झुग्गियों में ही आख़िर क्यूं बांटा जाता है कंबल कपड़ा और खाना
क़ौम को ज़लील व रूसवा होने से बचाना है तो ग़रीबों का सीधा सहयोग करना सिखे अवाम
लेख : क़मर क्रांति
आज शायद ही ऐसा कोई खानदान या मुहल्ला या गांव या गली हो जहां आपको ग़रीब , परेशान या लाचार लोग नहीं मिलेंगे । लेकिन हम आप आम तौर पर क्या करते हैं ? क्या हम उनकी सीधे सीधे मदद करते हैं ? या तंज़ीमों को चंदा देकर इत्मिनान हो जाते हैं ,यह सोच कर कि हमने तो अल्लाह की राह में ख़र्च कर दिया है? दर हक़ीक़त यह शॉर्ट कट और ग़ैर ज़िम्मेदाराना तरीक़ा है । आख़िर हम ऐसा क्यूं करते हैं ?
आइये समझते हैं
दरअसल हम तंज़ीमों, संस्थाओं , एनजीओ और एक्टिविस्टों के कंबल ,खाना राशन किट बगैरह बांटने की तस्वीरों को फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्स एप पर देख कर प्रभावित हो जाते हैं और उन्हें पेटीएम गुगल पे, फोन पे या सीधे अकाउंट में पैसा भेजकर मदद कर देते हैं। क्योंकि आप तस्वीरों को देखकर यही सोचते हैं यह लोग तो अल्लाह वाला काम कर रहे हैं। लेकिन आज इनके मॉडल को समझिए। ताकि आप दीन के कामों को दीनी तरीक़े से अंज़ाम दे सकें। इस्लाम लाचार गरीब व परेशान लोगों की सीधे सीधे मदद करने का हुक्म देता है यानी लाभार्थी तक सीधा सहयोग पहुंचाने की बात करता है। इस्लाम की माने तो यहां कोई वाया नहीं चलेगा ।
लाभार्थी तक आपकी मदद पहुंची ?
किसी मौलाना, संस्था, तंज़ीम या एनजीओ या एक्टिविस्ट को आप गरीबों या यतीमों या फकीरों के नाम पर मदद कर देते हैं तो आपकी यह मदद एक तरह से बेकार कोशिश है क्योंकि आपको नहीं मालूम कि लाभार्थी तक आपकी मदद पहुंची भी है या नहीं पहुंची है ? इसलिए इस्लाम इस बात पर जोड़ देता है कि लाभार्थी के हाथ में मदद पहुंचे।
इसके लिए अल्लाह और अल्लाह के रसूल स अ व ने बेहतरीन उपाय भी बताया है। हमारे घरों के इर्दगिर्द 40 घरों को हमारा पड़ोसी करार दिया है और पड़ोसी के अधिकार को समझने के लिए हमारे नबी मुहम्मद स अ व का यह कॉल ही काफी है। मुहम्मद स अ व कहते हैं कि " मुझे डर है कि कहीं अल्लाह एक पड़ोसी के जायदाद में दूसरे पड़ोसी को हक़ न दे दें"। यानी हमें अपने 40 पड़ोसियों की ख़बर खैरियत मालूम करते रहना है और उसकी जायज़ ज़रूरतों में खड़ा रहना है। अब अगर हर मुसलमान अपने अपने घरों के इर्दगिर्द 40 घरों की ख़बर रखेगा तो इससे बेहतरीन सिविल सोसायटी बन ही नहीं सकता। यहां ग़ौरतलब यह भी है अल्लाह जब पड़ोसी की बात करता है तो सिर्फ़ पडोसी की बात करता है । यह नहीं कहता कि मुस्लिम पड़ोसी या हिंदू पड़ोसी या ईसाई पड़ोसी , यहां पड़ोसी का मूल अर्थ पडोसी ही है चाह वह किसी धर्म जाति या क्षेत्र का हो ।
समझने वाली बात
हमें उसके अधिकारों का ख़्याल रखना है। अब ज़रा सोचिए अगर दुनिया का मुसलमान अपने पड़ोसियों के दुख दर्द में खड़ा रहेगा तो इससे बेहतरीन सद्भावना की मिसाल क्या देखने को मिलेगा। लेकिन जब सिविल सोसायटी ख़त्म होता है तब लोन देने वाली बैंक और इंश्योरेंस कंपनी बगैरह का जन्म होता है जहां मुसलमान हराम सुद लेने और देने दोनों के लिए मजबूर होता है। समझने वाली बात यह भी है जिस अल्लाह और नबी स अ व का हवाला देकर ग़रीबों यतीमों विधवाओं फकीरों के नाम पर संस्थाएं,तंज़ीमें, एनजीओ और एक्टिविस्ट हम आपसे ज़कात और सदका लेते हैं वह स्वंय गैर इस्लामी तरीके से संस्था चला रहे होते हैं। क्या आपने किसी इस्लामी संस्था तंज़ीम एनजीओ या एक्टिविस्ट द्वारा साल की आमदनी और खर्चे का ब्योरा अपने बेवसाइट या सोशल मीडिया बग़ैरह पर शेयर करते पाया है जहां तमाम जानकारियां मिल जाए ?
