नेपाल में जेन-ज़ी नेतृत्व वाला विद्रोह: दक्षिण एशिया पर असर और क्यों भारत की मज़बूत लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसे आंदोलन को असंभव और अनावश्यक बनाती है

 डॉ. आसिफ़ नवाज़

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अस्थिरता में, युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलन राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के निर्णायक कारक के रूप में उभरे हैं। ये आंदोलन अक्सर किसी देश के भीतर गहरे असंतोष और व्यवस्था की खामियों का संकेत देते हैं। स्वतःस्फूर्त शुरुआत, डिजिटल प्रसार और तत्काल जवाबदेही की मांग जैसे लक्षण पारंपरिक राज्य-प्रभुसत्ता और शासन की स्थिरता को चुनौती देते हैं।

सितंबर 2025 में नेपाल का जेन-ज़ी विद्रोह इसका स्पष्ट उदाहरण है—सरकार द्वारा लगाए गए सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ़ शुरू हुआ विरोध कुछ ही दिनों में राष्ट्रव्यापी अशांति में बदल गया। विरोध इतना बढ़ा कि प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा और काठमांडू में संघीय संसद भवन व कई उच्च अधिकारियों के आवास जलकर राख हो गए। “जेन ज़ी रिवॉल्यूशन” नामक इस आंदोलन में कम से कम 19 लोगों की मौत और 600 से अधिक लोग घायल हुए। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए यह केवल किसी एक देश का आंतरिक संकट नहीं, बल्कि तकनीक, पीढ़ीगत सक्रियता और वैश्विक दक्षिण की भू-राजनीतिक संवेदनशीलता का अध्ययन करने का एक अनूठा दृष्टिकोण है।

सितंबर 2025 के दूसरे सप्ताह तक नेपाल अराजकता के कगार पर था। राष्ट्रपति कार्यालय के आदेश पर काठमांडू व आसपास के ज़िलों में अनिश्चितकालीन कर्फ़्यू लगा दिया गया और सुरक्षा बनाए रखने के लिए नेपाल सेना को जिम्मेदारी दी गई। 25 वर्ष से कम उम्र के लोग, जो कुल आबादी का 40% से अधिक हैं, त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कब्ज़ा कर एयर ट्रैफिक ठप कर दिया, जिससे पर्यटन-निर्भर देश में हज़ारों सैलानी फँस गए। सरकार ने विरोध को देखते हुए सोशल मीडिया पर आंशिक रूप से लगी रोक हटाई, लेकिन इंटरनेट बार-बार बंद होता रहा। युवाओं ने वीपीएन का इस्तेमाल कर लाइव वीडियो प्रसारित किए और “वन पीस” एनीमे का स्ट्रॉ हैट झंडा लहराकर प्रतिरोध का प्रतीक बनाया।

यह विरोध किसी एक नीति तक सीमित नहीं था, बल्कि लगातार जारी भ्रष्टाचार से उपजी गहरी नाराज़गी को दर्शाता है। “नेपो किड्स” घोटाले में लीक हुए दस्तावेज़ों से पता चला कि पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा से जुड़े नेताओं के रिश्तेदारों को आपदा राहत और आधारभूत ढांचा परियोजनाओं के लिए भारी भरकम ठेके मिले, जिससे ग्रामीण इलाकों में मुश्किलें बढ़ीं। “इस सरकार को गिराओ” और “हत्यारा सरकार” जैसे नारों के बीच प्रदर्शनकारियों की मांग सोशल मीडिया बैन हटाने से बढ़कर सामूहिक इस्तीफ़ों और व्यापक सुधार तक पहुँच गई। ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सुरक्षा बलों द्वारा घातक बल प्रयोग की निंदा की और स्वतंत्र जांच की मांग की। प्रारंभिक आकलन के अनुसार 2025 में नेपाल की जीडीपी में 3–5% की गिरावट और पर्यटन से होने वाली आय (जो जीडीपी का लगभग 7% है) लगभग समाप्त होने की आशंका है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नज़रिए से नेपाल का यह संकट डिजिटल कनेक्टिविटी की विरोधाभासी भूमिका को उजागर करता है। सरकार का सोशल मीडिया बैन असहमति दबाने के लिए था, पर इसने विकेन्द्रीकृत और नेतृत्वविहीन आंदोलन को और मज़बूत किया, जिसने वैश्विक ध्यान खींचा। प्रदर्शन की व्यापक तस्वीरें भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों का ध्यान आकर्षित कर चुकी हैं, जिससे बाहरी हस्तक्षेप को लेकर चिंता बढ़ी है। यह घटना श्रीलंका और बांग्लादेश में हाल की युवा-नेतृत्व वाली बग़ावतों से तुलनात्मक विश्लेषण को आमंत्रित करती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि भारत में ऐसे आंदोलन क्यों न तो संभव हैं और न ही ज़रूरी—क्योंकि भारत की संस्थागत मज़बूती और लोकतांत्रिक लचीलापन इसे रोकता है। पाकिस्तान और व्यापक दक्षिण एशिया के लिए भी इसके गहरे निहितार्थ हैं, जो एक बहुध्रुवीय विश्व में युवा सक्रियता की गतिशीलता पर महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।

