कोरोना लाए प्लेन वालों से किराया नहीं, मजदूर ट्रेन की टिकट लेंगे!

Written by Mithun Prajapati

 

साधो, दुनिया कोरोना संक्रमण की महामारी से जूझ रही है। छोटे और अविकसित देशों की क्या बात, अमेरिका, चीन जैसे विकिसत देश भी मूलभूत मेडिकल एक्वपमेंट की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में भारत में इन चीजों की कमी होना बहुत बड़ी बात नहीं है। पर साधो भारत में जो संसाधन उपलब्ध हैं उनका एक खास वर्ग तक ही पहुंच पाना दुखी करता है। और इस महामारी में सरकार ने जितनी विडंबनाएँ दिखाई हैं उतनी कभी देखने को न मिली। सिर्फ सरकार ने ही नहीं प्रशासनिक अधिकारी से लेकर हर वह व्यक्ति जो इस बुरे दौर में लोगों की मदद कर मिसाल बन सकता था लूट का कोई मौका नहीं छोड़ा। 

साधो, चीन में कोरोना संक्रमण का शुरुआती दौर तुम्हें याद है ? इस साल के शुरुआत के दो महीनों जनवरी और फरवरी में जब चीन कोरोना से जूझ रहा था तभी दुनिया के बाकी देशों को सजग हो जाना था। कुछ हो गए थे। साधो, तुम्हें याद होगा, इस समय दुनिया के सबसे संक्रमित देश अमेरिका और भारत उस समय भरत मिलाप की तैयारी कर रहे थे। भारत में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार को कोरोना को लेकर चेताया भी था। पर उनका मजाक बनाया गया। उस समय ही यदि गैर जरूरी विदेशी यात्राओं पर प्रतिबंध के साथ स्क्रीनिंग आदि की शुरुआत हो गई होती तो शायद भारत की आज जो स्थिति है वह न होती।

साधो, तुम्हें अब मैं इस कोरोना काल में भारत में वर्गभेद समझाता हूँ। जब भारत में लॉकडाउन शुरू हुआ तो विदेश की विमान यात्राएं भी ठप हो गईं। अब विदेश में फसें 'उच्च वर्ग' और 'उच्च मध्य वर्ग' को तो वापस लाना ही था। सरकार उन्हें ले आई जिसकी सराहना की गई और बेशक की जानी चाहिए। पर सरकार जिन लोगों को ले आई उनसे किराये के रूप में कुछ भी न लिया गया था। पूरे देश ने सरकार के इस महान कार्य की सराहना की। 

साधो, उस महान कार्य को बीते करीब डेढ़ महीनें हो गए हैं। पूरे भारत में लॉकडाउन से शहरों में फंसे मजदूर और छोटे व्यापारी काम धंधा ठप होने से अबतक त्रस्त हो चुके हैं। देश के हर कोने से भूख से दम तोड़ते बिलखते मजदूर भाइयों की आप बीती रोज सुनने को मिल रही है। इस स्थिति में बहुत मांग और आवाज उठने पर सरकार ने स्पेशल बस और ट्रेन चलाने का फैसला किया जो कि सही भी है। पर साधो, इस भयावह स्थिति में उन मजदूर यात्रियों से किराये के पैसे वसूलना कहाँ का न्याय है ?  काम बंद होने से जैसे तैसे इनके डेढ़ महीने कटे हैं। कितनों को पूरे दिन भोजन नसीब न हुआ। ऐसे लोगों से सरकार किराये वसूलकर अमानवीय कृत्य क्यों कर रही है समझ के परे है। यहाँ क्लास का भेद गजब समझ में आता है।

साधो, इस किराये वसूली पर सरकार ने कई तरह के बयान देकर बताना चाहा कि किराये नहीं लिए जा रहे, कुछ प्रतिशत राज्य सरकार किराया वहन करेगी आदि आदि। पर एक भी बात से स्पष्ट नहीं हो पाया कि मजदूरों से किराया नहीं लिया जा रहा। इसके उलट बहुत से साथियों की विश्वसनीय ग्राउंड रिपोर्ट देखने से पता चलता है कि किराया  लिया जा रहा है।

इस किराया वसूली पर एक न्यूज चैनल के एंकर ने पहले तो चैनल पर यह साबित करने की कोशिश कि सरकार किराया न ले रही। फिर उस एंकर महोदय ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए कहा- जो लोग शराब खरीद सकते हैं वो किराया भी वहन कर सकते हैं। 

साधो, ये बात इन्होंने हवाई जहाज से रेस्क्यू करके लाये जाने पर अपर क्लास के लिए कही होती तो कुछ हद तक जायज भी होती। पर परेशान मजदूर जो किसी भी तरह अपने घर पहुंचना चाहते हैं उनकी मजबूरी का मजाक उड़ाकर एंकर क्या साबित करना चाहता है समझ के परे है।

साधो, इस देश के संविधान में प्रधानमंत्री राहत कोष का प्रावधान है। इसमें जमा धन का उपयोग राष्ट्रीय आपदा में किया जाता है। इसमें भारत के नागरिक स्वेच्छा से अबतक देश के लिए धन देते हैं। इसके रहते मौजूदा सरकार 'पीएम केयर फण्ड' नामक अजूबा ले आई जिसका उद्देश्य बताया गया कि यह कोरोना से प्रभावित लोगों की मदद के लिए है। माननीय प्रधानमंत्री और सरकार ने लोगों से इसमें दान करने की अपील की।  लोगों ने इस कोरोना महामारी के दौर में  खूब पैसे इस फण्ड को दिए। भारतीय रेल ने भी इस पीएम केयर फण्ड में पैसे दिए। सरकार ने कुछ दिन पहले साफ कर दिया कि इस फण्ड का ऑडिट नहीं होगा। मतलब आपके दिए गए पैसे कहाँ उपयोग हुए यह आपको पता नहीं चल पाएगा।  साधो, क्या देश के महान एंकर लोग रेल मंत्री जी से यह पूछने का साहस करेंगे कि जब रेल मंत्रालय ने पीएम केयर फण्ड में रुपये दिए हैं तो कोरोना से प्रभावित मजदूरों से क्यों किराया वसूला जा रहा है ? शायद नहीं। क्योंकि साधो, सरकार के जी हुजूर हो गए एंकर वही सवाल करेंगे जो सरकारी हित में होगा। बाकी क्लास मैटर्स... सवालों के लिए वर्ग भी मायने रखता है। 

 

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