अलीगढ़ को किसी अन्य नाम से पुकारना अकल्पनीय है - फ्रैंक एफ. इस्लाम

मुझे यह देखकर बहुत दुःख और अफ़सोस होता है कि भारत का एक बड़ा हिस्सा वर्तमान की समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय इतिहास की लड़ाई लड़ने में ज़्यादा दिलचस्पी रखता है।

फ्रैंक एफ. इस्लाम 

अलीगढ़ ज़िला पंचायत ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत उन्होंने राज्य सरकार से अलीगढ़ का नाम बदलकर हरीगढ़ रखने की मांग की है। यह प्रस्तावित नामकरण अपने जैसी एकलौती घटना नहीं है।

2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में कई शहरों के नाम बदले गए हैं। इलाहबाद को अब प्रयागराज बोला जाता है, फ़ैज़ाबाद को अयोध्या। कई अन्य ज़िलों, शहरों और क्षेत्रों के नाम बदलने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं।

1947 में भारत की आज़ादी के बाद से सैकड़ों, या शायद हज़ारों जगहों के नाम बदले गए हैं। मशहूरे ज़माना बॉम्बे का नाम 1996 में मुम्बई कर दिया गया। इसके एक साल बाद मद्रास चेन्नई बन गया। कलकत्ता को 2001 में कोलकाता बना दिया गया। उस समय के भारत के चार महानगरों में से तीन के पुनर्नामकरण ने विवाद को जन्म नहीं दिया क्योंकि उनके नए नाम वास्तव में नए नहीं थे।


मुंबई वासियों  के लिए उनका शहर हमेशा मुंबई के नाम से जाना जाता था। इसी तरह, मद्रास और कलकत्ता के लोग अपने गृहनगरों को चेन्नई और कोलकाता ही बुलाते थे।

लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में नाम बदलने का चलन बिल्कुल अलग कारणों से शुरू हुआ है। इसका कारण दरअसल हिन्दुत्ववादी राजनीति का बढ़ता हुआ वर्चस्व है। यह अभियान एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा है जिसका मक़सद अल्पसंख्यक समुदाय का बॉयकॉट करना है।नामकरण अभियान के पीछे यह विश्वास है कि जो नाम बदले जा रहे हैं वह एक समय पर मुस्लिम शासकों ने रखे थे, लिहाज़ा इन्हें बदला जाना चाहिए। यह नैतिक, राजनीतिक और आर्थिक तौर पर एक ग़लत धारणा है।

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मेरा जन्म हिन्दुस्तान में हुआ था। मैंने अपनी स्कूली पढ़ाई अलीगढ़ से पूरी की। भारत छोड़े हुए मुझे पचास साल हो गए मगर मैं आज भी अपने देश से प्यार करता हूं। मुझे यह देखकर बहुत दुःख और अफ़सोस होता है कि भारत का एक बड़ा हिस्सा वर्तमान की समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय इतिहास की लड़ाई लड़ने में ज़्यादा दिलचस्पी रखता है।

अलीगढ़ में भारत के सबसे पुराने और सबसे प्रमुख विश्वविद्यालय में से एक - अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय स्थित है। मैंने अपनी स्कूली पढ़ाई एएमयू से की है। मेरे जैसे हजारों विद्यार्थियों के चरित्र और चेतना में यह शहर छपा हुआ है। एएमयू हम सभी के लिए मार्गदर्शक रहा है और रहेगा।

अपने प्रारंभिक साल विश्वविद्यालय में बिताने के कारण अलीगढ़ मेरा एक हिस्सा है। मुझमें जो बातें सबसे अच्छी हैं, मैं उसका श्रेय एएमयू को देता हूं। एएमयू मेरे जीवन और मेरी कहानी और मेरी यात्रा का एक अमिट और अपरिहार्य हिस्सा है। इसके नेताओं ने भारत के इतिहास को आकार दिया है।

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इसके सिद्धांतों ने मेरे जीवन में हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया है। इसी वजह से अगर अलीगढ़ का नाम बदला जा रहा है तो जो मिटाया जा रहा है वह मेरे अतीत का ही हिस्सा नहीं है, बल्कि मेरा वर्तमान भी है। इसलिए अलीगढ़ को किसी अन्य नाम से पुकारना मेरे लिए अकल्पनीय है।

अलीगढ़ या किसी दूसरे क्षेत्र का नाम बदलने से वहां के लोगों पर, ख़ासकर मुसलमानों पर, जो असर पड़ेगा वह घातक हो सकता है। अल्पसंख्यक समाज पहले ही पूर्वाग्रहों का सामना कर रहा है। उन्हें लगातार असुरक्षित महसूस कराया जा रहा है। लगातार बंटते हुए समाज में पुनर्नामांकन मुसलमानों को और ज़्यादा अजनबी बना देगा।यह याद रखना अच्छा होगा कि एक धर्म पर हमला सभी धर्मों पर हमला है। आज वे पीड़ित हैं लेकिन कल कोई और होगा।

नामांकरण अभियान के ख़िलाफ़ अक्सर एक आर्थिक दलील पेश की जाती है। कहा जाता है कि किसी बड़े क्षेत्र का नाम बदलना किसी स्टेडियम या गली का नाम बदलने से बहुत अलग है। अलीगढ़ की आबादी 36 लाख है। नए नाम को जिले भर में हजारों जगहों पर प्रदर्शित किया जाना है। डाकघरों, सरकारी कार्यालयों, आधिकारिक दस्तावेजों और व्यवसायों के साइनबोर्ड पर भी जगह का नाम बदला जाएगा।


इंडिया टुडे के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने 2018 में इलाहबाद का नाम प्रयागराज रखते समय 300 करोड़ रुपये से ज़्यादा रक़म ख़र्च की थी। यह कहा जा सकता है कि 15 लाख लोगों के शहर में यह हर व्यक्ति के लिए 2,000 रुपये थे। आंकड़ों के संदर्भ में कहें तो यह उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय का तीन प्रतिशत है।

अभूतपूर्व आर्थिक मंदी के बीच शहरों के नाम बदलने पर इतनी बड़ी राशि खर्च करना हमारे नेताओं की गलत प्राथमिकताओं को दर्शाता है। इस धनराशी को भूख, गरीबी और अज्ञानता से लड़ने और नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ हवा और रोजगार देने के लिए खर्च किया जाना चाहिए। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारे चुने हुए राजनेताओं को इस तरह का नेतृत्व करना चाहिए जो पूर्वाग्रहों को ख़त्म कर लोगों को जोड़े। जो धार्मिक राष्ट्रवाद की जगह भाईचारे के भारतीय आदर्श को बढ़ावा दे और जो लोगों को अलग करने के बजाय एक साथ लाए। वे तनाव को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हम सब मिलकर भारत के लिए एक मजबूत और बेहतर भविष्य बनाने में मदद कर सकते हैं।

 

Dr. Frank Islam, Philanthropist, Entrepreneur and CEO QSS Group

 


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