नेपाल के जेन-ज़ी विरोध का ढाँचा और बदलती गतिशीलता

नेपाल की जनरेशन ज़ी द्वारा नेतृत्व किए जा रहे मौजूदा विरोध प्रदर्शन राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक-आर्थिक दबाव और डिजिटल सक्रियता के नए रूपों के जटिल मेल को दर्शाते हैं। इसकी पृष्ठभूमि 2015 के संविधान से जुड़ी है, जिसने कमजोर गठबंधनों और लगातार बदलते समीकरणों का दौर शुरू किया—खासकर के.पी. ओली और नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में, जिनकी सरकार ने अवसरवादी गठबंधनों के सहारे कई अविश्वास प्रस्ताव झेले और टाल दिए।

आर्थिक चुनौतियाँ इस अस्थिरता को और गहरा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुमान के अनुसार युवाओं में बेरोज़गारी लगभग 20% के आसपास है, जबकि 20 लाख से अधिक नेपाली विदेश में काम करते हैं, जिनकी भेजी गई रक़म (रेमिटेंस) राष्ट्रीय जीडीपी का चौथाई हिस्सा बनती है। लेकिन यह रेमिटेंस भी अक्सर सत्ताधारी अभिजात वर्ग की हेराफेरी का शिकार होता है, जिससे जनता का गुस्सा बढ़ता है। संसद में बहस के बिना ही सरकार द्वारा अचानक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लगाने का फैसला युवाओं को और अलग-थलग कर गया, क्योंकि इससे महत्वपूर्ण शैक्षिक और आर्थिक साधनों तक उनकी पहुँच कट गई—खासकर उन लोगों की, जो सालाना 20% की दर से बढ़ती गिग इकॉनमी में सक्रिय हैं।

7 सितंबर को काठमांडू के थमेल इलाके से यह विरोध शुरू हुआ, जो शुरू में शांतिपूर्ण था लेकिन अगले ही दिन हिंसक हो गया। पत्थरबाज़ी के जवाब में पुलिस ने आंसू गैस, रबर की गोलियाँ और अंततः असली गोलियों का इस्तेमाल किया, जिससे 8 सितंबर को ही 14 लोगों की मौत हो गई। 9 सितंबर दोपहर तक यह संख्या 19 तक पहुँच गई और अशांति पोखरा और विराटनगर जैसे शहरों तक फैल गई। प्रदर्शनकारियों ने नेपाल के प्रशासनिक केंद्र सिंहदरबार की बैरिकेड तोड़कर दस्तावेज़ों और पुतलों को जला दिया, जबकि काठमांडू के सेंट्रल बिज़नेस पार्क में स्थित नेपाल के सबसे बड़े और प्रभावशाली मीडिया समूह कांतिपुर पब्लिकेशंस के मुख्यालय को आग के हवाले करना सूचना तंत्र पर व्यापक हमले का प्रतीक था। नेताओं के घरों में लूटपाट और जलते मकानों से नक़दी निकलने के वायरल वीडियो ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ “प्रतिशोधात्मक न्याय” की कहानी को और हवा दी।

राजनीतिक असर तत्काल दिखा। प्रधानमंत्री ओली और गृह मंत्री दोनों के इस्तीफ़े ने तनाव को कुछ समय के लिए कम तो किया, लेकिन बुनियादी शिकायतों का हल नहीं हुआ। लगातार कर्फ़्यू और सेना की गश्त से लंबे समय तक अस्थिरता का खतरा बना हुआ है। सेना प्रमुख जनरल प्रभु राम शर्मा ने शांति और संवैधानिक मर्यादा बनाए रखने की अपील की, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सतर्क रुख अपनाया: भारत ने सैकड़ों नागरिकों को निकाला, चीन ने अपने निवेश की सुरक्षा पर जोर दिया और अमेरिका के विदेश विभाग ने हिंसा की निंदा करते हुए खुद को महाशक्ति प्रतिस्पर्धा में लोकतंत्र समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया।

