तबलीग़ी जमाअत के वाक़ये में मीडिया के किरदार के बाद भी क्या मुसलमान अपने मीडिया हाउस की ज़रूरत से इनकार कर सकते हैं?
कलीमुल हफ़ीज़
कोरोना की आलमी तबाही का सिलसिला जारी है। हमारे देश में काफ़ी हद तक कण्ट्रोल करने की कोशिश की जा रही है। दुनिया के कई देशों में कमी भी आई है। इटली और अमरीका में भी मरनेवालों का सिलसिला जारी है। ये बहुत चिंताजनक है। लेकिन हमारा प्यारा वतन इस दौरान एक नई वबा नफ़रत के वायरस से दोचार हुआ है। नफ़रत का वायरस, कोरोना से भी तेज़ फैल रहा है। कोरोना से कुछ इन्सानों की मौत और कुछ टकों का नुक़सान है। जबकि नफ़रत के वायरस से इन्सानियत को ख़तरा है। नफ़रत का ये वायरस मीडिया के ज़रिए फैल रहा है।
तबलीग़ी जमाअत के मरकज़ निज़ामुद्दीन की घटना के बाद मीडिया ने जिस ज़बान का इस्तेमाल किया है, टीवी चैनलों पर जो डिबेट हुई हैं, सोशल मीडिया पर जिस तरह की पोस्ट डाली गई हैं, जनता में शरीफ़ और नेक समझे जानेवाले नेताओं से लेकर खिलाड़ियों तक की ज़बान और पोस्ट नफ़रत के शोले उगल रही हैं। यहाँ तक कि WHO को कहना पड़ा कि कोरोना के मरीज़ों के मामले में मज़हबी भेदभाव न किया जाए।
देश की मशहूर महिला पहलवान बबिता फोगाट का एक tweet देखिये और अन्दाज़ा लगाइये कि जब एक महिला खिलाड़ी की ये भावनाएँ हैं तो बाक़ी का क्या हाल होगा। वो अपने एक tweet में लिखती हैं "फैला होगा चमगादड़ से तुम्हारे वहाँ, हिन्दुस्तान में तो जाहिल सूअरों से फैल रहा है, निज़ामुद्दीन इडियट्स" ज़ाहिर है इस तरह की पोस्टों के बाद देश में भाईचारे के जनाज़े का निकल जाना यक़ीनी है। मुसलमानों से नफ़रत चोटी पर है। दाढ़ी-टोपी वाले को देख कर वतनी भाइयों का ख़ून खौल रहा है। इसी का नतीजा है कि कई जगहों पर मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ हुई हैं।
कितनी ही बस्तियों और कॉलोनियों में मुसलमानों के दाख़िले पर पाबन्दी लगा दी गई है। कई जगहों पर मुसलमान फेरीवालों को धक्के देकर निकाल दिया गया है। मुसलमानों से सामान ख़रीदने से मना किया जा रहा है। आप अन्दाज़ा कर सकते हैं कि जब लॉक डाउन खुलेगा तो नफ़रत के क्या नतीजे निकलेंगे। स्कूलों में मुसलमान बच्चों को तंग किया जाएगा, बसों और ट्रेनों से मुसलमानों को उतार दिया जाएगा, जिसके नतीजे में झगड़ा होगा, फ़साद होगा, मुसलमानों की जान-माल का बड़े पैमाने पर नुक़सान होगा। इस नफ़रत से मुसलमानों में इन्तिक़ाम का जज़्बा पैदा होगा। पहले से ही बेरोज़गार, परेशान हाल मुस्लिम नौजवान किसी के हाथ का खिलौना बनकर मुल्क और मिल्लत के लिये नुक़सान का कारण बन सकते हैं।
अब सवाल ये है कि इसका हल क्या है। क्या सरकार के नोटिस में ये ट्वीट्स और ये पोस्ट्स नहीं हैं, क्या मीडिया के ज़रिए फैलाए जानेवाले नफ़रत के ज़हर से सरकार के ज़िम्मेदार अन्जान हैं? क्या सरकार नहीं चाहती कि देश में हिन्दुओं और मुसलमानों में नफ़रत पैदा हो?
