दिल्ली चुनाव के नतीजे : मतलब ज़मीर ज़िन्दा है

दिल्ली विधान सभा चुनाव के नतीजे किसी के लिये मायूसकुन, किसी के लिये हैरानकुन और किसी के लिये ख़ुशकुन हो सकते हैं, मगर उम्मते-मुस्लिमा के लिये फ़ैसलाकुन हैं। दिल्ली के चुनाव का ऐलान उस वक़्त हुआ था जब मुल्क में CAA, NPR और NRC के ख़िलाफ़ बिगुल बज रहा था। मुल्क में एक नहीं सैंकड़ों शाहीन बाग़ बन चुके थे। इन हालात में केन्द्र में अपना क़ब्ज़ा जमाए बैठी पार्टी के मुनज़्ज़म (सुसंगठित), निष्ठावान, अन्धभक्त कैडर की एक बड़ी फ़ौज……. जिसमें अमीर-ग़रीब, मन्त्री-संत्री सब शामिल थे…… के साथ “आम आदमी” का मुक़ाबला हुआ। इस चुनाव में फासीवादी नाग के तमाम ज़हरीले रंग ज़ाहिर हो गए, मुसलमानों से नफ़रत का खुल्लम-खुल्ला इज़हार इससे पहले किसी चुनाव में देखने को नहीं मिला था, पूरे चुनाव में छुट-भय्ये नेताओं से लेकर चोटी के लीडरों तक की ज़बान पर गालियाँ थीं और दिमाग़ सातवें आसमान पर। फासीवादी सत्ता ने इस सिलसिले में न उस क़ानून की मर्यादा का लिहाज़ रखा जिस पर वो शपथ लेती है। न उस धर्म का जिसको वो सारी दुनिया के लिये आइडियल समझती है। बल्कि उसकी हरकतों से भारतीय सभ्यता और हिन्दू धर्म की तस्वीर बुरी तरह बिगड़ कर रह गई।
चुनावी नतीजों के बाद हर कोई अपने ज़ेहन और मिज़ाज और मफ़ादात (हितों) के मुताबिक़ नतीजों का विश्लेषण कर रहा है। किसी के नज़दीक ये बी जे पी की हार है मगर हिन्दुत्वा और आर एस एस की जीत है, इसलिए जीत राम के हिस्से में आए या हनुमान के, आख़िर हैं तो दोनों एक ही मज़हब के प्रतिनिधि, किसी के नज़दीक ये नक़ली राष्ट्रवाद पर असली राष्ट्रवाद की जीत है और अब मोदी जी के राष्ट्रवाद की हवा निकल चुकी है। किसी ने कहा ये नतीजे मुल्क की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत हैं जहाँ ज़ात-पात और धर्म के बजाए सिर्फ़ काम पर वोट माँगा जाएगा। किसी ने कहा कि ये चुनाव CAA, NPR और NRC के ख़िलाफ़ रेफ़्रेण्डम था और नतीजों ने साबित कर दिया है कि मुल्क को ये काले क़ानून मंज़ूर नहीं। किसी ने कहा ये नतीजे अपोज़िशन पार्टियों के लिये उम्मीद की किरण हैं। बहरहाल जितने मुँह उतनी बातें। ख़ुशी का मक़ाम है कि अरविन्द केजरीवाल को शानदार जीत पर तमाम सियासी और समाजी जमाअतों ने मुबारकबाद दी है। कांग्रेस ने इसलिये कि उसका बड़ा दुश्मन हार गया, बीजेपी ने इसलिये कि कांग्रेस खाता ही नहीं खोल सकी बल्कि इसके ज़्यादातर उम्मीदवारों की ज़मानत तक नहीं बचा सके।
मेरे नज़दीक ये चुनाव उम्मते-मुस्लिमा समेत तमाम अल्पसंख्यकों और इन्साफ़ पसन्दों के लिये उम्मीद की किरण है। इस चुनाव ने ये साबित कर दिया कि अभी वोटर्स का ज़मीर ज़िन्दा है। मुसलमानों के लिये आम आदमी पार्टी को वोट करना उनकी मजबूरी थी, ‘आप’ को न करते तो किसे करते? लेकिन ग़ैर-मुस्लिमों के सामने उनके मफ़ादात का तहफ़्फ़ुज़ करने वाली एक ऐसी पार्टी मौजूद थी जो मुल्क को घुसपैठियों