इस आंदोलन की सबसे खास बात इसकी विकेन्द्रीकृत और डिजिटल रूप से संचालित प्रकृति है। पहले के दल-आधारित आंदोलनों से अलग, नेपाल के जेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों ने सिग्नल और डिस्कॉर्ड जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफ़ॉर्म का सहारा लिया, और इंटरनेट मीम्स व ऑगमेंटेड रियलिटी फ़िल्टर से राजनीतिक अभिजात वर्ग की जीवनशैली का मज़ाक उड़ाया। यह “हाइब्रिड एक्टिविज़्म”—जहाँ वायरल ऑनलाइन कंटेंट ज़मीनी भागीदारी को बढ़ाता है—वैश्विक प्रवृत्तियों से मेल खाता है, लेकिन साथ ही गलत सूचनाओं के तेज़ी से फैलने जैसे खतरे भी लाता है, जैसे प्रधानमंत्री की पत्नी से जुड़ी झूठी अफ़वाहें।

यह परिदृश्य नीतिनिर्माताओं और शोधकर्ताओं दोनों के लिए गंभीर चुनौती पेश करता है। डिजिटल स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बिठाना, खासकर तब जब युवा नागरिक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म को अधिकार मानते हैं, कोई विशेषाधिकार नहीं, एक कठिन कार्य है। संक्षेप में, नेपाल का जेन-ज़ी विरोध न केवल देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की अस्थिरता को उजागर करता है, बल्कि डिजिटल रूप से सक्षम सक्रियता की परिवर्तनकारी शक्ति—और उसके जोखिम—को भी स्पष्ट करता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: युवाओं द्वारा संचालित वैश्विक क्रांतियों का सफ़र

अब ज़रा दुनिया भर में युवाओं द्वारा संचालित क्रांतियों पर नज़र डालें। वो आंदोलन, जहाँ स्कूल के बच्चे और विश्वविद्यालय के छात्र इतिहास की दिशा बदल देते हैं, जबकि वयस्क बस हाथ मलते रह जाते हैं। इतिहास गवाह है कि कई बार छोटे-छोटे अन्याय के ख़िलाफ़ युवाओं के विरोध ने बड़े बदलाव लाए। शोध से पता चलता है कि इन आंदोलनों में कुछ पैटर्न दोहराए जाते हैं: शिक्षा या रोज़गार से जुड़ी शिकायतें, मीडिया द्वारा बढ़ाया गया दबाव, और अंततः शासन में बदलाव—कभी दमन तो कभी सफलता के साथ।

सोवेटो विद्रोह (दक्षिण अफ्रीका, 1976)
16 जून 1976 को रंगभेदी शासन के दौर में दक्षिण अफ्रीका में सोवेटो विद्रोह हुआ। सरकार ने काले बच्चों को अफ़्रीकान्स भाषा में पढ़ाई करने का आदेश दिया—यानी अपने ही उत्पीड़कों की भाषा। छात्र विरोध में उतर आए, करीब 20,000 बच्चे सड़कों पर निकल पड़े। पुलिस ने गोलियाँ चलाईं, 13 वर्षीय हैक्टर पीटरसन की मौत हो गई। उसकी बहन द्वारा शव उठाने की तस्वीर दुनिया की अंतरात्मा को झकझोर गई और प्रतिरोध का प्रतीक बनी। इसके बाद सैकड़ों लोग मारे गए, संयुक्त राष्ट्र ने दक्षिण अफ्रीका पर प्रतिबंध लगाए और रंगभेद के अंत की दिशा तय हुई। वर्षों बाद नेल्सन मंडेला की रिहाई और 1994 में लोकतंत्र की स्थापना इसी चिंगारी का नतीजा थी।

अमेरिका का नागरिक अधिकार आंदोलन
संयुक्त राज्य अमेरिका में 1957 का “लिटिल रॉक संकट” युवाओं की बहादुरी का उदाहरण है। नौ अफ्रीकी-अमेरिकी छात्रों, जिन्हें बाद में “लिटिल रॉक नाइन” कहा गया, ने नस्लीय भेदभाव तोड़ते हुए सेंट्रल हाई स्कूल में दाख़िला लेने की कोशिश की। राज्यपाल के विरोध के बावजूद राष्ट्रपति आइजनहावर ने सेना भेजी और सुप्रीम कोर्ट के 1954 के फैसले को हक़ीक़त में बदला। 1960 के दशक के अंत में वियतनाम युद्ध के विरोध ने भी छात्र आंदोलनों को नई ऊर्जा दी। 1970 में केंट स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन के दौरान नेशनल गार्ड ने चार छात्रों को गोली मार दी, जिससे युद्ध-विरोधी लहर और तेज़ हो गई और 1975 में युद्ध का अंत हुआ।