अगर उसके इल्म में नहीं है और वो चाहती भी नहीं तो फिर दिल्ली चुनावों में जो भाषा बोली गई, वो क्या थी? संयोग, प्रयोग, गोली मारने और करंट लगाने के शब्द किसके हैं? इस भाषा के बोलनेवालों से ये उम्मीद किस तरह की जा सकती है कि वो मुसलमानों के तरक़्क़ी करने और आगे बढ़ने के लिये कोई प्लानिंग करेंगे?
क्या इसका हल ये है कि हम क़ौम से मीडिया के बॉयकॉट की अपील करें। अख़बार न पढ़ने दें। पत्रकारिता की तालीम को ग़लत जानें। टीवी चैनल पर ख़बरें न सुनें? क्या रेत में गर्दन छिपाने से शुतुरमुर्ग़ की जान बच सकती है? यही आज तक हम करते आए हैं।
हमने दुनियावी तालीम की मुख़ालिफ़त की, क़ौम के नौजवानों को न वकील बनने दिया, न डॉक्टर, न इंजीनियर बनने दिया, जब भी तालीम की बात आई,दीन का हवाला देकर जदीद तालीम (Modern education) के दरवाज़े ख़ुद पर बन्द कर लिये। इसी तरह सियासत में हिस्सा लेने को गुनाह तसव्वुर किया गया और सारा इक़्तिदार शैतान के हवाले कर दिया गया। जिसका नतीजा आज हमारे सामने है।
ग़ौर करने और विचार करने का मक़ाम ये भी है कि क्या ये मिल्लत इस क़द्र बाँझ हो गई है कि उर्दू, हिन्दी और इंग्लिश में राष्ट्रीय स्तर पर कोई अख़बार नहीं निकाल सकती, क्या वाक़ई टीवी चैनल या इलोक्ट्रॉनिक मीडिया का क़ियाम कोई असम्भव कामों में से है?
लेकिन माफ़ कीजिये, फ़िरक़ों और मसलकों में बँटी हुई मिल्लत के लिये ये सब कुछ असम्भव कामों में से ही है। पिछले ढाई-तीन सौ साल से हम आपस में लड़ते रहे, कभी ज़ात-ब्रादरियों के नाम पर कभी फ़िक़ह और मसलक के नाम पर, हममें से जब किसी पर वक़्त की सत्ता ने ज़ुल्म किया तो हम ख़ामोश रहे क्योंकि वो हमारी जमाअत और मसलक का नहीं था। आज सबके सब मज़लूम हैं। इस वक़्त तमाम मुसलमान निशाने पर हैं।
ये वक़्त सोचने का नहीं, करने का है, हमारी बदक़िस्मती ये भी है कि हम कहते ही कहते हैं, बड़ी-बड़ी कॉन्फ़्रेंसें, दसियों लाख का इज्तिमा, हज़ारों उन्वानों पर लिट्रेचर, यही हमारा कुल सरमाया है, या ज़्यादा से ज़्यादा मोहल्ले की मस्जिद और ब्रादरी के मदरसे की तामीर, यही हमारे कारनामे हैं। ये बात याद रखिये कि पूरा देश वही ज़बान बोलता है जो मीडिया बोलता है।
इस वक़्त आपके पास ज़बान नहीं है इसलिये कोई आपकी बात को सुनने और समझनेवाला नहीं है, वो जो चाहें आपके बारे में देश और दुनिया को बताएँ, आप उसकी तरदीद भी करते हैं तो वो छपता नहीं है, आप ज़्यादा से ज़्यादा FIR कर सकते हैं, अदालत जा सकते हैं, जिसका नतीजा भी आप आज़ादी के बाद से अब तक देख रहे हैं और अभी हाल ही में तलाक़ और बाबरी मस्जिद के मामले में अदालत का रवैया आपके सामने है।
मेरे अज़ीज़ दोस्तों, बहुत देर हो चुकी है, बहुत नुक़सान हो चुका है, हिन्दुस्तानी मुसलमान वेंटीलेटर पर है। क्या अब भी वक़्त नहीं आया है कि हम ग़लतियों से सबक़ हासिल करें। हर ज़माने में जदीद वसायल (Resources) का इस्तेमाल करके ही हालात का मुक़ाबला किया जा सकता है, बल्कि रुख़ मोड़ा जा सकता है। मैं समझता हूँ कि मीडिया की इस नफ़रत भरी मुहिम का जवाब मीडिया के ज़रिए ही दिया जा सकता है। हमें एक बैनल-अक़वामी (International) सतह पर मीडिया की ज़रूरत है, जो आलमी ज़बानों में अपनी ख़िदमात पेश करे।
