यह रिपोर्ट देख सोचने पर मजबूर हो जाएंगे, कि क्या India भी Rwanda जैसा होने वाला है ?

यह रिपोर्ट देख सोचने पर मजबूर हो जाएंगे, कि क्या India भी Rwanda जैसा होने वाला है ?

नई दिल्ली : (एशिया टाइम्स के लिए शादाब खान की रिपोर्ट ) चाहे जर्मनी का हॉलोकास्ट हो, बोस्निया का सेरेब्रेनिका नरसंहार हो या म्यांमार का रोहिंग्या जेनोसाइड हो। जब भी किसी नेता को असीम ताक़तों की चाहत होती है तो वह बहुसंख्यक आबादी के सामने एक अल्पसंख्यक दुश्मन खड़ा कर बहुसंख्यक समाज का सपोर्ट हासिल करने की कोशिश करता है। लोगों के दिलों में डर डाला जाता है ताकि वह अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए उस नेता का किसी भी हाल में समर्थन करें। कई बार इस डर का नतीजा होता है बहुत बड़ा क़त्लेआम। इसी तरह का एक क़त्लेआम आज से 27 साल पहले रवांडा में हुआ था।

रवांडा में मुख्यतः दो जनजातियां रहती थीं- 85 प्रतिशत हुतु और 14 प्रतिशत तुतसी। हुतु जनजाति से आने वाले रवांडा के राष्ट्रपति जुवेनल हब्यारीमना की 6 अप्रैल 1994 को हत्या होने के बाद हुतु ने तुतसी का क़त्लेआम शुरु कर दिया। 100 दिनों तक चले इस क़त्लेआम में आठ लाख से ज़्यादा लोग मारे गए थे। यह सब हम आपको क्यों बता रहे हैं? क्योंकि भारत भी धीरे-धीरे रवांडा के रास्ते पर चल रहा है।

क्यों हुआ था रवांडा का क़त्लेआम 

दरअसल राष्ट्रपति हब्यारीमना की हत्या सिर्फ़ एक बहाना थी। हुतु समुदाय के दिल में इतनी नफ़रत भर दी गई थी कि वह तुतसी को इंसान ही नहीं समझते थे। इस नफ़रत का कारण यह था कि रवांडा की सरकार और मीडिया तुतसी के ख़िलाफ़ तरह-तरह का प्रोपेगेंडा चलाते थे, जिससे तुतसी को रवांडा का दुश्मन बनाया जा सके और हुतु समर्थन इकट्ठा किया जा सके। मसअला यह है कि जो कुछ उस वक़्त रवांडा में हो रहा था वह इस वक़्त हिन्दुस्तान में हो रहा है। जो भी बातें उस समय तुतसी के बारे में कही गईं, वही आज मुसलमानों के बारे में कही जा रही हैं। आज हम आपको उन घटनाओं के बारे में बताएंगे जो रवांडा को क़त्लेआम के रास्ते पर ले गईं, और उनसे मिलती जुलती घटनाएं जो अब भारत में हो रही हैं।

सरकार और राजनेता

शुरुआत करते हैं 1990 से। रवांडा में हुतु सरकार ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए विचारधारा का इस्तेमाल किया। हुतु राजनेताओं ने तुतसी जनजाती को डिह्यूमनाइज़ करना शुरू कर दिया। वह सिर्फ़ यह संदेश देते थे कि तुतसी समुदाय का हर व्यक्ति हुतु समुदाय का दुश्मन है जिसे ख़त्म करना उनकी ज़िम्मेदारी है। हैरानी की बात है कि ऐसा ही संदेश आज भारत में दिया जा रहा है।

  1. 1.       "वे बाहर से आए हैं"

हुतु राजनेताओं का कहना था कि तुतसी बाहरी लोग हैं, यह रवांडा के मूल निवासी नहीं लिहाज़ा इन्हें रवांडा में रहने का कोई हक़ नहीं था। दूसरी तरफ़ भारत में हिंदुत्व विचारधारा की नींव ही इस मुद्दे पर रखी गई है कि मुसलमान हिंदुस्तान के नहीं बल्कि बाहर से आए हैं इसलिए इन्हें हिन्दुस्तान से बाहर निकाला जाना चाहिए। पिछले कुछ सालों में यह एजेंडा भी ज़ोर-शोर से चलाया गया है कि मुसलमानों का ताल्लुक़ पाकिस्तान से है। साल 2018 में भाजपा नेता विनय कटियार ने बयान दिया था कि हिन्दुस्तानी मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। इसके बाद कई भड़काऊ भाषणों और नारों में भी यह बात कही गई।

2.  "वे हमारी औरतें चुरा रहे हैं"