किस ने कितना चंदा दिया और कहां कहां ख़र्च किया गया है ?
जहां यह जानकारी मिल जाए कि किस किस ने कितना चंदा दिया है? कहां कहां ख़र्च किया गया है ? सैलरी में कितना खर्च हुआ ? बिजली बिल से लेकर गार्ड चपरासी इमाम बगैरह को कितना दिया गया है? अगर कोई काम हुआ है या कोई सामान खरीदा गया है तो उसमें कितना खर्च हुआ है ? और इन तमाम खर्चों के सबूत यानी स्पोर्ट में डॉक्यूमेंट्स भी शेयर किए हों? क्या हमारे सामने एक मॉडल या मिसाल है ? यह उन तंज़ीमों संस्थाओं एनजीओ एक्टिविस्टों की सच्चाई है जो अपने आपको इस्लामिक कहते हैं। अब ज़रा सोचिए कि इस्लामिक तंजीमें संस्थाएं एनजीओ एक्टिविस्ट ही ट्रांसपैरेंट यानी पारदर्शी न हो तो फिर कौन होगा ?
हैरानी की बात यह है
अब क्योंकि यह संस्थाएं भले ही दीनी नाम रखे हो लेकिन पारदर्शी नहीं है इसलिए इन संस्थानों को तंज़ीमों को एनजीओ और एक्टिविस्टों को दीन के नाम पर लोगों को ठगने वाली एजेंसी ही कहनी चाहिए। हैरानी की बात यह है कि जो सरकार इन्हें एक रूपए की मदद नहीं करती वहां यह सालाना रिपोर्ट तमाम डॉक्यूमेंट्स के साथ जमा करते हैं। लेकिन जिस पब्लिक यानी क्राउड फंड से यह संस्थाएं चलती है उसी से कोई भी जानकारी साझा नहीं किया जाता है। इनके काम करने के तरीकों यानी मॉड्यूल पर भी ग़ौर करना होगा। 100 रुपए के कंबल को सौ लोगों में बांटकर लाखों करोड़ों लोगों में फेसबुक ट्विटर व्हाट्स एप के ज़रिए प्रचार किया जाता है। लाखों रूपयों देकर कॉन्ट्रैक्ट पर बक़ायदा पी आर एजेंसी हायर की जाती है। यह पी आर एजेंसी प्रोफेशनल वीडियो बनाते हैं और उसमें दिल को झकझोर देने वाले डॉयलॉग डाले जाते हैं ताकि आप वीडियो देखते ही चंदा दे दें।
इस मॉड्यूल को और करीब से समझिए
सौ सौ रूपए के मामूली से सौ कम्बल को सौ लोगों में बांटने का खर्चा अगर आप जोड़ेंगे तो दस हज़ार आता है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि इस दस हज़ार की लागत कितना फंड पैदा करता है? मान लीजिए सिर्फ़ एक हज़ार लोगों ने एक हज़ार रूपए के औसत से ही फंड भेज दिया तो कंबल बांटने की एक पोस्ट से करीब दस लाख रूपए तक आ जाते हैं। यह आंकड़े तब है जब सिर्फ़ एक हज़ार लोग तावुन यानी दान करते हैं। यही वजह है कि आज संस्थाएं अपने असली ऑब्जेक्टिव की जगह ऐसे काम करती है जिससे फंड पैदा होता है। दरअसल यह काम तमाम संस्थाएं और तंज़ीमें अपने सरवायवल (अस्तित्व) यानी अपना खर्चा पानी निकालने के लिए करती है। आपने देखा होगा कि बड़ी बड़ी तंज़ीमों में सैंकड़ों लोग नौकरी कर रहे होते हैं। बड़ी बड़ी बिल्डिंगस् होती हैं जिसका लंबा चौड़ा बिजली का बिल आता है। गार्ड्स से लेकर चपरासी लगे होते हैं।
फंड रेजिंग का यह सबसे सटीक और बेहतरीन मॉडल है