फ्रांस का मई 1968 आंदोलन
फ्रांस में मई 1968 में 10 मिलियन युवा और मज़दूर पेरिस में इकट्ठा हुए। विश्वविद्यालय सुधार और मज़दूर अधिकारों की मांग ने राष्ट्रपति द गॉल को रियायतें देने पर मजबूर किया। इस आंदोलन ने वैश्विक ’68 विद्रोहों को प्रेरित किया।

तानाशाही शासन में विद्रोह
चीन का 1989 का तियानआनमेन स्क्वायर आंदोलन छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन से शुरू हुआ और लोकतंत्र व भ्रष्टाचार-विरोध की मांग तक पहुँचा। 4 जून को सेना की गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए। पूर्वी यूरोप में 1998–2000 के बीच सर्बिया के “ओत्पोर!” आंदोलन ने अहिंसक रणनीति से स्लोबोदान मिलोशेविच को सत्ता से हटाया और यह बाद की “रोज़ रिवोल्यूशन” जैसी क्रांतियों का खाका बना।

डिजिटल युग की क्रांतियाँ
अरब स्प्रिंग (2010–2012) इसका अहम उदाहरण है। ट्यूनीशिया में मोहम्मद बुआज़ीजी की आत्मदाह से शुरू हुए फेसबुक-आधारित प्रदर्शनों ने 28 साल पुराने राष्ट्रपति बेन अली को सत्ता छोड़ने पर मजबूर किया। मिस्र के तहरीर चौक पर ट्विटर और सोशल मीडिया से संगठित युवाओं ने 18 दिनों में राष्ट्रपति मुबारक को हटा दिया। लीबिया और यमन में भी युवा आंदोलन हुए, जबकि सीरिया गृहयुद्ध में डूब गया।
हांगकांग में 2014 का “अम्ब्रेला मूवमेंट” और 2019 के लोकतंत्र समर्थक विरोधों में छात्रों ने टेलीग्राम और डिजिटल माध्यमों से लाखों लोगों को संगठित किया।

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उदाहरण
नाइजीरिया में 2020 का #EndSARS आंदोलन युवाओं की ताक़त दिखाता है। इंस्टाग्राम से संगठित इस आंदोलन ने पुलिस की बर्बरता के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा। 2024 में केन्या में जेन-ज़ी कार्यकर्ताओं ने टिकटॉक के जरिये आवश्यक वस्तुओं पर कर बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध कर सरकार को नीति बदलने पर मजबूर किया।
लैटिन अमेरिका में 2019 के दौरान चिली में छात्र-नेतृत्व वाला आंदोलन असमानता के खिलाफ़ खड़ा हुआ और अंततः नए संविधान का रास्ता बना।

निष्कर्ष
सीख साफ़ है—अगर कोई सत्ता परिवर्तन से डरता है तो युवाओं पर नज़र रखें। उनके पास ऊर्जा, नेटवर्क और जिद है, जो बदलाव लाकर ही दम लेती है। और अगर आप सोचते हैं कि डिजिटल क्रांतियाँ बस मिथक हैं, तो आप ग़लत हैं।

क्षेत्रीय समानताएँ: श्रीलंका और बांग्लादेश से गूंजती प्रतिध्वनियाँ

नेपाल की उथल-पुथल हाल के दक्षिण एशियाई युवा आंदोलनों से मेल खाती है, जिसे एक तरह से “अरगलया वेव” कहा जा सकता है।

श्रीलंका: 2022 का अरगलया आंदोलन
2022 में श्रीलंका गहरे आर्थिक संकट—225% महँगाई और ईंधन राशनिंग—से जूझ रहा था। राजपक्षे परिवार के भ्रष्टाचार ने हालात और बिगाड़े। युवा गॉल फेस ग्रीन मैदान में इकट्ठा हुए, राष्ट्रपति भवन में घुस गए। राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे मालदीव भाग गए और बहुदलीय अंतरिम सरकार के लिए इस्तीफ़ा दे दिया। सोशल मीडिया बैन उल्टा पड़ा और #GoHomeGota हैशटैग और तेज़ हो गया। बिना किसी औपचारिक नेतृत्व के यह आंदोलन लोकतांत्रिक मानकों को कुछ हद तक बहाल करने में सफल रहा, हालांकि कर्ज़ का संकट बरकरार रहा।

