तो क्या आपदाएं फासीवादी सरकारों की जड़ें मजबूत करती हैं ? मौजूदा हालात में ये शब्द विचारणीय है

अशरफ अली बस्तवी

देश में लॉकडाउन के बीच कोरोना वायरस का कहर बढ़ता ही जा रहा है। तीन दिनों से लगातार नए कोरोना संक्रमितों की संख्या 800 को पार कर रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 24 घंटे में कोरोना पॉजिटिव के 909 मामले सामने आए हैं और 34 मौतें हुई हैं। इसी के साथ देशभर में कोरोना वायरस पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 8356 हो गई है। इसमें 7367 सक्रिय हैं, 716 लोग स्वस्थ हो चुके हैं या उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है ,जबकि 273 लोगों की मौत हुई है। वहीं, चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्य में लॉकडाउन 30 अप्रैल तक बढ़ा दिया है। आज महाराष्ट्र में 134, राजस्थान में 96, गुजरात में 25, कर्नाटक में 11 और मुंबई के धारावी में 15 नए मामले सामने आए हैं।

आज जब तमाम दुनिया कोरोना का सामना कर रही है जिसके बारे में रोज़ नई नई तहकीकात सामने आ रही है, सरकारें इस से बचने के लिए एक नए हथियार का इस्तेमाल कर रही हैं - "लाकडाउन"।

दुनिया के अक्सर मुल्क जहां यह बीमारी पहुंची है वहां सरकारों ने किसी ना किसी शक्ल में लॉकडाउन लागू किया है - कहीं इसपर बहुत सख्ती से अमल किया जा रहा है और कहीं थोड़ी ढीलाई से।

 

हिंदुस्तान जैसे बड़ी आबादी वाले मुल्क जहां इस तरह की तालाबंदी का तसव्वुर भी नामुमकिन था वहां आज लॉकडाउन हकीकत बन चुका है। पूरे मुल्क में लाकडाउन लगा हुआ है और सरकार इसे 30 अप्रैल तक और बढ़ाने पे आमादा है। वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि लॉक डाउन ही इस महामारी को रोकने में कारगर साबित हो सकता है जिसने अब तक एक लाख से ज़्यादा लोगों की बलि ले ली है।

 कोरोना महामारी के इस खतरे के बीच एक और बड़े खतरे का अंदेशा महसूस किया जा सकता है। वह खतरा क्या है यह हमें हंगरी के हालात से साफ नजर आता है जहां सरकार ने इस वायरस से लड़ने की आड़ में अपने को बेइंतेहा इख्तियरात दे दिए हैं और मुल्क में इमरजेंसी लगा दी है।

 

अगर हिंदुस्तान की बात करें तो इस बीमारी ने मौजूदा सरकार के लिए एक नई मुश्किल पैदा कर दी है, मगर साथ-साथ कई मोर्चों पे इसे राहत भी दी है। कुछ हफ्तों पहले तक जो सरकार अपने कुछ विवादास्पद फैसलों की वजहों से चौतरफा घिरी हुई थी, सड़कों पर नए नागरिकता कानून पर विरोध प्रदर्शनों का सामना कर रही थी, एनआरसी पर राज्य सरकारों से भेद भाव पैदा हो रहे थे, अब सब विरोध अचानक से ख़तम हो गए।

कुछ हफ्तों पहले तक अर्थव्यवस्था के हालात बद से बदतर हो रहे थे और सरकार को इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था, ऐसे में इस बीमारी ने लोगों का सारा ध्यान तमाम परेशानियों से हटाकर इस महामारी पर केंद्रित कर दिया है, जो कि सरकार के लिए फौरी राहत का सबब है। अब सारी परेशानियों का ठीकरा कोरोना वायरस के सर पर फोड़ा जा सकता है।

प्रधान मंत्री जो संसद भवन से नदारद रहते थे, अब अक्सर टीवी पर नई नई अपील करते नए नए अंदाज़ में देखे जा सकते हैं, और जनता का एक बड़ा हिस्सा भी उन अपीलों को पूरे जोश के साथ पूरा करना अपनी जिम्मेदारी समझता है। जो उस कार्य का हिस्सा नहीं बनते उन्हें शक की निगाहों से देखा जाता है, कुछ की नज़रों में तो वो देशद्रोही होते हैं। ये बहुत ही चिंताजनक विषय है। 

नरेंद्र मोदी, जिनके वोटर उन्हें एक मजबूत नेता के रूप में देखते हैं, वह इस संकट की घड़ी में अधिक शक्तिशाली बन कर उभरे हैं। वह संकट की घड़ी को भी सुनहरे अवसर में बदलने में माहिर हैं। गत वर्ष बालाकोट इसका उदाहरण मात्र है जब भारत ने अपना एक लड़ाकू विमान खोया, अपने पायलट को बंदी बनते देखा और अपना ही एक हेलीकॉप्टर मार गिराया, मगर इन सबके बावजूद मोदी विजयी सेनापति के रूप में उभरे।

आज जब विपक्ष लगभग नदारद है, कोरोना महामारी से भी मोदी कुछ इसी तरह विजयी हो कर निकलेंगे ऐसा प्रतीत होता है। सत्ता पर उनकी और उनकी पार्टी की पकड़ और मजबूत होगी। ऐसे में सत्ता का क्या स्वरूप होगा आप खुद सोच सकते हैं। 

इसी हफ्ते तेलंगाना प्रदेश के हैदराबाद से कुछ तस्वीरें आई जिसमे हिन्दू संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ कार्यकर्ता लॉक डाउन के दौरान सड़कों पर लोगों के आई डी कार्ड चेक करते हुए दिखाए दिए। ये एक खतरनाक संकेत है, क्युकी ये कार्य पुलिस का है किसी निजी संस्था का नहीं। देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरे भी आ रही है की अल्पसंख्यकों को कोराना फैलाने का ज़िम्मेदार समझा जा रहा है और उनका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया जा रहा है।

कई गावों और मोहल्ले में उनकी आमद पे पाबंदी लगा दी गई है, ये एक नई विकृत समाज का जन्म है, जहां नफ़रत चरम पर है। ऐसी नफ़रत फैलाने में कुछ मीडिया समूहों का महत्वपूर्ण किरदार है।

भारतीय मीडिया खासकर न्यूज चैनल्स का एक तबका कोरोना का ज़िम्मेदार अल्पसंख्यकों के एक वर्ग विशेष को ठहराने पे तुला हुआ है, जो कि बहुत ही ख़तरनाक है। सरकार अलग से एक ख़ास वर्ग का कोरोना मरीजों का आंकड़ा जारी कर रही हैं, जब की अंतरराष्ट्रीय संस्था ने उसका कड़ा विरोध किया है और कहा है कि एक समुदाय को कठहरे में खड़ा करने के प्रयास से बचना चाहिए।

ऐसे हालात में ये आशंका है कि महामारी से जन्मे हालात और अर्थव्यवस्था कि बिगड़ती हालत की ज़िम्मेदारी सरकार पर ना आ कर कहीं और जाएगी। ऐसी परिस्थिति में सरकार तो और अधिक मजबूत होगी, लेकिन देश का ताना-बाना कमज़ोर होगा ।

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