आज़ादी एक नेमत है, इसकी कद्र करें और एक अमानत है, इसकी हिफाज़त करें : मौलाना असगर अली इमाम मेहदी सलफ़ी

मरकज़ी जमीयत अहले हदीस हिंद के उच्च शैक्षणिक एवं शोध संस्थान अल-मअहद अल-आली लित-तख़स्सुस फ़िद-दिरासातिल इस्लामिया, अबुल फ़ज़ल एन्क्लेव, नई दिल्ली में गरिमापूर्ण स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन

दिल्ली, 16 अगस्त 2026: देश के सभी नागरिकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। स्वतंत्रता एक बड़ी नेमत है, इसकी कद्र करें और यह एक बड़ी अमानत है, इसकी हिफाज़त करें। यह स्वतंत्रता हमें अपने पूर्वजों की महान संघर्षशीलता और कुर्बानियों के बाद हासिल हुई है। केवल दिल्ली में ही हजारों उलमा-ए-किराम को धधकती हुई आग में डाल दिया गया और हजारों को फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया गया। उन्हें कैद और बंदी की सजाएँ दी गईं।
स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बहुत पुराना है, जो शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी (रह.) की कोशिशों और उनकी संतानों एवं वंशजों, फिर टीपू सुल्तान, नवाब सिराजुद्दौला, शहीदाने बालाकोट, इस्कंदर-अज़्म शाह मुहम्मद इस्माइल शहीद और सैयद अहमद शहीद (रह.) की शहादत तथा फ़राइज़ी आंदोलन के मीर निसार अली उर्फ़ तीतू मियाँ, हाजी शरीअतुल्लाह और उनके पुत्र हाफिज़ मुहम्मद मोहसिन उर्फ़ दूदू मियाँ के त्याग एवं कुर्बानियों से शुरू होकर 1947 तक फैला हुआ है।
1857 का विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम का पहला सशस्त्र संघर्ष नहीं था, बल्कि उससे पहले सैकड़ों सशस्त्र युद्ध लड़े जा चुके थे। तब जाकर यह देश आज़ाद हुआ। इसमें धर्म के भेदभाव के बिना किसी न किसी रूप में सभी भारतीयों की कुर्बानियाँ शामिल हैं। इन विचारों का व्यक्त करते हुए मरकज़ी जमीयत अहले हदीस हिंद के अमीर मौलाना असगर अली इमाम मेहदी सलफ़ी ने कहा । वे कल, 15 अगस्त 2026 को मरकज़ी जमीयत अहले हदीस हिंद के उच्च शैक्षणिक एवं शोध संस्थान अल-मअहद अल-आली लित-तख़स्सुस फ़िद-दिरासातिल इस्लामिया, अबुल फ़ज़ल एन्क्लेव, नई दिल्ली में आयोजित गरिमापूर्ण स्वतंत्रता दिवस समारोह में ध्वजारोहण के अवसर पर उपस्थित लोगों को संबोधित कर रहे थे।
मौलाना सलफ़ी ने आगे कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में तहरीके शहीदैन के प्रशिक्षित ख़ुलफ़ा-ए-सादिक़ान-ए-सादिकपुर, विशेष रूप से मौलाना विलायत अली और मौलाना इनायत अली आदि ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद किया और अपना तन, मन और धन सब कुछ देश की आज़ादी के लिए न्योछावर कर दिया। इसका उल्लेख भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी इन शब्दों में किया था कि यदि सभी भारतीयों की कुर्बानियों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए और केवल सादिकपुर (अहले हदीस) के लोगों की कुर्बानियों को दूसरे पलड़े में रखा जाए, तो अहले सादिकपुर की कुर्बानियों वाला पलड़ा भारी होगा।
अमीर-ए-मोहतरम ने अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में हमारे दिलों में छिपे दर्द को वही व्यक्ति समझ सकता है जो हमारे पूर्वजों की कुर्बानियों से परिचित हो। नई पीढ़ी को पूर्वजों की कुर्बानियों के बारे में बताना और पढ़ाना आवश्यक है, ताकि वे स्वतंत्रता की नेमत का सही रूप से एहसास कर सकें, देश और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें, उनके तकाज़ों को पूरा करें और देश के प्रति अपनी वफादारी का हक अदा करें।
अमीर-ए-मोहतरम ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि स्वतंत्रता का जश्न मनाना निस्संदेह बड़ी खुशी की बात है, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे अंदर कई ऐसी चीजें भी प्रवेश कर गई हैं जो स्वतंत्रता की भावना के बिल्कुल विपरीत हैं। हमारे पूर्वज उस समय स्वतंत्रता प्राप्त करने में सफल हुए जब वे विभिन्न रंग, नस्ल, जाति और धर्म-मज़हब के बावजूद आपस में एकजुट और सहमत थे तथा राष्ट्रीय एकता और सांप्रदायिक सद्भाव की भावना से ओतप्रोत थे। आज भी इसी भावना को बढ़ावा देने की आवश्यकता है और इसी के द्वारा स्वतंत्रता की नेमत की रक्षा संभव है।
उन्होंने कहा कि देश हमारा है और हमारे पूर्वजों एवं बुजुर्गों ने आज़ादी के बाद इसे अपने खून-पसीने से सींचा और विकसित किया तथा पारंपरिक अमन-शांति और गंगा-जमुनी तहज़ीब के साए में इस अमानत को हम तक पहुँचाया। बदलते हुए हालात में इस अमानत का सम्मान और संरक्षण करना समय की बड़ी आवश्यकता है। याद रखें कि जब हम अपने प्यारे वतन के लिए समर्पित होंगे, तभी यह वतन भी हमारे लिए होगा। इस हकीकत को समझना बेहद जरूरी है।
मौलाना ने अपने संबोधन में स्वराज और हिंदू-मुस्लिम एकता के संदर्भ में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और सर सैयद अहमद खान के ऐतिहासिक कथनों का भी उल्लेख किया तथा देश की सुरक्षा, निर्माण और विकास के लिए दुआ की।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस अवसर पर अमीर-ए-मोहतरम मौलाना असगर अली इमाम मेहदी सलफ़ी के हाथों ध्वजारोहण के बाद राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और राष्ट्रीय गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा’ प्रस्तुत किया गया तथा उपस्थित लोगों के बीच मिठाइयाँ वितरित की गईं।
इस समारोह में अल-मअहद अल-आली लित-तख़स्सुस फ़िद-दिरासातिल इस्लामिया के शिक्षक एवं विद्यार्थी, मरकज़ी जमीयत अहले हदीस हिंद के पदाधिकारी, कार्यकर्ता एवं संबद्ध लोग, इसके अलावा आसपास के क्षेत्रों की अनेक महत्वपूर्ण हस्तियाँ मौजूद थीं। इनमें मौलाना अब्दुल अहद मदनी, मौलाना अब्दुल गनी मदनी, डॉ. मुहम्मद शीष इदरीस तैमी, अयाज़ तक़ी, डॉ. अब्दुल वासेअ तैमी, मौलाना मुहम्मद रईस फैज़ी, शम्सुद्दीन, रहमत कलीम, मुहम्मद रियाज़, मौलाना अमजद रियाज़ी, हाफिज़ एहतिशाम आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

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