से नजात दिलाने वाली थी। जिसने राम मन्दिर का अपना वादा पूरा कर दिखाया था, जिसने कश्मीरियों के संवैधानिक अधिकारों पर डाका डालकर मुस्लिम मुक्त भारत का सपना दिखाया था। इसके बावजूद ग़ैर मुस्लिम भाइयों ने बीजेपी को वोट न करके ये स्पष्ट कर दिया कि ये मुल्क चिश्ती, नानक और राम की साझा सभ्यता का केन्द्र है, यहाँ गोलियों, गालियों और नफ़रत के लिये कोई जगह नहीं है। मगर इसी के साथ बीजेपी को 38% वोट मिला है जो ये साबित करता है कि एक बड़ी तादाद केसरिया राजनीति को पसन्द करती है, यानी दिल्ली के लोगों की 38% तादाद चाहती है कि मुल्क चाहे आर्थिक तौर पर दीवालिया हो जाए, चाहे बेरोज़गारी की वजह से मुल्क का नौजवान ख़ुदकुशियाँ करे, चाहे एक बड़ी तादाद भूख और ग़रीबी का शिकार हो, मुल्क के लिये मोदी जी के काम और नज़रिये की ज़रूरत है। बीजेपी के वोटर्स को पाठ ही ऐसा पढ़ाया गया है जिसके मुताबिक़ जब मुसलमान इस मुल्क से निकाल दिये जाएँगे या इनके बुनियादी अधिकार (सरकारी नौकरी पाने, चुनाव में वोट डालने आदि) छीन लिये जाएँगे, बल्कि इनसे इनकी जायदादों से मालिकाना अधिकार भी छीन लिये जाएँगे तो सब कुछ हिन्दुओं को दे दिया जाएगा, जिसके नतीजे में बेघर हिन्दू को घर, बेरोज़गार को नौकरी और निर्धन को धन मिल जाएगा। बीजेपी को मिलनेवाले वोट हालाँकि हिन्दू आबादी का आधा है, मगर वो उसका अपना वोट बैंक है। जिसने उसको इन हालात में भी वोट किया जबकि महँगाई आसमान छू रही है, संविधान का मज़ाक़ बनाया जा रहा है, धर्म के आधार पर मुल्क में भेदभाव जारी है। इससे आप अनुमान कर सकते हैं कि इस मुल्क में फासीवाद की जड़ें कितनी मज़बूत हो चुकी हैं। शुक्र की बात ये है कि आधी हिन्दू आबादी ने उन्हें रद्द कर दिया है। मगर आधी आबादी के ये ज़िन्दा ज़मीर और साझा सभ्यता के अमीन लोग (धरोहरधारी) कब और कहाँ कमज़ोर पड़ जाएँ कुछ नहीं मालूम।
दिल्ली में केजरीवाल की जीत मैं काम का तो जो दख़ल है वो तो है ही, इसके अलावा भी बहुत-सी वजहें हैं जिनको नज़र-अन्दाज़ नहीं करना चाहिये, मसलन दूसरी सेक्युलर पार्टियों का ख़ामोश रहना और चुनाव अभियान में बराय नाम दिलचस्पी लेना, वरना जिस आक्रामक अन्दाज़ से बीजेपी ने अभियान चलाया अगर इसी तरह कांग्रेस और बसपा ने भी चलाया होता तो आप की राह ज़रूर खोटी हो जाती। सिर्फ़ काम को क्रेडिट देना और दूसरे राज्यों में इसे मॉडल बनाने की सोचना मेरा ख़याल है मुनासिब नहीं है क्योंकि काम पर वोट का अंजाम हम उत्तर प्रदेश में देख चुके हैं, अखिलेश सरकार ने कोई कम काम नहीं किया था, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुक़ाबले दिल्ली की हैसियत ही क्या है, इसके बावजूद राज्य चुनाव में SP की करारी हार हुई, उसके बाद लोकसभा चुनाव में बसपा, सपा और लोकदल का गठबन्धन हुआ, इसको भी बुरी तरह हार का मुँह देखना पड़ा। यही दिल्ली जो तीसरी बार केजरीवाल जी को सर आँखों पर बैठा रही है, लोकसभा चुनाव में