बांग्लादेश: 2024 का कोटा विरोध
2024 में बांग्लादेश में नौकरी में आरक्षण को लेकर विरोध भड़का, जिसे शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार के पक्षपाती कदम के तौर पर देखा गया। यह आंदोलन भ्रष्टाचार-विरोधी गुस्से में बदल गया। छात्रों ने ढाका विश्वविद्यालय को घेर लिया और पुलिस से झड़प हुई। 300 से अधिक लोगों की मौत हुई। अगस्त में शेख हसीना भारत भाग गईं और अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। इंटरनेट बंद होने के बावजूद युवाओं ने डिजिटल माध्यम से #MonsoonRevolution को वैश्विक स्तर पर ट्रेंड कराया।

नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के बीच कई समानताएँ हैं: 30 वर्ष से कम उम्र की बड़ी आबादी (50% से अधिक), भाई-भतीजावाद से जुड़े घोटाले, और सोशल मीडिया पर पाबंदियाँ—जो विरोध की चिंगारी बनीं। हालांकि बांग्लादेश में भारत पर शेख हसीना को समर्थन देने के आरोप लगे, जिससे रिश्तों में खिंचाव आया, जबकि श्रीलंका में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) पर निर्भरता उजागर हुई।

ये घटनाएँ दिखाती हैं कि दक्षिण एशिया में “युवा जनसांख्यिकीय लाभ” अस्थिर देशों के लिए बोझ बन सकता है। भू-राजनीतिक रूप से यह भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति की भी परीक्षा है—नेपाल से नागरिकों को निकालने के अभियान ने बांग्लादेश जैसी पिछली कार्रवाइयों की याद दिलाई—और चीन की बेल्ट ऐंड रोड परियोजनाएँ भी अब जन-आक्रोश के निशाने पर हैं।


भारत में ऐसी क्रांतियाँ क्यों न तो संभावित हैं और न ज़रूरी 

भारत की राजनीतिक दिशा अपने पड़ोसियों श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल से स्पष्ट रूप से अलग है। जहाँ इन देशों ने नाटकीय सत्ता परिवर्तन और युवा-नेतृत्व वाले विरोध आंदोलनों का अनुभव किया, भारत बड़े पैमाने की अस्थिरता से काफी हद तक बचा रहा है। यह न तो संयोग है और न ही सख़्त नियंत्रण का नतीजा, बल्कि मज़बूत संस्थागत ढांचे और जन-शिकायतों को सुलझाने की व्यवस्थाओं का परिणाम है।

भारत का लोकतांत्रिक तंत्र युवाओं समेत विविध आवाज़ों को नियमित चुनावों, सक्रिय न्यायपालिका और बहुलतावादी मीडिया के ज़रिए शामिल करता है। ये सभी “सेफ़्टी वॉल्व” की तरह काम करते हैं, जिससे असंतोष और सुधार की ऊर्जा संस्थागत रास्तों में प्रवाहित होती है, न कि हिंसक क्रांति में। आर्थिक विविधता भी इस स्थिरता को मजबूत करती है, जिससे अचानक झटकों के बावजूद व्यापक अशांति की संभावना कम हो जाती है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) जैसे स्रोतों के आँकड़े भारत के सामाजिक-आर्थिक संकेतकों की अपने पड़ोसियों की तुलना में अधिक स्थिरता की पुष्टि करते हैं। राजनीतिक भागीदारी और आर्थिक उन्नति के कई रास्तों की मौजूदगी कट्टरपंथी उथल-पुथल की ज़रूरत को घटाती है।

संक्षेप में, भारत की स्थिरता कोई संयोग नहीं बल्कि सुविचारित संस्थागत ढांचे और नीतियों का नतीजा है, जिसने शासन में निरंतरता और अनुकूलनशीलता दोनों को मजबूत किया है। चुनौतियाँ होते हुए भी, बड़े पैमाने पर विद्रोह की संभावना और आवश्यकता भारत में बेहद कम है।

