बिजली संशोधन बिल 2020 | पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्री बिजली निजीकरण रद्द करने के लिए केन्द्र को लिखें: फेडरेशन

बिजली संशोधन बिल 2020 | पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्री बिजली निजीकरण रद्द करने के लिए केन्द्र को लिखें: फेडरेशन

जालंधर | ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों से आग्रह किया है कि वे पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश में निहित ङ्क्षबदुओं के आधार पर बिजली संशेाधन विधेयक 2020 और निजीकरण के लिए मानक बोली दस्तावेज (एसबीडी) को वापस लेने  के लिए केंद्र सरकार पत्र लिखें।

एआईपीईएफ ने अपने राज्य के घटकों से कहा है कि वे राज्य के अन्य संघों के साथ समन्वय से आठ दिसंबर को किसानों के संघर्ष के साथ पूरी एकजुटता व्यक्त करने के लिए दोपहर के भोजन के दौरान प्रदर्शन सुनिश्चित करें। किसानों की एक मुख्य मांग बिजली (संशोधन) विधेयक 2020 को वापस लेना है।       

एआईपीईएफ के प्रवक्ता विनोद कुमार गुप्ता ने बताया ने राज्यों के सभी मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल को पत्र लिखा है कि यूटी पावरमैन यूनियन की याचिका पर चंडीगढ़ प्रशासन की बिजली ङ्क्षवग के निजीकरण के लिए निविदा प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। आदेश के अनुसार सरकार की शत-प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर चंडीगढ़ में बिजली उपयोगिता के निजीकरण के लिए कदम कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है क्योंकि बिजली संशोधन विधेयक 2020 में डिस्कॉम के निजीकरण का मुद्दा अपने दायरे में नहीं है।

उन्होंने बताया कि मुनाफे में चल रहे और पिछले तीन साल से राजस्व आधिक्य बिजली ङ्क्षवग में शत-प्रतिशत हिस्सेदारी की बिक्री अन्यायपूर्ण और गैरकानूनी है। इसके अलावा सभी हितग्राहियों की आपत्तियों को जाने बिना ही स्थानांतरण योजना तैयार कर ली गई है।       

पत्र में इस बात का जिक्र किया गया है कि कई केंद्र शासित प्रदेशों जैसे जम्मू कश्मीर, लद्दाख और पुड्डुचेरी ने निजीकरण पर अपना विरोध जताया है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश निजीकरण के लिए उनका विरोध अब पर पुष्टि करता है। किसी भी केंद्र शासित प्रदेश या राज्य में निजीकरण प्रक्रिया के लिए तैयार किए गए किसी भी दस्तावेज को उच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनजर होल्ड पर रखा जाना चाहिए । अगर किसी भी राज्य ने राज्य डिस्कॉम में निजीकरण की प्रक्रिया शुरू की है, तो ऐसी कार्रवाई पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि याचिका में उठाए गए सिद्धांतों के मामले केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा भारत के प्रत्येक राज्य के लिए समान महत्व और प्रयोज्य हैं।

 

0 comments

Leave a Reply