भारत के मुस्लिम संगठनों, इस्लामी विद्वानों और सिविल सोसायटी का फिलिस्तीन पर संयुक्त बयान: गाज़ा में जारी नरसंहार पर भारत सरकार और वैश्विक समुदाय से हस्तक्षेप की मांग
नई दिल्ली | गाज़ा में इज़राइली हमलों और मानवीय संकट के खिलाफ भारत के प्रमुख मुस्लिम संगठनों, इस्लामी विद्वानों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने शुक्रवार को एक संयुक्त बयान जारी कर कड़ा विरोध दर्ज किया और इसे नरसंहार करार देते हुए भारत सरकार एवं अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से तत्काल और निर्णायक हस्तक्षेप की मांग की है.
संयुक्त बयान में क्या कहा गया?
संयुक्त बयान में कहा कि अक्टूबर 2023 से गाज़ा में जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ संघर्ष नहीं बल्कि एक योजनाबद्ध नरसंहार है। बयान के अनुसार, अब तक लगभग 1 लाख फिलिस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं. गाज़ा की 90% स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो चुकी हैं और 2 करोड़ से अधिक लोगों की जनसंख्या खाद्य, जल और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं के गंभीर संकट से जूझ रही है.
बयान में कहा गया कि, “यह केवल मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ युद्ध है। इस नरसंहार को रोकने में विफल रहना वैश्विक नेतृत्व की नैतिक विफलता होगी.”
संयुक्त बयान में कहा गया है, “हम, भारत के मुस्लिम संगठनों के नेता, इस्लामी विद्वान और शांति-प्रिय नागरिक, गाज़ा में हो रहे क्रूर नरसंहार और मानवीय त्रासदी की कड़ी निंदा करते हैं। 20 करोड़ से अधिक भारतीय मुसलमानों और अपने देश के सभी इंसाफ-पसंद नागरिकों की ओर से हम फिलिस्तीनी जनता के साथ अटूट एकजुटता प्रकट करते हैं। हम भारत सरकार, अंतरराष्ट्रीय नेताओं और विश्वभर के न्यायप्रिय लोगों से अपील करते हैं कि वे इस अन्याय के खिलाफ खड़े हों और इज़राइल की आक्रामकता को तुरंत रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाएं.”
जारी बयान में कहा गया है कि, “17,000 से अधिक बच्चे अनाथ हो चुके हैं या उनके अभिभावक नहीं बचे हैं, और आधे मिलियन से अधिक बच्चों को शिक्षा से वंचित कर दिया गया है। इसी दौरान, हज़ारों टन खाद्य और चिकित्सा सामग्री सीमा पर रोकी हुई है, और जल व स्वच्छता प्रणाली के ढहने से घातक बीमारियाँ तेजी से फैल रही हैं। अगर नाकाबंदी को तुरंत समाप्त नहीं किया गया, तो गाज़ा गंभीर अकाल की चपेट में आ जाएगा.”
अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील:
बयान में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील करते हुए कहा गया है कि, “अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप नहीं रह सकता। हम सभी देशों से अपील करते हैं कि वे इज़राइल से सैन्य और आर्थिक संबंध समाप्त करें और संयुक्त राष्ट्र महासभा की अवैध कब्जे को समाप्त करने की अपील का समर्थन करें। हम मुस्लिम-बहुल देशों से भी आग्रह करते हैं कि वे इज़राइल और अमेरिका पर दबाव डालें ताकि यह आपदा रोकी जा सके.”
भारत सरकार से अपेक्षाएं:
नेताओं ने भारत सरकार से अपील की कि वह अपनी ऐतिहासिक विदेश नीति और न्यायप्रिय छवि को बरकरार रखते हुए गाज़ा के पीड़ितों के पक्ष में स्पष्ट रुख अपनाए।
बयान में कहा गया कि, “भारत ने सदैव पीड़ितों के पक्ष में खड़े होने की नीति अपनाई है; यह समय उस परंपरा को दोहराने का है। हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि वह अपनी ऐतिहासिक नैतिक और कूटनीतिक परंपरा के अनुरूप फिलिस्तीनी जनता के साथ खड़ी हो. भारत को इज़राइल के क्रूर कृत्यों की निंदा करनी चाहिए, उसके साथ सभी सैन्य और रणनीतिक सहयोग रोकना चाहिए, और क्षेत्र में शांति व स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक प्रयासों का सक्रिय समर्थन करना चाहिए. हम सरकार से यह भी आग्रह करते हैं कि वह मानवीय सहायता के लिए पहल करे और खाद्य, जल, ईंधन और चिकित्सा सामग्री को गाज़ा के नागरिकों तक पहुँचाने के लिए राहत गलियारों के तत्काल खोलने की मांग करते हैं.”
