे।" पैगंबर (स) यह सुनकर क्रोधित हो गए और उन्होंने कहा: "तुम हद पार कर चुके हो, तुमने हद पार कर दी। कर्म और खुदा खौफी को छोड़ कर एके गोरी मां के बेटे को एक काली माँ के पुत्र पर कोई श्रेष्ठता हासिल नहीं है" यह सुन कर हज़रत अबू ज़र ने अपना चेहरा ज़मीन पर रखा और हज़रत बिलाल से कहा कि आप मेरे चेहरे पर अपना पैर रखें।

नोट - यह लेखक के अपने विचार हैं  इस से एशिया टाइम्स का सहमत होना ज़रूरी नहीं ,लेकिन है यह अति गंभीर सवाल है , इस पर इस्लामी फ़िक़्ह  के जानकारों को  विचार विमर्श  करना चाहिए 

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