हलाला ,एक असंभव कार्य

By: Zubair Khan Saeedi 

 अगर कोई मुस्लिम मर्द अपनी पत्नी को तीन अलग-अलग महीनों में लगातार तीन तलाक़ दे फिर वो दोनों पति पत्नी नहीं रहते ब्लकि ऐसे अजनबी हो जाते हैं जो दोबारा निकाह से भी पति पत्नी नहीं बन सकते हैं।

 तलाक़ एक ऐसा जाएज़ काम है जो इस्लाम में पसंदीदा नहीं है, इसे घटिया तरीन हलाल कार्य कहा गया है, इसके पीछे उद्देश यह है कि लोग जिस से एक बार निकाह करें फिर ज़िन्दगी भर और मरने के बाद भी उसके साथ जन्नत में रहें। लेकिन कभी कभी कोई mismatch हो ही जाता है जिसके लिए # तलाक़ और # ख़ुला का विकल्प रखा गया है।  (तलाक़ मर्द के लिए और ख़ुला औरत के लिए) 

तलाक़ का जो सही तरीक़ा सिखाया गया वो यह कि पति पत्नी को पहली बार जब तलाक़ कहे, तो उसके बाद भी वह अपनी पत्नी को अपने घर में ही रहने की अनुमति दे, फिर लगातार एक माह एक साथ रहकर भी अगर उन दोनों के बीच कोई संबंध स्थापित ना हो, तब अगले महीने मर्द को दूसरी तलाक़ देने का हक़ मिलता है।

दूसरी तलाक़ के बाद भी उसी तरह पत्नी घर में रहेगी जिस तरह पहली तलाक़ के बाद रही थी और अगर दूसरे महीने भर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं करते हैं तब तीसरा महीना शुरू होते ही मर्द तीसरी तलाक़ दे सकता है।

तीसरी तलाक़ अंतिम तलाक़ होती है, उसके बाद तलाक़ स्थापित हो जाती है।रही बात ख़ुला की तो यह औरत का हक़ है।अगर औरत को लगता है कि उसका पति उसके योग्य नहीं है, उसे निकाह में धोखा हुआ है तो पत्नी पति द्वारा दिया गया #महर का अमाउंट लौटा कर उससे अलग हो सकती है।

तलाक़ होने के साल दो साल या और ज़्यादा साल बाद अगर किसी मर्द को अपनी छोड़ी हुई पत्नी याद आए और वो फिर उसे अपनाना चाहे तो वो अपनी तलाक़ शुदा पत्नी से फिर निकाह नहीं कर सकता है।


सिर्फ़ एक सूरत ऐसी है जिससे पुरानी पत्नी उसकी हो सकती है।उसे कहते हैं #हलालाहलाला क्या है वो भी जान लेंहलाला का अर्थ है कि अगर #अब्दुल ने #रुख़साना को तलाक़ दे दी थी फिर रुख़साना ने

हामिद से निकाह कर लिया था लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी हुईं की हामिद ने भी रुख़साना को तलाक़ दे दी, फिर अब्दुल को यह मालूम चले कि रुख़साना को हामिद भी तलाक़ दे चुका है फिर अब्दुल रुखसाना को निकाह का पैग़ाम भेज सकता है और अगर अब रुख़साना अब्दुल का प्रस्ताव स्वीकर कर लेती है तो दोनों का निकाह हो सकता है।

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