बहिष्कार और जनजागरूकता का आह्वान:
बयान में नेताओं ने आम नागरिकों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक संगठनों से भी अपील की कि वे इज़राइली उत्पादों और इस संघर्ष में शामिल बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बहिष्कार करें। साथ ही, शांति पूर्ण विरोध, जनजागरूकता अभियानों, अकादमिक चर्चाओं और अंतर-धार्मिक एकजुटता कार्यक्रमों के आयोजन की आवश्यकता बताई गई।
मीडिया को जारी बयान में कहा गया है कि, “हम नागरिकों और संस्थानों से अपील करते हैं कि वे इज़रायली उत्पादों और इस नरसंहार में शामिल कंपनियों का बहिष्कार करें। नागरिक समाज, शैक्षणिक संस्थान और धार्मिक संगठन पीड़ितों की आवाज़ को बुलंद करें और फिलिस्तीन संघर्ष को लेकर फैलाई जा रही गलत सूचना और प्रचार का मुकाबला करें। हम भारत की जनता से अपील करते हैं कि वे शांतिपूर्ण और वैधानिक प्रतिरोध में भाग लें। एकजुटता मार्च, जागरूकता अभियान, अकादमिक चर्चाएं और अंतर-धार्मिक एकजुटता सभाएं आयोजित की जानी चाहिए ताकि यह सिद्ध हो सके कि भारतीय जनचेतना जीवित है.”
उन्होंने चेताया कि फिलिस्तीन के समर्थन में आवाज़ उठाने वालों को राज्य की ओर से डराया-धमकाया न जाए, और यह सुनिश्चित किया जाए कि नागरिक अपनी राय स्वतंत्र रूप से रख सकें.
प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता:
“हमारी आवाज़ किसी राजनीतिक अवसरवाद का प्रतीक नहीं, बल्कि हमारे संविधान में निहित मूल्यों और हमारी सभ्यता की नैतिकता की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। नरसंहार के सामने चुप्पी या तटस्थता कूटनीति नहीं, बल्कि न्याय की असफलता है। यह समय है कि हम गाज़ा की जनता के साथ खड़े हों। हमारे कार्य न्याय और करुणा की हमारी विरासत से प्रेरित होने चाहिए। हमें इस मानवीय त्रासदी को और विकराल होने से पहले ही रोकना होगा।”
हस्ताक्षरकर्ता:
- मौलाना अरशद मदनी, अध्यक्ष, जमीयत उलेमा हिंद
- मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी, अध्यक्ष, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
- सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी, अमीर, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद
- मौलाना अली असगर इमाम महदी, अमीर, मर्कज़ी जमीयत अहल-ए-हदीस
- मौलाना हकीमुद्दीन कासमी, महासचिव, जमीयत उलेमा-ए-हिंद
- मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी, अमीर शरियत, अमारत ए शरिया बिहार, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल
- मुफ़्ती मुकर्रम अहमद, इमाम, शाही जामा मस्जिद, फ़तेहपुरी
- मौलाना ओबैदुल्लाह खान आज़मी, प्रसिद्ध अहल – ए सुन्नत धर्मोपदेशक, पूर्व संसद सदस्य (राज्यसभा)
- मलिक मोतसिम खान, उपाध्यक्ष, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद
- डॉ. मुहम्मद मंज़ूर आलम, महासचिव, आल इंडिया मिल्ली काउंसिल
- डॉ. ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान, पूर्व अध्यक्ष, दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग
- अब्दुल हफीज, अध्यक्ष, एसआईओ ऑफ इंडिया
- मौलाना मोहसिन तक़वी, प्रसिद्ध शिया धर्मोपदेशक और धार्मिक विद्वान
- प्रोफेसर अख्तरुल वासे, पूर्व कुलपति
जारीकर्ता: मलिक मोअतसिम खान
courtesy:indiatomorrowhindi.com

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