भारत की आर्थिक लचीलापन: स्थिरता और अवसर की मजबूत नींव

भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति उसे दक्षिण एशिया के बाकी देशों से अलग खड़ा करती है और पड़ोसी देशों में दुर्लभ स्थिरता प्रदान करती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार 2025 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.4% रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि भारत की नाममात्र जीडीपी 4.19 ट्रिलियन डॉलर को पार करेगी, जबकि नेपाल की जीडीपी मुश्किल से 46 अरब डॉलर तक पहुँचती है, श्रीलंका मुद्रास्फीति संकट के बाद 98 अरब डॉलर के आसपास जूझ रहा है और बांग्लादेश अब भी राजनीतिक अनिश्चितता और उद्योग-विशेष व्यवधानों से जकड़ा हुआ है। भारत की बड़ी और विविधीकृत अर्थव्यवस्था के कारण घरेलू झटके—हालाँकि मौजूद रहते हैं—लेकिन कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं जितने विनाशकारी नहीं होते। 2022 में श्रीलंका में 70% तक पहुँची महंगाई या नेपाल की रेमिटेंस-निर्भर अर्थव्यवस्था (जहाँ जीडीपी का लगभग एक-चौथाई हिस्सा विदेश से आने वाली रकम पर टिका है) यह दर्शाती है कि एकरूपी विकास रणनीति कितनी जोखिम भरी हो सकती है।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार इसकी मजबूती का अहम आधार हैं, जो सितंबर 2025 में 704.89 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर तक पहुँचे। इससे सरकार को सब्सिडी देने और सार्वजनिक अवसंरचना में निरंतर निवेश जैसे वित्तीय हस्तक्षेप जारी रखने में मदद मिली। इसके विपरीत, श्रीलंका का भंडार 2022 में 2 अरब डॉलर से नीचे गिर गया था, जिससे व्यापक कमी और सामाजिक अशांति पैदा हुई। भारत में यही भंडार युवाओं में बेरोज़गारी प्रबंधन के प्रयासों को आधार देता है—श्रम मंत्रालय और विभिन्न सर्वे के अनुसार—2015 से “स्किल इंडिया” पहल के ज़रिए 1.4 करोड़ से अधिक लोगों को उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया गया।

भारत की आर्थिक बढ़त का प्रमुख कारक उसका विविधीकरण है। 2024-25 में आईटी निर्यात का अनुमान 210 अरब डॉलर है, जो वैश्विक आउटसोर्सिंग बाज़ार में भारत की बड़ी हिस्सेदारी को दर्शाता है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना ने अगस्त 2025 तक 1.76 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित किया, जिससे दस लाख से अधिक नई नौकरियाँ बनीं और विनिर्माण उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके मुकाबले, बांग्लादेश का 84% निर्यात केवल परिधान उद्योग पर निर्भर है और नेपाल की विदेशी सहायता पर निर्भरता दोनों को नीतिगत झटकों और अस्थिरता के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है, जैसा 2025 में नेपाल के सोशल मीडिया प्रतिबंध में देखा गया।

भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र भी तेज़ी से फैल रहा है। 2025 तक 4,94,000 से अधिक स्टार्टअप शुरू हुए, जिनमें से 1,59,157 को वाणिज्य एवं उद्योग संवर्धन विभाग (DPIIT) ने मान्यता दी। सितंबर 2025 तक 73 यूनिकॉर्न कंपनियाँ उभरीं, जिनकी संयुक्त कीमत 363 अरब डॉलर से अधिक है। 806 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ताओं और यूपीआई जैसे डिजिटल ढाँचे ने वित्तीय समावेशन को मजबूत किया है। अगस्त 2025 में यूपीआई के माध्यम से 20 अरब लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत 24.85 लाख करोड़ रुपये रही, जिससे गिग इकॉनमी में सहज भागीदारी संभव हुई। इस तरह, व्यापक और गहराई लिए आर्थिक गतिविधि, भारी विदेशी मुद्रा भंडार और नवाचार व कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के प्रयासों ने भारत को सामाजिक-आर्थिक झटकों से बचाए रखने की क्षमता दी है। हालाँकि संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं, फिर भी भारत का बहु-आयामी आर्थिक आधार अपेक्षाकृत स्थिरता और विकास सुनिश्चित करता है।


भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा: सर्वसमावेशी भागीदारी की व्यवस्था 

1947 में स्थापित और 1975–77 की इमरजेंसी से और मजबूत हुआ भारत का लोकतंत्र असहमति के लिए ठोस संस्थागत रास्ते देता है, जिससे अवैध विद्रोह लगभग अप्रासंगिक हो जाते हैं। सार्वभौमिक मताधिकार इसका केंद्रीय आधार है—2024 के आम चुनाव में 969 मिलियन लोग मतदान के पात्र थे और 65.79% मतदान हुआ। युवा इसमें प्रमुख भूमिका निभाते हैं; भाजपा का युवा मोर्चा, कांग्रेस से जुड़ा एनएसयूआई और विभिन्न क्षेत्रीय दलों के छात्र संगठन शिक्षा और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर युवाओं को मंच देते हैं। इन चिंताओं के कारण “स्किल इंडिया मिशन” और नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 जैसे सरकारी कदम उठाए गए।

संघीय ढाँचा इस विशाल देश को स्थिरता देता है, क्योंकि 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में शक्ति का वितरण है। द्रमुक (तमिलनाडु) और तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल) जैसे क्षेत्रीय दल स्थानीय समस्याओं के समाधान में अग्रणी हैं, जो नेपाल की बदलती गठबंधनों वाली राजनीति या बांग्लादेश के केंद्रीकृत शासन से बिल्कुल अलग है। यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत में वर्णित “सहमति-आधारित मॉडल” जैसी है, जो शक्ति-साझेदारी और विविधता को समायोजित करती है।

