जम्मू-कश्मीर में लोगों को क़रीब लाने की कोशिशों पर चर्चा
दिल्ली- जम्मू और कश्मीर में कश्मीरी संस्कृति की रक्षा और सद्भाव की वापसी के लिए दिल्ली के इंडिया इंचरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। नेशनल मिशन फॉर यूनिटी एंड ब्रदरहुड के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में तय किया गया कि सद्भभावना समूहों का गठन करके कश्मीरी मूल के तमाम लोगों के बीच संवाद क़ायम करने की दिशा में कार्य किया जाए।आईआईसी में आयोजित इस कार्यक्रम में जम्मू और कश्मीर के मौजूदा सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक मसलों पर चर्चा की गई। इनमें मुख्य रूप से कश्मीरी संस्कृति को बचाने, युवाओं को अपनी जड़ों की तरफ वापस ले जाने जैसे सवालों पर बात हुई। इसके अलावा उपस्थित जनों इस बात पर भी विमर्श किया कि जम्मू और कश्मीर में आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से निपटने के लिए किस तरह के प्रयास किए जाएं।
इस मौक़ पर वक्ताओं ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कश्मीरी युवा लगातार हताशा और नशे की गिरफ्त में फंस रहे हैं। बैठक को संबोधित करते हुए राजू जुत्शी ने कहा कि लोगों की छोटी-छोटी परेशानियां दूर करने की कोशिशें हों। साथ ही कश्मीर में शिक्षा, संस्कृति और सामुदायिक विकास के लिए कार्य किया जाए। रमेश राज़दान ने सुझाव दिया कि इन प्रयासों में विभिन्न स्तर पर शासन सरकार के अलावा उन लोगों की भी मदद ली जाए जो क्षेत्र में शांति, सद्भाव और विकास के लिए काम करना चाहते हैं। इस बैठक में सिविल सोसायटी से जुड़े तमाम लोगों ने तय किया कि जम्मू कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी पंडितों और राज्य के मुसलमानों के बीच सद्भभाव क़ायम करने के लिए ज़मीनी स्तर पर ठोस कार्य किया जाना चाहिए। उपस्थित जनों ने कहा कि ऐसे आयोजनों को बढ़ावा दिया जाए जिनमें दोनों समुदायों के युवाओं और महिलाओं की हिस्सेदारी हो। तमाम लोगों के बीच इस बात पर सहमति बनी कि यह आयोजन कश्मीर में ही किए जाएं जिसकी ज़िम्मेदारी वहां रह रहे लोग उठाएं। इस बात पर सभी ने ज़ोर दिया कि इन आयोजनों के ज़रिए कश्मीरी भाषा, वहां के प्राचीन स्थलों और सांस्कृतिक संस्थाओं से उन युवाओं को जोड़ा जाए जो अभी तक इन सबसे अंजान हैं।बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर रवि ज़ुत्शी ने चिंता जताई कि जम्मू और कश्मीर में बाहरी भाषाओं और बाहरी संस्कृति के प्रचार प्रसार के कारण स्थानीय बोलियां और भाषाएं नष्ट हो रही हैं।
उन्होंने कहा आज़ादी के बाद कश्मीर अकेला राज्य था जहां स्थानीय कश्मीरी भाषा को राजकाज की भाषा नहीं माना गया और यह स्थिति आज तक क़ायम है। कश्मीर में अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू में शिक्षण के अलावा तमाम सरकारी कार्य समझ से परे हैं। सरकार को इस पर ग़ौर करना चाहिए और कश्मीर की स्थानीय ज़बानों को ज़िंदा रखने में मदद करनी चाहिए। बैठक को संबोधित करते हुए शेख़ मंज़ूर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जम्मू और कश्मीर में ऐसे संस्थानों औऱ विश्विविद्यालयों की स्थापना हो जहां कश्मीरी भाषा को प्रमुखता दी जाए। इस मौक़े पर शेख़ ग़ुलाम रसूल ने कहा कि जबतक कश्मीरी भाषा को रोज़गार और राजकार्य से नहीं जोड़ा जाएगा तबतक इस समस्या का हल नहीं होने वाला।फिल्मकार नीलोफर शमा ने कश्मीरियों से आह्वाहन किया कि वो अपनी संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए लगातार प्रयास करें और सरकार से इस संबंध में संवाद स्थापित करें। लेखिका रुकमा दत्ता ने मांग की कि जिन स्थानों के नाम बदल दिए गए हैं उनको उनकी पुरानी पहचान वापस दिलाई जाए। जबकि अंजलि अदा ने मांग की कि कश्मीर में ऐसे आयोजन किए जाएं जिनसे नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़ने के अधिक अवसर मिल पाएं। जम्मू कश्मीर अवामी नेशनल कांन्फ्रेंस के नेता मुज़फ्फर शाह ने इस अवसर पर कहा कि यह न सिर्फ नेताओं बल्कि सिविल सोसायटी की भी ज़िम्मेदारी है कि लोगों के दिलों का मैल दूर किया जाए। हम सभी मिलकर कोशिश करें कि लोग आपस के गिले-शिकवे भूलकर जम्मू-कश्मीर को आगे ले जाने की दिशा में काम करें। साथ ही सभी लोग कश्मीरियत का देश के दूसरे हिस्सों में भी प्रचार प्रसार करें ताकि लोग हमें बेहतर तरीक़े से समझ सकें। पत्रकार क़मर आग़ा ने कहा कि जबतक एकदम निचले स्तर पर लोगों को बीच संवाद नहीं होगा तबतक इन प्रयासों को सफलता नहीं मिलने वाली। पत्रकार ज़ैग़म मुर्तज़ा ने सुझाव दिया कि कश्मीर के मुसलमान और कश्मीरी पंडित एक दूसरे के परिवारों की अपने यहां मेज़बानी करें। कोशिश करें कि कोई एक परिवार एक दूसरे के यहां कम से कम एक दिन गुज़ारे। इससे लोगों के बीच सांस्कृतिक संवाद क़ायम होगा।
इसके बाद तय किया गया कि जल्द ही सांस्कित, आर्थिक, और शैक्षणिक मुद्दों पर समूहों का गठन करके जम्मू-कश्मीर जाया जाए और अधिक से अधिक लोगों को इस सद्भवना मिशन से जोड़ा जाए। साथ ही ऐसे प्लेटफार्म बनाने की कोशिशें हो जहां सभी वर्गों के लोग बिना किसी डर के शिरकत कर सकें।बैठक के अंत में एनसीपी नेता और इस कार्यक्रम के मुख्य आयोजक राकेश सप्रू ने सभी को धन्यवाद दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस तरह की कोशिशें आगे भी जारी रहेंगी जो देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे कश्मीरी समाज के लोगों को क़रीब लाएं। उन्होंने यक़ीन दिलाया कि मिशन फॉर यूनिटी एंड ब्रदरहुड की तरफ से आगे भी विभिन्न समूहों के बीच संवाद क़ायम करने की कोशिशें करते रहेंगे।कार्यक्रम को डा. मुहम्मद हुसैन, प्रभु राज़दान, एजी ख़ान और रुकमा दत्ता ने भी संबोधित किया।

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