सबकी सैलरी जनता के चंदे पर टिका होता है। यानी जो पैसा आप कंबल और खाना के एक पैकेट की तस्वीर देखकर देते हैं उसका 80-90 फ़ीसदी तो तंजीमों के सरबराह , स्टाफ, बिजली बिल व मेंटेनेंस में ही खर्च हो जाता है। यानी यह तंज़ीमें सिर्फ़ अपनी सैलरी निकालने और आराम की ज़िंदगी गुज़ारने के लिए कंबल खाना बगैरह बांटती है और तस्वीरों को वायरल करती है और हम इन तस्वीरों से प्रभावित होकर यह समझ रहे होते हैं कि वाह क्या काम कर रही है। सबसे अहम बात समझने वाली यह है कि जिन लोगों को यह कंबल खाने का पैकेट बगैरह बांटा जाता है वही लोग सभी तंज़ीमों का टारगेट होते हैं यानी सभी उनको कुछ न कुछ बांट रहे होते हैं। मिसाल के तौर पर आप देखते होंगे कि शाहीन बाग़ से सटे श्रम विहार में कंबल से लेकर बिरयानी बांटने की तस्वीरें अलग अलग तंज़ीमों द्वारा आपके सामने आती ही रहती है। फंड रेजिंग का यह सबसे सटीक और बेहतरीन मॉडल है। सौ दो सौ लोगों को सस्ते कंबल और बिरयानी बांट दो और उसकी वीडियो तस्वीरें बनवाकर वायरल कर दो। समझने वाली बात यह भी है कि झुग्गी में रहने वाले यह लोग अपने सेल्फ रेस्पेक्ट यानी आत्म सम्मान को दफ़न कर चुके होते हैं इसलिए जो कोई भी राशन से लेकर कपड़े खाना का एक पैकेट बांटने आते हैं तो वह दौड़ पड़ते हैं । जहां यह लोग काम कर रहे होते हैं वहां भी खुलकर मदद मांगते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में कुछ भी अब छुपा नहीं होता
सरकारी राशन और सुविधाओं को भी भोगते हैं यानी यह लोग हर तरफ से मदद लेते हैं और तंज़ीमों की दुकान का यह लोग शौक से ईंधन बनते रहते हैं। इनको मालूम है कि सौ रूपए के एक कंबल को दिखाकर यह तंज़ीम वाले लाखों करोड़ों चंदा इकट्ठा करते हैं इसलिए इनके आंख में भी सेल्फ रेस्पेक्ट हया बग़ैरह ख़त्म हो चुका होता है। सोशल मीडिया के इस दौर में कुछ भी अब छुपा नहीं होता । झुग्गी वाले से लेकर बंगले वाले को सबको अब सब कुछ पता होता है। क्या आपने कभी सोचा है कि यह एक्टिविस्ट और तंज़ीमें झुग्गियों में ही कंबल कपड़ा और खाना राशन क्यूं बांटते हैं ? क्योंकि इन्हें अच्छे से मालूम है कि यह वह लोग हैं जहां थैले में कुड़ा रखकर भी बांटने भी जाएं तो यह भीड़ लगा देंगे और भीड़ से बेहतरीन वीडियो या फोटो क्या बनेगा । ऊपर से इन्हें क्वालिटी से भी कोई सरोकार नहीं। खुद जितना इस्तेमाल कर सकते हैं करते हैं बाक़ी चंद रूपयों में बेच देते हैं।
इस्लाम ने 40 पड़ोसियों की हद बंदी किस लिए की है ?
शहरों में फकीरों का रोज़ाना राशन मांगना और फिर उसे शाम में औने पौने में दुकानों में बेच देना अब कारोबार बन चुका है और यस धंधा स्थापित भी हो चुका है। ऐसे सभी लोग झुग्गियों से ही तो आते हैं। यानी झुग्गी और तंज़ीम आज दोनों एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं और दोनों दोनों को पाल पोस रहे हैं। इन सबमें हमारे आपके पड़ोस में रह रहे गरीब लाचार परेशान लोग और गरीब रिश्तेदार छुट रहे हैं। इसलिए 1400 साल पहले ही सीधा सहयोग का तरीक़ा इस्लाम ने बता दिया और उसकी निशानदेही के लिए 40 पड़ोसियों की हद बंदी भी कर दी गई। लेकिन समझने वाली बात यह है कि यह कारोबार आख़िर क्यूं फलता फूलता गया ? क्योंकि हमने इस्लाम को पढ़ने समझने की कोशिश ही नहीं की।
क्या आपका सदका ,ज़कात या इमदाद जरूरत मंदों तक पहुँच रहा है ?