दूसरा भ्रम जो तुत्सी समुदाय के बारे में फैलाया जाता था वह यह था कि तुतसी हुतु औरतों को अपने जाल में फंसाकर उनसे शादी कर रहे हैं। इसके बरक्स हिंदुस्तान में जो ख़याल आम जनता तक पहुंचाया जा रहा है वह है लव जिहाद। लव जिहाद के नाम पर लोगों को बताया जा रहा है कि मुस्लिम मर्द हिन्दु महिलाओं से शादी कर उनका धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। हालांकि नेश्नल कमीशन फ़ोर वुमेन के पास लव जिहाद के कोई आंकड़े नहीं हैं। यहां तक की राज्य सभा में दी गई स्टेटमेंट के अनुसार केंद्र सरकार के पास लव जिहाद की कोई सटीक परिभाषा भी नहीं है।

3.  "वे कीड़े मकोड़े हैं"

क़त्लेआम से पहले हुतु समुदाय की तुलना कीड़े मकोड़ों से भी की गई थी। साल 1992 में हुतु राजनेता लीओन मुगेसेरा ने तुतसी समुदाय की तुलना कॉकरोच से करते हुए कहा था कि तुतसी कॉकरोच हैं जिन्हें तबाह कर देना चाहिए। साल 2018 में राजस्थान और दिल्ली की चुनावी रैलियों में अमित शाह ने बांग्लादेशी प्रवासियों की तुलना दीमक से की थी। किसी भी समुदाय की तुलना कीड़े-मकोड़ों से तभी की जाती है जब आप उसे डीह्यूमनाइज़ करना चाहते हैं। साल 2016 में मुगेसेरा को रवांडा में उम्रक़ैद की सज़ा हो गई थी।

  1. 4.       "हम ख़तरे में हैं"

लोगों के दिलों में डर डालने के लिए हुतु राजनेताओं ने लोगों को यह भी बताया कि तुतसी हमको क़त्ल करके हमारे देश पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं, यानी हुतु ख़तरे में हैं। इसके मुक़ाबले में भारतीय हिंदुओं को बताया जा रहा है कि "हिन्दू ख़तरे में है"। लगातार यह भ्रम फैलाया जाता है कि भारत में मुस्लिम आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है और कुछ ही सालों में भारत मुस्लिम देश बन जाएगा। हालांकि यह दावा झूठा है। 2001-2011 के बीच मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर में 5 प्रतिशत की गिरावट आई है जबकि हिन्दु आबादी के वृद्धी दर में सिर्फ़ 3 प्रतिशत की गिरावट आई है।

  1. 5.       "अब हथियार उठाने का समय गया है"

जब रवांडा में नफ़रत बढ़ने लगी तो यह सब आम लोगों की ज़िन्दगीयों का हिस्सा बनने लगा। दिसंबर 1990 के अंत में, वाइस-रेक्टर और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने प्रस्ताव दिया कि सभी हुतु मर्दों को देश के भीतर सुरक्षा के लिए एक आत्मरक्षा बल के रूप में लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर सेना बॉर्डर पर मसरूफ़ रही तो लोगों को अपनी हिफ़ाज़त करनी आनी चाहिए। पिछले कुछ सालों में भारत में भी इस तरह की बातें कही गई हैं। हैदराबाद में भाजपा एमएलए टी राजा समेत कई नेताओं ने यह बयान दिया है कि हिन्दुओं को सेल्फ़ डिफ़ेंस के लिए हथियार रखने चाहिए, वरना हिन्दु राष्ट्र का सपना पूरा नहीं होगा। बजरंग दल समेत कई संगठनों ने देशभर में ऐसे कैंप्स भी बनाए हैं जहां हिन्दुओं को सेल्फ़ डिफ़ेंस की ट्रेनिंग दी जाती है।

नफ़रत और मीडिया

अब बात करते हैं रवांडा के मीडिया की। नफ़रती नेताओं के साथ मीडिया ने भी इस क़त्लेआम में अपना किरदार बख़ूबी निभाया। कभी पैंफ़्लेट छपवाकर, कभी गानों के ज़रिये और कभी रेडियो का इस्तेमाल कर तुत्सी समुदाय के ख़िलाफ़ ज़हर उगला गया।

