निरर्थक होती संसद :‘मनमोहन सिंह सरकार में जहाँ एक वर्ष में अध्यादेशों की संख्या छः होती थी, वह अब बढ़कर 11 हो गई है
निरर्थक होती संसद :‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित क्रिस्टोफ जैफ्रेलॉट और विहंग जुमले के लेख पर आधारित
परिभाषा के अनुसार, संसद आलोचना, विचार-विमर्श और सर्वसम्मति बनाने की संस्था है। संसदवाद लोकलुभावनवाद से अलग होता है, क्योंकि यह प्रतिनिधित्व वाले लोकतंत्र का प्रतीक है, और यह विरोधियों को दुश्मन न मानकर विरोधी ही मानता है। ऐसी संसद को दरकिनार करने के लिए मोदी सरकार ने कुछ भिन्न रास्ते अपना लिए हैं। राज्यसभा और लोकसभा में बहस, विचार-विमर्श और सर्वसम्मति के रास्ते बंद हो गए हैं। कुछ बिंदुओं से इसे स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है –
- मोदी सरकार ने लोकसभा में बहुमत हासिल करने के बावजूद अध्यादेशों का सहारा लिया है। आमतौर पर अल्पसंख्यक या गठबंधन सरकारें ही इसका सहारा लेती हैं। मनमोहन सिंह सरकार में जहाँ एक वर्ष में अध्यादेशों की संख्या छः होती थी, वह अब बढ़कर 11 हो गई है।
- संसदीय समिति को भेजे जाने वाले विधेयकों की संख्या घट गई है। पूर्व में एक शासनादेश के तहत, विधेयकों की जाँच-पड़ताल और समीक्षा करते हुए संसदीय समिति इन विधेयकों में प्रभावी संशोधन किया करती थी। इससे सांसदों को भी कानून-निर्माण संबंधी ज्ञान मिल जाता था। परंतु 2015 के बाद से संयुक्त संसदीय समिति के पास कोई भी विधेयक नहीं भेजा गया है।
- कई विधेयकों को वित्त विधेयक के अंतर्गत लाकर पारित करवाया गया है। वित्त विधेयक का संबंध कर या सरकारी व्यय से होता है। इसका कारण यह है कि वित्त विधेयकों में राज्य सभा कोई संशोधन करने का अधिकार नहीं रखती है। इस सदन में मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं है।
- सामान्य विधेयकों पर भी अधिक विचार-विमर्श नहीं हो पाता है। सांसदों को इसे बिल्कुल अंतिम समय में उपलब्ध कराया जाता है। विरोधियों द्वारा किए गए संशोधनों को स्वीकार नहीं किया जाता है। अगर बहस होती भी है, तो वह औपचारिकता और प्रक्रिया मात्र के लिए की जाती है। वर्ष 2018 के बजट पर भी ठीक से चर्चा नहीं की गई थी।
संसद का ऐसा ह्यास सभी को प्रभावित करता है। लेकिन परवाह किसे हैं ? सर्वोच्च न्यायालय ने वित्त विधेयक के नाम पर पारित किए जाने वाले आधार विधेयक को आखिरकार वैध ठहरा दिया था।
2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार समस्त दक्षिण एशिया में लोकतंत्र की स्थिति गिरती जा रही है। यदि 2005 और 2017 की तुलना करें, तो लोकतंत्र का समर्थन करने वालों का प्रतिशत भी गिरा हुआ दिखाई देता है। कुछ लोगों का मानना है कि हमें संसद और चुनावों से छुटकारा पाकर, लोगों के लिए निर्णय लेने और नीतियां बनाने का काम विशेषज्ञों को सौंप देना चाहिए। लोकतंत्र को प्रतिस्थापित करने के विचार पर सवाल बहुत उठाए जा सकते हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि किसी प्रतिनिधि संस्था के बगैर लोकतंत्र को कैसे चलाया जा सकता है ?
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित क्रिस्टोफ जैफ्रेलॉट और विहंग जुमले के लेख पर आधारित। 15 अक्टूबर, 2020

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