जो मौलाना समझा दिए वही हमने समझ लिया।ऊपर से हम एक हज़ार दो हज़ार पांच हज़ार इन तंज़ीमों को देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। हम यह तो समझते हैं कि गरीबों को कंबल देना, खाना देना सवाब का काम है लेकिन हम यह आज तक नहीं समझ सके कि जो पैसा आप तंज़ीमों को देते हैं उसका 80-90 फीसदी तो उन ग़रीबों तक पहुंचता ही नहीं है। इसलिए तो अल्लाह ने मदद का सबसे बेहतरीन मॉडल सीधा सहयोग बताया यानी मुसतहकीन के हाथ में सीधे मदद पहुंचे । जहां यह दिख जाए कि आपका सदका ज़कात या मदद असली और अंतिम हाथों में नहीं पहुंच रहा है वह सदका ज़कात मदद बेकार है। यानी बकरे की जान भी गई और आपको गोश्त भी नहीं मिला। आपका सदका आपका ज़कात या मदद सही लोगों तक तंजीम या कोई व्यक्ति पहुंचा रहा है या नहीं पहुंचा रहा है उसको जानने का सबसे बेहतरीन तरीका है उसके पारदर्शिता को देखना। क्या किसी तंज़ीम ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट अपने बेवसाइट पर जारी करती है जिससे यह पता चल जाए कि उसको कुल कितने चंदे मिले , कितने खर्च हुए , कहां कहां ख़र्च हुए ? लेकिन क्या कभी हम आपने सोचा है कि यह गोरखधंधा क्यूं शुरू हुआ , क्यूं पनपा और क्यूं आज आम हो चुका है ?
क्या हमारे पड़ोस में खानदान में मुहल्ले में गांव में रिश्तेदारी में ग़रीब नहीं होते ?
क्योंकि हम बुनियादी बात नहीं समझ सकें कि अल्लाह ने क़ुरान में बता दिया है कि ज़कात किस किसको देना है और मदद किस किस की करनी है ! क्या हमारे पड़ोस में खानदान में मुहल्ले में गांव में रिश्तेदारी में ग़रीब नहीं होते हैं। क्या हमने कोई ऐसा मैकेनिज़्म तैयार किया है जिससे यह पता चल सके कि हमारे पड़ोस में कौन परेशान हाल है, हमारे मुहल्ले में गांव में कौन कौन परेशान हाल है । हम आज तंज़ीमों संस्थाओं और एक्टीविस्टों के भरोसे बैठ गए हैं जो थोड़ा भी पारदर्शी नहीं है ।
जरूरतमंदों को सीधा सहयोग करना सीखें
इसके बावजूद इन तंज़ीमों संस्थाओं और एक्टीविस्टों की दुकान को बढ़ावा देने का एक गंभीर परिणाम शायद आपको नज़र नहीं आता है उसे भी समझ लीजिए। क्योंकि अधिकतर मुस्लिम तंज़ीमें संस्थाएं और एक्टिविस्ट पारदर्शी नहीं होते , चंदे का लेखा जोखा नहीं रखते फिर एक दिन सरकार की नज़र इन पर पड़ती है । सरकार गड़बड़ियों को देखकर इनके मालिकों को उठाती है। यह स्वंय तो जेल जाते हैं लेकिन पूरी उम्मत को शक के दायरे में डाल जाते हैं। मीडिया को तरह तरह के इल्ज़ाम लगाने का मौक़ा मिल जाता है मसलन विदेशी टेरर फंड और विदेशी टेरर ऑर्गनाइजेशन से लिंक बगैरह बगैरह। यानी सिर्फ़ एक गलती पारदर्शी न होने , फंड को ईमानदारी से लाभार्थी तक नहीं पहुंचाने और इसका लेखा जोखा नहीं रखने की वजह से सरकार इन पर कार्रवाई करती है और बाद में राजनीतिक फायदों के लिए धाराएं जोड़ देती है। जिसका असर पूरी उम्मत पर पड़ता है। इसलिए अगर आप खुद को, पूरी क़ौम को ज़लील होने से बचाना चाहते हैं तो सीधा सहयोग करना सीखें , आदत में लाएं और उन्हीं तंज़ीमों या एक्टिविस्टों को ज़कात या सदका़ दें जो पार्दर्शी हो , आपसे लेखा जोखा शेयर करती हो , खर्चे का सही दस्तावेज साझा करती हो । ताकि क़ौम सरकारी गिरफ्त और मीडिया ट्रायल से बच सके ।
नोट : लेखक मिथिला पोस्ट के संपादक हैं और यह उनके निजी विचार हैं ।

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