1.  नफ़रती पम्फलेट 

फरवरी 1991 में, एक राष्ट्रीय अधिकारी और उत्तर-पश्चिम रवांडा के नेता ने पैम्फलेट छपवाया था जिसमें दावा किया गया कि तुतसी समुदाय का एक संगठन आरपीएफ हुतु समुदाय के क़त्लेआम की योजना बना रहा है। इस बात का कोई सबूत नहीं था लेकिन इस पैंफ़्लेट का मक़सद लोगों को होशियार करना नहीं, उनके दिलों में नफ़रत भरना था। इसी तरह के कई पैंफ़्लेट दिल्ली में भी बांटे गए हैं जिनमें मुसलमानों के विनाश की बात की जाती है। इन पैंफ़्लेट्स पर किसी पार्टी या संगठन का नाम तो नहीं होता लेकिन कुछ पर मोबाइल नंबर ज़रूर लिखे होते हैं।

2.  अल्पसंख्यक विरोधी गाने 

मीडिया का इस्तेमाल कर गानों के ज़रिये भी तुत्सी समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाई जाती थी। रवांडा रेडियो पर वक़्तन-फ़वक़्तन नफ़रती गाने बजाए जाते थे। उदाहरण के तौर पर हुतु साइमन बिकिंडी का संगीत अक्सर बजाया जाता था। उनके दो गाने थे, "बेने सेबाहिन्ज़ी" यानी ("किसानों के पुत्र"), और "नंगा अबाहुतु" यानी ("आई हेट हुटस")। जब रवांडा नरसंहार की जांच की गई तो पाया गया कि इन गानों का मक़सद हुतु समुदाय के बीच द्वेष फैलाना था। भारत में टीवी या रेडियो पर तो ऐसे कोई गाने नहीं बजाए जाते। लेकिन यूट्यूब पर नज़र डालें तो पता चलता है कि वहां एंटी-मुस्लिम गानों की भरमार है। हैरानी की बात यह है कि इन लोगों के ख़िलाफ़ कोई एक्शन भी नहीं लिया जाता।

क़त्लेआम में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाला रवांडा रेडियो 

अब बात करते हैं क़त्लेआम में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले रवांडा के रेडियो चैनलों की। रवांडा रेडियो नाम के सरकारी चैनल समेत सभी रेडियो चैनल पूरा दिन गानों और भाषणों के ज़रिये खुले तौर पर तुतसी के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते थे। "आपको तुत्सी को मारना है, वे कॉकरोच हैं। हम सभी को तुत्सी से लड़ना चाहिए। हमें उनको ख़त्म कर देना चाहिए, उन्हें पूरे देश से मिटा देना चाहिए जैसी बातें रेडियो के ज़रिये लोगों के घरों तक पहुंचाइ जाती थीं।

भारत का रवांडा रेडियो है यहां का गोदी मीडिया। मुसलमानों के बारे में जो भी ज़हर नेता उगलते हैं उसे मीडिया एजेंडा बनाकर लोगों तक पहुंचाता है। लव जिहाद से लेकर जनसंख्या विस्फ़ोट तक मीडिया ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ हर तरह का झूठ फैलाया है। पिछले साल बॉम्बे हाई कोर्ट ने तब्लीग़ी जमात के ख़िलाफ़ एजेंडा फैलाने के लिए गोदी मीडिया को फटकार लगाई थी। इसी तरह मई 2020 में दुबई के जाने माने अख़बार गल्फ़ न्यूज़ ने भी भारतीय मीडिया के इस्लामोफ़ोबिक रवैये पर एडिटोरियल छापा था। यह कोई तारीफ़ की बात तो नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की चर्चा इस तरह हो रही है, लेकिन शायद मीडिया यही चाहता है।

तुतसी पर हमले और दंगे 

धीरे-धीरे हुतु के दिलों में मौजूद नफ़रत बाहर आने लगी। लोकल नेताओं और अधिकारियों के उकसाने पर अक्तूबर 1990 में किबलिरा क्षेत्र में हुतु समुदाय ने 300 तुत्सियों को मौत के घाट उतार दिया था। 1990 से 1994 तक तुत्सी समुदाय पर ऐसे 15 हमले हुए थे। बात करें भारत की तो फ़रवरी 2020 में कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषण के बाद दिल्ली में दंगा भड़क उठा थे। इस दंगे में 53 लोगों की जानें गई थीं जिसमें से दो-तिहाई मुस्लिम थे।

यह सब घटनाएं मिलकर रवांडा को क़त्लेआम के रास्ते पर ले गईं। भारत का भविष्य क्या होगा, पता नहीं। लेकिन क्या यह कहना ग़लत होगा कि भारत रवांडा के रास्ते पर बहुत आगे निकल चुका है? इसपर आपकी क्या राय है हमें कमेंट्स में बताइए। वीडियो को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करिये और इस तरह की और वीडियोज़ देखने के लिए चैनल को सब्सक्राइब कर बेल आईकन दबाना ज़रूर दबाएं।

 

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