ज़मानत तक ज़ब्त करवा देती है और कॉपोरेशन चुनाव में औक़ात में रखती है। इसलिये इन चुनावी नतीजों से ये समझने की ग़लती नहीं करनी चाहिये की मोदी जी के लिये झोला उठाकर चले जाने के दिन क़रीब आ गए हैं। बीजेपी एक नज़रियाती पार्टी है। अमित शाह जी का बयान आ ही चुका है कि हम सिर्फ़ जीतने के लिये ही चुनाव नहीं लड़ते बल्कि अपने नज़रिये की इशाअत और तब्लीग़ के लिये भी मैदान में उतरते हैं। जिसमें वो दिल्ली में हारकर भी कामयाब हैं।
इन चुनावों के नतीजों की रौशनी में मिल्ली और समाजी जमाअतों को मुल्क की सालिमियत और संविधान की रक्षा के लिये शॉर्ट टर्म प्लान बनाना चाहिये, नई सरकार के बन जाने के बाद मुस्लिम प्रतिनिधियों की बतौर ख़ास ज़िम्मेदारी है कि वो अपने-अपने विधान सभा क्षेत्रों की ज़रूरतों की लिस्ट बनाएँ और उनको पूरा करने का टाइम टेबल तय करें। दूसरे राज्यों में ग़ैर फासीवादी राजनितिक पार्टियों को Common minimum programme की बुनियाद पर इख़्लास के साथ गठबन्धन करना चाहिये। मुल्क की जनता को फासीवाद के नुक़सानात से आगाह करने की मंसूबा बन्दी हमारे दीनी, मिल्ली, समाजी और सियासी लीडरशिप को करनी चाहिये। बीजेपी की सहयोगी पार्टियाँ जो सिर्फ़ सियासी फ़ायदों के लिये उसके साथ हैं इन्हें इससे अलग किया जाना चाहिये। ये काम कोई मुश्किल नहीं। महाराष्ट्र में तो नज़रियाती तौर पर बीजेपी से एकरूपता के बावजूद शिव सेना ने साथ छोड़ दिया। तो बिहार में इमारते-शरिया के इजलास में रूमाल और टोपी लगाकर जानेवाले नितीश क्यों नहीं अलग हो सकते।पंजाब में अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल ने CAA, NPR और NRC का पुरज़ोर विरोध किया है और सांप्रदायिक ताक़तों से अलग जाने का इशारा किया है।
इसी के साथ मिल्लत को अपनी अन्दरूनी कमज़ोरियों को दूर करना चाहिये। अगर मुसलमानों ने अपने हालात में कोई तब्दीली न की जैसा कि अभी तक देखा जा रहा है तो फिर दिल्ली की जीत को हार में बदलते देर नहीं लगेगी। हमारे इज्तिमाई हालात का सुधार हमारे व्यक्तिगत हालात के सुधार पर डिपेंड करता है। क्या ये सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम नहीं है कि जो लोग परसों तक बादशाह थे और कल तक बादशाह बनानेवाले थे उनको आज शाह के तामाशा देखनेवालों में भी जगह मिलने को तैयार नहीं। दिल्ली के पूरे चुनाव में मुसलमानों की भलाई के लिये किसी ने मुँह नहीं खोला, किसी पैकेज का ऐलान नहीं हुआ, एक ज़माना था जब मुसलमानों का वोट लेने के लिये तमाम सेक्युलर पार्टियाँ अपने मेनिफ़ेस्टो में ऐलान करतीं, जामा मस्जिद के इमाम साहब से मुलाक़ातें करतीं, आज वो वक़्त आ गया है कि मुसलमानों का नाम लेने से इसलिये बचा जा रहा है कि हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण हो जाएगा। ये सोचने का मक़ाम है।

फ़तह व शिकस्त उनको मिली खेल में जो थे।
हम तो तमाशबीन थे सो हमको क्या मिला।।

0 comments

Leave a Reply