भारतीय नागरिकों में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा मजबूत है। प्यू रिसर्च सेंटर के 2023 सर्वे के अनुसार 70% भारतीय मानते हैं कि उनका देश वैश्विक मंच पर प्रभाव बढ़ा रहा है। पड़ोसी देशों की तुलना में भारतीय युवाओं में संस्थागत भरोसा अधिक (78% बनाम क्षेत्रीय 45%) दर्ज हुआ। यह ढाँचा भारत की सहभागी लोकतंत्र और बहु-स्तरीय शासन के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।


न्यायपालिका और भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र: जवाबदेही की गारंटी 

भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र की अहम सुरक्षा-रेखा है। जनहित याचिकाओं (PIL) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने कई बार निर्णायक हस्तक्षेप किया—2012 में 2G स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद्द करना (20 अरब डॉलर का घोटाला) और 2017 का आधार-गोपनीयता फैसला प्रमुख उदाहरण हैं।

नेपाल में 2025 के विद्रोह के दौरान अदालतों पर हिंसक हमले हुए, जबकि भारत में विवादों का समाधान संस्थागत तरीकों से हुआ। 2019 के सीएए विरोध के दौरान न्यायपालिका ने 140 से अधिक याचिकाएँ सुनीं और 2020-21 के किसान आंदोलन में सभी पक्षों से संवाद किया, जिससे बिना हिंसा के विवादित कानून वापस लिए गए।

भ्रष्टाचार-रोधी ढाँचा—जैसे सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और 2005 का सूचना का अधिकार (RTI) कानून, जिसके अंतर्गत हर साल छह मिलियन से अधिक आवेदन आते हैं—वंशानुगत राजनीतिक हितों पर अंकुश लगाने में मदद करता है। यह नेपाल में बार-बार उभरते “नेपो किड्स” घोटालों से स्पष्ट विरोधाभास दिखाता है।


मीडिया, शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता: भारत की सहनशीलता के अन्य स्तंभ 

2025 के आरएसएफ वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में भारत की रैंक 151 है, जो पिछले वर्ष के 159 से थोड़ा बेहतर है। 1 लाख से अधिक प्रकाशन सार्वजनिक विमर्श में बहुलता बनाए रखते हैं। नेपाल के प्रमुख अख़बारों पर पड़े प्रतिबंधों की तुलना में भारत का मीडिया अपेक्षाकृत स्वतंत्र है।

शिक्षा के क्षेत्र में 2020 की नई शिक्षा नीति और 1,113 विश्वविद्यालय सामाजिक उन्नति में निवेश दर्शाते हैं। हालाँकि, वर्ल्ड इकॉनमिक फ़ोरम के सोशल मोबिलिटी इंडेक्स (2020) में भारत 82 में से 76वें स्थान पर है। आरक्षण (22.5%) वंचित समूहों की पहुँच बढ़ाता है, पर खाई बनी रहती है। 1991 के आर्थिक सुधारों से बढ़ा 40 करोड़ से अधिक का मध्य वर्ग व्यक्तिगत आकांक्षाओं का बड़ा सहारा है। श्रीलंका की आर्थिक गुटबाज़ी की तुलना में भारत की सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता, कमियों के बावजूद, पैमाने और निरंतर बदलाव पर आधारित लचीलापन दिखाती है।


भारत का भू-राजनीतिक प्रभाव: जी20 नेतृत्व और क्षेत्रीय मध्यस्थता

2023 में जी20 की मेज़बानी ने भारत की वैश्विक स्थिति को मज़बूती दी। यह केवल प्रतीकात्मक नहीं था; श्रीलंका को 4 अरब डॉलर की मदद जैसे ठोस कदमों ने क्षेत्र को स्थिर किया और भारत को पड़ोसी अस्थिरता से बचाने में भूमिका निभाई।

700 अरब डॉलर से अधिक के विदेशी मुद्रा भंडार, यूपीआई के ज़रिए अरबों डिजिटल लेनदेन और यूनिकॉर्न कंपनियों का बढ़ता पोर्टफोलियो भारत की संस्थागत मज़बूती को दर्शाता है। भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे, न्यायिक जवाबदेही और सामाजिक तंत्र निरंतर अनुकूलन की क्षमता दिखाते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर क्रांतिकारी बदलाव की आवश्यकता नहीं रहती।