मीडिया को क़ायम करना कोई मुश्किल काम नहीं है, इसलिये कि हमारे पास अच्छे रिपोर्टर भी हैं, इंटेलिजेंट और ज़हीन एडिटर भी हैं, फ़ोटोग्राफ़र भी हैं, कहानीकार भी हैं, विडिओ मेकर भी हैं, डिज़ाइनर और एंकर भी हैं, इश्तिहार देनेवाली कम्पनियाँ, फ़ैक्टरियाँ और कारख़ाने भी हैं, किताबत से लेकर कम्पोज़िंग करनेवाले और प्रिंटिंग से लेकर लोगों तक पहुँचानेवाले भी हैं।
ये तमाम हुनरमन्द और बासलाहियत लोग या तो अलग-अलग अख़बारात व चैनल में अपनी सलाहियत लगा रहे हैं या अपनी बिसात भर निजी चैनल, वैब पोर्टल चला रहे हैं। समाज में ऐसे सरमायाकार (Investors) भी हैं जो सरमायाकारी (Investment) कर सकते हैं, बस ज़रूरत है ऐसे मुख़लिस लोगों की जो ज़ाती ग़रज़ (हितों) से ऊपर उठकर क़दम उठा सकें।
मीडिया की ज़रूरत पर सेमीनार होते रहे हैं, इस ज़रूरत का इज़हार पिछले 20 साल से हो रहा है। इंटरनेशनल सतह पर भी मज़बूत और आज़ाद मीडिया पर सिर्फ़ बातचीत होती रही है। अब बातचीत और सेमिनार से आगे बढ़कर अमली मैदान में क़दम रखना चाहिये। ये काम अकेले किसी के बस का नहीं है। मिल्ली तंज़ीमों के ज़िम्मेदार या उनके नुमाइन्दों पर *ब्रॉडकास्टिंग बोर्ड* बनाया जाए।
इस मैदान में जो लोग काम कर रहे हैं उनपर बेस्ड एक एडवाइज़री कौंसिल बनाई जाए, इस मैदान के माहिर जो दूसरों के यहाँ रह कर मजबूरी की हालत में ज़मीर के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं, उनकी ख़िदमात मुआवज़े पर, बल्कि माक़ूल मुआवज़े पर हासिल की जाएँ। मिल्ली और मज़हबी जमाअतों की हिस्सेदारी और ज़िम्मेदारी तय की जाए, वो आलिम जो जदीद उलूम (Modern education) के भी आलिम हों और मॉडर्न रेसोर्सेज़ का इस्तेमाल भी जानते हों उनपर बेस्ड एक *मजलिसे-सरपरस्त* बनाई जाए जो ब्रॉडकास्टिंग बोर्ड के लिये रहनुमा उसूल बनाए।
एक मीडिया मॉनिटरिंग कमेटी भी बना दी जाए, जो मीडिया की गुमराह करनेवाली ख़बरों और नफ़रत पर बेस्ड बयानों और ग़लतफ़हमियाँ पैदा करनेवाले और समाज को बाँटने वाले मज़ामीन पर नज़र रखे, और ज़रूरी कार्रवाई करे। मैं समझता हूँ कि देश के सरमायाकार, दीनी, मिल्ली, समाजी इदारे और तंज़ीमें मेरी गुज़ारिशों पर तवज्जोह फ़रमाएंगी मैं जिस लायक़ हूँ, हाज़िर हूँ। मुझे जब भी आवाज़ दी जाएगी मैं एक ख़ादिम की हैसियत से हाज़िर रहूँगा।
मरहूम अकबर इलाहाबादी ने सौ साल पहले मीडिया की ज़रूरत और अहमियत का इज़हार इन अल्फ़ाज़ में किया था:
खींचो न कमानों को न तलवार निकालो।
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो॥

Dr. Qasim Adil
It's really a very serious issue...our community leaders should pay positive and immediate attention to this..