अगर आप रिस्क नहीं ले सकते तो मीडिया में हैं क्यों ?
बड़े मीडिया हाउस अपने कारोबारी हितों और सरकारी दबाव के डर से स्वतंत्रता खो चुके हैं / श्रीनिवासन जैन
नई दिल्ली : (एशिया टाइम्स न्यूज़ ) देश में मीडिया की स्वतंत्रता पर गहराते संकट को लेकर एक वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अब ऐसा लगता है जैसे “फ्रीडम ऑफ स्पीच खत्म हो गया है और मीडिया लगभग समाप्त हो चुकी है।”
वह कल शाम IICC में आयोजित AMU Alumni International की ओर से आयोजित सर सैय्यद डिनर प्रोग्राम में किया ।
उन्होंने सवाल उठाया कि “ऐसा क्यों हुआ कि इतने सारे चैनल और अखबार , जिनकी संख्या 400 से अधिक टीवी चैनलों और हजारों अखबारों में है , इतनी आसानी से झुक गए?”
आगे कहा कि “यह बहुत हैरानी की बात है कि जब हम स्वतंत्र मीडिया की बात करते हैं तो आज डिजिटल और छोटे प्लेटफॉर्म्स ही वह काम कर रहे हैं, जो बड़े-बड़े मीडिया समूह नहीं कर पा रहे। जिस साहस और रीढ़ की हड्डी की जरूरत पत्रकारिता में होती है, वह अब बड़े मीडिया हाउसेज़ में नहीं दिख रही।”
उन्होंने NDTV के अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि “जब तक चैनल का टेकओवर नहीं हुआ था, हमारे प्रमोटर्स ने यह कैपेसिटी दिखाई कि अगर सरकार के खिलाफ खड़ा होना है तो केस झेलने होंगे, ईडी और सीबीआई की पूछताछ झेलनी होगी, धमकियां मिलेंगी . लेकिन फिर भी हमें पूरी स्वतंत्रता दी गई कि हम खुलकर बात कर सकें।”
उन्होंने कहा कि आज भी कुछ छोटे मीडिया संस्थान जैसे द वायर, स्क्रॉल, न्यूज़लॉन्ड्री, आर्टिकल 14 आदि सरकारी दबावों, केसों और छापों के बावजूद स्वतंत्र पत्रकारिता को जिंदा रखे हुए हैं। “यह वही साहस है जिसकी इस दौर में सबसे अधिक जरूरत है।”
उन्हों ने कहा कि “बड़े मीडिया हाउस अपने कारोबारी हितों और सरकारी दबाव के डर से स्वतंत्रता खो चुके हैं। लेकिन अगर आपने मीडिया बिजनेस में कदम रखा है, तो जोखिम उठाना ही पड़ेगा — अगर आप रिस्क नहीं ले सकते तो मीडिया में हैं क्यों?”
उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम फ्रीडम ऑफ स्पीच पर गंभीर बहस करना चाहते हैं, तो मीडिया मालिकों और प्रमोटर्स को भी इस चर्चा में शामिल करना जरूरी है।
युवा पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “यह समय जितना कठिन है, उतना ही अवसरपूर्ण भी है। देश में जो बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन हो रहा है । हमारी लोकतांत्रिक और सेकुलर नींवों का क्षरण यह हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी कहानी है। पत्रकारों के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है कि वे इस बदलाव को दस्तावेज़ करें, रिपोर्ट करें और इसके गवाह बनें।”
अंत में उन्होंने कहा, “यह दौर भले ही चुनौतीपूर्ण है, लेकिन यही हमें साहस भी देता है कि हम अपना काम ईमानदारी से करते रहें।”

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