जर्नलिस्ट, एक्टिविस्ट बनाम एक्टिव जर्नलिस्ट!

बहुत बरसों तक मेरे साथ यह हुआ कि मैं एक्टिविस्टों में जर्नलिस्ट था और जर्नलिस्टों में एक्टिविस्ट .इस असमंजस की बड़ी वजह भी रही कि अगर कोई ख़बर लिखते लिखते नारे लगाने लगे तो इसे पत्रकारिता के एथिक्स में तो आलोच्य माना ही जायेगा. इसलिये जब एक तरफ़ सामाजिक कार्यकर्ता की पहचान बन रही थी ,तो उसमें पत्रकार की पहचान विलीन होती जा रही थी , लेकिन मेरे भीतर का पत्रकार कभी भी कमजोर नहीं हुआ.मैने खुद को कार्यकर्ता पत्रकार कहना जारी रखा, लिखता भी रहा और आंदोलनों में दिखता भी रहा, ज़रूरत पड़ी तो धरने प्रदर्शनों को नेतृत्व भी दिया.

यह मल्टी टास्किंग का मामला भी था, मुझ जैसे प्रोफेशनलिज्म की कम समझ रखने वाले ख़बरची के लिए यह भेद करना मुश्किल था कि किस कार्य की सीमा रेखा कहाँ तक है . मुझे कभी भी यह नहीं लगा कि मैं सिर्फ़ ख़बर लिख कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लूँ ,चूँकि मुझे कहीं यह नहीं सिखाया गया कि एक पत्रकार का काम लोगों तक खबरें पहुँचाना भर है ,न कि नेतागीरी करना.मुझे यह सीख़ मिली कि अगर कोई गड्डे में गिर गया है तो वह समाचार तो है ही ,पर उसे बाहर निकालने के लिये अपना हाथ भी आगे बढ़ाना पड़ता है .

तो मेरा पत्रकार मुझे एक सदैव सजग कार्यकर्ता बने रहने को प्रेरित किये रहता है , मैं सिर्फ़ लिखने के लिए लिख ही नहीं सकता , जिन मुद्दों पर मैं लिखता हूँ , उन पर लड़ता भी हूँ , पर इसका आशय यह क़तई नहीं है कि मैं कोई लड़ाकू पत्रकार हूँ . अब सवाल तो यही था कि पत्रकार भी हूँ या नहीं ? ऐसा सवाल इसलिये पैदा हुआ , क्योंकि न तो मैं किसी जर्नलिज़्म के स्कूल में पढ़ने गया और न ही मैने किसी नामचीन मीडिया हाउस के साथ काम किया, मेरे पास न सरकारी और न ही ग़ैर सरकारी प्रेस कार्ड रहा, न किसी ने मुझसे कभी कार्ड माँगा और न ही मैने किसी को दिखाया , दिखाता भी क्या , मेरे पास तो था ही नहीं ?

तक़रीबन तीस साल से पत्रकारीय कर्म से नज़दीकी ताल्लुक़ रहा है , पर बिना कार्ड का पत्रकार , बिना पहचान के तीन दशक निकल गये,जब तक भीलवाड़ा में सक्रिय रहा , तब तक प्रेस क्लब की और अन्य किसी पत्रकार संगठन की सदस्यता ही नहीं मिली . शासन की मान्यता मिले , इसके लिए अधिस्वीकरण के लिए आवेदन ही नहीं किया तो एक्रिडेशन कार्ड भी नहीं बना, जिन समाचार पत्रों व पत्रिकाओं को सम्पादित किया , उनको विज्ञापन की मान्यता भी नहीं मिली.बाद में वेब जर्नलिज़्म में उतरा, ख़बरकोश डॉटकॉम और शून्यकाल डॉटकॉम के संपादन की जिम्मेदारी निभाई , तब भी स्वतंत्र तरीक़े से ही अपनी पत्रकारिता की और खुद को स्वतंत्र पत्रकार ही समझा और कहा.

किसने हमको क्या समझा या नहीं समझा , इस पर कभी सोचा भी नहीं .लोगों के कहने का भी कोई असर नहीं पड़ा, मुझे व्यापक जनहित में मीडिया एक महत्वपूर्ण उपकरण लगा तो उसका हर संभव उपयोग किया और आज भी करता हूँ . दशकों की पत्रकारिता और सक्रिय लेखन के बाद आज जर्नलिस्ट एसोसियेशन ऑफ राजस्थान ( जार ) की सदस्यता ग्रहण की और संगठन के मंच पर बतौर पत्रकार शिरकत की, हालाँकि गया तो सहभागी के रूप में ही , किंतु जार के प्रदेश सचिव वरिष्ठ पत्रकार मूलचंद जी पेशवानी और ज़िलाध्यक्ष मनीष शर्मा जी के स्नेह के चलते मंच पर भी गया और साथी पत्रकारों को सम्बोधित किया.

माण्डल मेजा रोड पर स्थित के बी फार्म पर आयोजित जार के ज़िला अधिवेशन में आज शिरकत की ,जार के प्रदेश अध्यक्ष हरिवल्लभ जी मेघवाल , कोषाध्यक्ष राजेश न्याती जी और उपाध्यक्ष रिछपाल जी पारीक , नवीन जी जोशी , प्रदीप जी रावल , सोमदत्त जी शर्मा , प्रेस क्लब भीलवाड़ा के अध्यक्ष सुखपाल जी जाट ,पूर्व सभापति मधु जी जाजू और माण्डल के नवनिर्वाचित प्रधान शंकर जी कुमावत के विचार सुनने का भी सुअवसर मिला.

बहुत सारे पत्रकार मित्रों से भी मिलना हो गया, बरसों बाद आज कईं साथियों को देखा, पिछली सदी में जो युवा पत्रकार थे ,उन सभी की केश राशि श्वेत धवल हो चुकी है , चेहरे अनुभव की झुर्रियों के सौंदर्य से चमकने लगे है , पर आत्मीयता वैसी ही .कार्यक्रम में गया तो महज़ एक घंटे के लिए ही ,पर साढ़े चार घंटे तक रुके रहा, सबको सुनना और सबसे मिलना बेहद सुखद अनुभूति देता है .

आज जिन मित्रों को ज़िले और ब्लॉक में जिम्मेदारियाँ मिली,उन सबको बधाई और जार संगठन को ढेर सारी शुभकामनाएँ.कोविड के इस काल में भी जिस तरह बड़ी तादाद में मीडिया के साथी आज के आयोजन में पहुँचे ,प्रसन्नता की बात है.आयोजक इसके लिए बधाई के पात्र है .

 

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