पाकिस्तान और व्यापक दक्षिण एशिया के लिए निहितार्थ

नेपाल और बांग्लादेश की हाल की घटनाओं के संदर्भ में पाकिस्तान की स्थिति जटिल है। 2025 की बाढ़ से 3.3 करोड़ लोग विस्थापित हुए, पर पनामा पेपर्स में नाम आने के बावजूद पाकिस्तान के अभिजात वर्ग ने जवाबदेही से बचाव किया। 8 करोड़ उपयोगकर्ताओं वाला टिकटॉक जैसे डिजिटल माध्यम ध्यान भटकाते हैं। युवाओं में बेरोज़गारी लगभग 40% है, जो नेपाल की जनसांख्यिकीय चुनौतियों जैसी है। लेकिन पाकिस्तान में सेना का मजबूत नियंत्रण (संविधान का अनुच्छेद 245) बड़े पैमाने के जन-आंदोलनों को रोकता है।

अगर नेपाल का नागरिक आंदोलन ठोस सुधार हासिल करता है, तो ऐसी आकांक्षाएँ पाकिस्तान के विपक्षी समूहों में भी उभर सकती हैं, खासकर इमरान खान समर्थक और पश्तून नेटवर्क में। IMF द्वारा थोपे गए कठोर कदम जन-असंतोष भड़का सकते हैं।

क्षेत्रीय स्तर पर असर गंभीर हो सकता है। नेपाल से शरणार्थियों का प्रवाह भारत की सीमाओं पर दबाव डाल सकता है, जबकि नेपाल-भारत 8 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार में व्यवधान व्यापक आर्थिक प्रभाव ला सकता है। चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजनाएँ भी निशाने पर आ सकती हैं, जिससे चीन की भागीदारी और गहरी हो सकती है। अमेरिका, विशेषकर USAID के माध्यम से, लोकतंत्र को बढ़ावा देकर भारत की संयमित कूटनीति का संतुलन साधने की कोशिश करता है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के विरोध इस्लामी गुटों या नेपाल के माओवादी तत्वों द्वारा भड़काए जा सकते हैं। हालाँकि सकारात्मक संभावनाएँ भी हैं—जैसे युवा संसदों का उभरना या डिजिटल गवर्नेंस में सुधार—जो क्षेत्रीय लचीलापन बढ़ा सकते हैं।


निष्कर्ष: खंडित विश्व व्यवस्था में युवा सक्रियता की दिशा

नेपाल का हालिया जेन-ज़ेड नेतृत्व वाला आंदोलन—सितंबर के दूसरे सप्ताह में इस्तीफ़ों और व्यापक अशांति तक पहुँचा—अंतरराष्ट्रीय राजनीति में युवा आंदोलनों की केंद्रीयता को रेखांकित करता है। सोवेटो से लेकर तहरीर स्क्वायर तक, युवाओं ने बार-बार स्थापित सत्ता को चुनौती दी है। हाल की घटनाएँ—सैन्य गश्त, प्रतिबंध हटाना और शहरी टकराव—तनाव में अस्थायी कमी का संकेत देती हैं, पर गहरी दरारें अब भी भरी नहीं हैं।

दक्षिण एशिया में नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और अफ़ग़ानिस्तान ने अपने संस्थानों की कमज़ोरियों को उजागर किया है, जबकि भारत की तुलनात्मक स्थिरता सक्रिय शासन का प्रमाण मानी जाती है। इसके विपरीत, पाकिस्तान का बिना रोकटोक सोशल मीडिया पर निर्भर रहना अपने आप में जोखिमपूर्ण है—नेपाल का असंतोष यह दिखाता है कि ऐसे दबाव वाल्व कितनी जल्दी फट सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विद्यार्थियों और विद्वानों के लिए यह घटनाक्रम अहम सवाल खड़ा करता है: डिजिटल जुड़ाव और बहुध्रुवीयता के युग में क्या राज्य अपनी युवा आबादी की ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ सकते हैं, या हम लोकप्रिय आंदोलनों से जन्म लेने वाले नए प्रकार के प्रभुत्व के साक्षी बन रहे हैं? नेपाल का अनुभव बताता है कि यदि क्षेत्र अपने जनसांख्यिकीय लाभ को संभालना चाहता है तो उसे अलगाव नहीं, बल्कि अनुकूलन अपनाना होगा—वरना अस्थिरता का खतरा बना रहेगा।

 

नोट : लेखक जामिया हमदर्द नई दिल्ली के हामदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ेसर हैं , उनका यह लेख ENGLISH  में प्रकाशित हुआ है यहाँ AI का अनुवाद पेश कया जा रहा है , आप इसे यहाँ ENGLISH में पढ़ सकते हैं .

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