राखी के साथ जुड़े हैं मुस्लिम-राजपूत संबंध

अब्दुल रशीद अगवान

अगर आप राखी के इतिहास को तलाश करेंगे तो इसका ज़िक्र पुरानी मज़हबी किताबों में शायद ही मिले। मगर इसका पहला ऐतिहासिक हवाला दिल्ली के बादशाह हुमायूं और मेवाड़ की रानी कर्णावती या कर्मावती के राजनैतिक और सांस्कृतिक संबंधों में मिलता है। 


यह कहा जाता है कि उत्तर भविष्य पुराण में राखी का ज़िक्र है, मगर वहां रक्षाबंद एक राजा को सगुन के लिए एक पुरोहित बांधता है। एक तो ख़ुद भविष्य पुराण मुग़ल दौर का लिखा हुआ माना जाता है और उस पर 'उत्तर' नाम ही से मालूम होता है कि यह पुराण उसके भी बाद का है। 
जिस तरह की राखी का रिवाज आज चलन में है उसके बारे में कर्नल टाॅड ने 1829 में अपने राजस्थान के इतिहास में लिखा है कि राखी मुंह बोले भाई (adopted brother) के हाथ में अपनी रक्षा को निश्चित करने के लिए बांधा गया धागा है जो उस वक्त राजपुतों में चलन में था। यहां दो बातें साफ हैं, पहली यह कि उस समय तक राखी सगे भाई के नहीं बल्कि एक मुंह बोले भाई के हाथ में बांधी जाती थी क्योंकि सगा भाई तो वैसे ही अपनी बहिन की सुरक्षा के लिए पाबंद है। और दूसरी यह कि इसका रिवाज सिर्फ राजपुतों में था। 


हुमायूं एक मुंह बोला भाई था कर्णावती एक राजपूत रानी। ऐसा माना जा सकता है कि राखी बांधने का रिवाज सबसे पहले रानी कर्णावती या कर्मावती की ओर से मुग़ल बादशाह हुमायूं को भेजी गई राखी से ही शुरू हुआ है। 
यह घटना 1534 की है। 


रानी कर्णावती महाराणा सांगा कि विधवा थीं जिन्होंने आगरा के पास खानवा में बाबर के ख़िलाफ़ एक बड़ी फौज लेकर युद्ध किया था। 1527 के इस युद्ध में राणा सांगा या संग्राम सिंह की हार हुई। इस हार के क़रीब दस महीने बाद, उनको एक राजनैतिक षडयंत्र में उनके ही साथियों ने ज़हर देकर मार डाला। उनकी मौत के बाद रानी ने अपने बड़े बेटे के नाम पर राज करना शुरू कर दिया। 
मेवाड़ की कमज़ोरी को भांप कर गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने 1934 में चित्तौड़गढ़ पर हमला किया। उसका हमला होने की ख़बर मिलते ही रानी ने हुमायूं को अपना मुंह बोला भाई मानते हुए राखी भेजी और मदद की गुहार लगाई। मगर बहादुरशाह, हुमायूं से पहले पहुंच गया और हार को सामने देखते हुए रानी ने 8 मार्च 1534 को जौहर कर लिया। 
आजकल इतिहासकार राखी की इस कहानी को सच नहीं मानते हैं। 


मगर उन्हीं दिनों हुमायूं का चित्तौड़गढ़ पहुंचना, बहादुरशाह को हराना और रानी के बेटे को राजगद्दी पर बैठा कर दिल्ली लौट जाना यह साबित करता है कि भले ही उस दौर के किसी लेखक ने इस बारे में न लिखा हो, यह एक सही घटना लगती है।
रानी जानती थी कि उस कठिन समय में हुमायूं ही उसकी मदद कर सकता था क्योंकि दो साल पहले बहादुर शाह हुमायूं से हार चुका था। इसकी एक वजह और थी। 30 जनवरी 1528 को उनके पति को उनके ही दरबारियों ने ज़हर दे कर मार दिया था, इसलिए उन्हें यह भरोसा नहीं था कि उनमें से कौन उनका साथ देगा और कौन गद्दारी करेगा। बाबर ने राणा सांगा को हराने के बावजूद मेवाड़ पर क़ब्ज़ा नहीं किया और न उनके बेटे हुमायूं ने। इस हक़ीक़त ने भी रानी को भरोसा दिलाया कि उस मुश्किल दौर में हुमायूं उनका साथ ज़रूर देंगे।


बहरहाल राखी का त्यौहार राजस्थान की हदें पार चुका है और अब यह भाई-बहन के प्यार का प्रतीक बन चुका है। 

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