अपनी विधानसभा को जानिए - मेहदावल से चुन कर आई थीं उत्तर प्रदेश की चौथी मुख्मंत्री सुचेता क्र्पलानी

मेंहदावल का पहला विधानसभा चुनाव 1962 में हुआ , लम्बे समय तक भारतीय जनसंघ और कांग्रेस में रही टक्कर

नई दिल्ली (एशिया टाइम्स / शादाब ख़ान ) यूपी विधानसभा चुनावों में छः महीने का समय बाक़ी रह गया है। इस दौरान आप लीडरों की स्पीच सुन सकते हैं, टीवी पर तमाशा देख सकते हैं या एशिया टाइम्स की जानिए अपनी विधानसभा सीरीज़ देख या पढ़  सकते हैं। इस सीरीज़ में हम कुछ चुनिंदा विधानसभाओं से जुड़ी ख़ास कहानियां आप तक पहुंचाएंगे। आज हम बात करेंगे मेंहदावल के बारे में

मेंहदावल का पहला विधानसभा चुनाव 1962 में हुआ  

मेंहदावल विधानसभा में 4 लाख 40 हजार मतदाता हैं। इनमें 2 लाख महिलाऐं हैं, मुस्लिम मतदाता सवा लाख बताए जाते हैं। यह विधानसभा पहले ज़िला बस्ती में थी, अब जिला संत कबीर नगर में आती है। मेंहदावल के पहले विधानसभा चुनाव 1962 में हुए। इससे पहले यह खलीलाबाद विधानसभा का हिस्सा थी। अलग होने के बाद यह कॉंग्रेस और जनसंघ के लिए मुक़ाबले का मैदान बन गया। पहले चुनाव में कांग्रेस की सुचेता क्रिपलानी ने मेंहदावल में जीत हासिल की, साथ ही वह उत्तर प्रदेश की चौथी मुख्मंत्री भी बनीं।


भारतीय जनसंघ और कांग्रेस में रही टक्कर 

मार्च 1967 में हुए चौथे विधानसभा चुनाव में चन्द्रशेखर सिंह भारतीय जनसंघ के टिकट पर विजयी हुए। 1969 के चुनाव में लालसा प्रसाद विजयी हुए और यह सीट फिर कांग्रेस की झोली में आ गई। 1974 में एक बार फिर बाज़ी पलटी। चन्द्र शेखर सिंह जनसंघ के टिकट पर विधायक बने। 1977 में जनसंघ को ख़त्म कर दिया गया लेकिन चन्द्र शेखर जनता दल के टिकट से लगातार दूसरी बार विधायक बनकर आए।

 ‘शेरे उजियार मोहम्मद नबी खां और अफसर यू अहमद की जीत

फिर हुआ यूं कि 1980 आते-आते कांग्रेस दोबारा मज़बूत होने लगी। भाजपा अस्तित्व में आ चुकी थी लेकीन नई पार्टी होने के कारण वह ज़मीन पर अपने पांव नहीं जमा पाई थी। पूरे पूर्वांचल में ‘शेरे उजियार’ के नाम से मशहूर लीडर मोहम्मद नबी खां मेंहदावल के नए विधायक बनने में कामयाब हुए। जीत की इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए अफसर यू अहमद 1985 में विधायक चुने गए। अफ़सर यू अहमद अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के छात्र नेता थे। एएमयू से निकलते ही उन्हें कॉंग्रेस ने टिकट दे दिया।

जानिए अपनी विधानसभा एपिसोड-1 | 313 मेंहदावल में सत्ता की लड़ाई 1962 से अबतक | Asia Times TV

पूर्वांचल में भाजपा का बड़ा चेहरा थे चन्द्र शेखर सिंह   

दूसरी तरफ़ ‘भाजपा’ ने राम जन्मभूमि क नाम पर समर्थन जुटाना शुरू कर दिया था। इसमें उसे तेज़ी से कामयाबी हासिल हुई। सन् 1989 में भाजपा ने 57 सीटें जीतीं। राम मंदिर आन्दोलन की गर्म हवा के थपेड़े ने मेंहदावल में भी कांग्रेस को पीछे धकेल दिया और चन्द्र शेखर सिंह भाजपा की टिकट पर एक बार फिर मेंहदावल के विधायक बनने में कामयाब हो गए। चंद्रशेखर ने अपने आप को एक कद्दावर नेता के रूप में स्थापित कर लिया। 1991 में जब जनता दल की सरकार गिरी, दोबारा चुनाव हुए तब भी चंद्रशेखर ने जीत हासिल की। इस बार पशुधन मंत्रालय भी हासिल किया। 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद कल्याण सिंह सरकार भी गिर गई। अगले विधानसभा चुनावों के लिए सपा और बसपा का गठबंधन हुआ। उत्तर प्रदेश में “मिले मुलायम कांशी राम” का नारा उठा और प्रदेश में भाजपा हार गई। इसके बावजूद मेंहदावल में चंद्रशेखर ने ही जीत हासिल की।


मेहदावल के वोटर समाजवादी पार्टी के अब्दुल कलाम पर तीन बार हुए मेहरबान  

हालांकि 1995 के विधानसभा चुनाव में चंद्रशेखर अपनी सीट नहीं बचा पाए। भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति से जनता का मोह भंग हो गया। कांग्रेस इस राजनीति का कोई विकल्प पेश नहीं कर पा रही थी। लिहाज़ा मेंहदावल की जनता ने समाजवादी पार्टी के अब्दुल कलाम को विधायक चुना जो लगातार तीन बार मेंहदावल के प्रतिनिधि बने। साल 2012 में समाजवादी पार्टी ने लक्ष्मीकांत को टिकट दिया और वह भी मेंहदावल का किला फ़तह करने में सफ़ल रहे। समाजवादी के पास यह सीट 1996 से 2017 तक रही। 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की लहर चली और राकेश बघेल अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा के अनिल कुमार त्रिपाठी को 42 हजार वोटों से हराकर मेंहदावल से भाजपा के विधायक चुन लिए गए।

18 वीं विधान सभा के लिए 2022 में चुनाव होने हैं 

18 वीं विधान सभा के लिए 2022 में चुनाव होने हैं। भाजपा के लिए सीट पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखना बड़ा चैलेंज है। कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह 30 साल पहले जिस सीट को खो चुकी है वहां अपनी ज़मीन तलाश करे। कॉंग्रेस का दामन कई साल पहले छोड़ चुके मुस्लिम मतदाता सपा, बसपा, पीस पार्टी , एमआईएम जैसी पार्टियों की लंबी फ़ेहरिस्त में किस तरफ़ झुकेंगे, यह नतीजों पर गहरा असर डालेगा। .

आपको यह रिपोर्ट कैसी लगी  हमें कमेंट्स में बताइए हमारा इ मेल पता है : asiatimes.co.in@gmail.com 


0 comments

Leave a Reply