किसानों के हित में नहीं है कृषि बिल, संशोधन ही है इसका हल

2019 में सरकार ने कृषि बिल पारित किया जिसका किसान लगातार विरोध कर रहे हैं।

गजनफर इकबाल

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि फसल और अनाज का बाज़ारीकरण काफ़ी तेज़ी से हुआ है। इसके बावजूद किसानों को फायदा होने के बजाय नुकसान ही हुआ है। बैंक, बाजार, भूस्वामी और पूंजीपति इन सभी के दबाव में ही किसान अपनी जिंदगी गुजारते हैं।

सच्चाई यह है कि उपज ज्यादा होगी तो बाज़ार में कीमत कम मिलेगी। यदि उपज कम होगी तो भी नुकसान होगा। कुल मिलाकर खेती की प्रकिया से लेकर बाजारीकरण तक कहीं भी किसानों का हित नही दिखता, वरना आत्महत्या के मामलों में जरूर कमी आई होती।

बहरहाल, 2019 में सरकार ने कृषि बिल पारित किया जिसका किसान लगातार विरोध कर रहे हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुने हुए सरकार का यह दायित्व बनता है कि किसी देशव्यापी विवाद का समाधान बातचीत से सुलझाने का प्रयत्न किया जाये ताकि इसकी त्रुटियों में सुधार कर इसके मूल उद्देश्य को जनता के बीच पहुंचाया जा सके। चुंकि कृषि कानून सदन से पारित एक राष्ट्रीय कानून है इसलिए इसको देशभर में लागू करने के लिये राज्यों की सहमति के साथ-साथ इसमें आम नागरिकों की भी मंजूरी होनी चाहिए।

आज देश के बहुत से शहरों में इसका विरोध हुआ। कई जगहों पर उपद्रव इस कदर हो रहा है कि निजी और सरकारी सम्पति का भी नुकसान हो रहा है। पुलिस-पब्लिक में मार-पीट भी हो रही है जोकि देश को नुकसान पहुंचा रहा है।

जिस तरह से चुनी हुइ सरकारों को कानून बनाने का अधिकार है उसी प्रकार जनता को भी सरकार की किसी नीति के विरोध में शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार है। टकराव की स्थिति में बातचीत को ही सबसे पहला माध्यम बनाना चाहिए। जनता के साथ भी और विपक्षी पार्टियों के साथ भी बातचीत की वयवस्था करनी चाहिए। उचित और संतुलित संवाद जटिल से जटिल मसलों को सुलझाने की क्षमता रखता है। अहंकार किसी भी तरह उचित नहीं है। यह सिवाय टकराव पैदा करने के और कुछ नहीं करेगा।

किसी कानून की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि यह किस प्रकार देशहित में है और इसकी उपयोगिता के साथ-साथ कितना प्रायोगिक है। साथ ही भविष्य में इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं।

किसानों का पहला और मुख्य मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर है जिसकी वह गारंटी चाहते हैं। मतलब यह कि सरकार जो न्यूनतम बाजार मूल्य तय करे उससे कम में मंडी, कॉर्पोरेशन या बाजार समिति नहीं खरीद सके और ऐसा करने पर सजा का प्रावधान हो।

बाकी के दो कानूनों में थोड़ी बहुत संशोधन के साथ लागू किया जा सकता है।

दूसरा मुख्य मुद्दा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का है। इसमें भी अगर फसल के पैदावार के हिसाब से कीमत मिले तो भी किसान तैयार हो सकते हैं। लेकिन महज जमीन के रकबा के हिसाब से पूर्व में ही निर्धारित कीमत मिलेगी तो किसानों के लिये घाटे का सौदा है और वह कभी तैयार नही होंगे। तीसरा मुख्य मुद्दा भंडारण को लेकर है। इसमें भी यदि बेचे हुए अनाज का भंडारण कर मंडी वाले ऊंची कीमत पर बेचते हैं तो इसका ज्यादा नुकसान किसानों के बजाय आम जनता को होगा क्योंकि किसानों के पास भंडारण की सुविधा नही हैं।

इसलिए, किसानों का मुख्य मुद्दा न्युनतम समर्थन मूल्य ही है। जो किसान खुद खेती करते हैं और बाजारों में मोल-जोल कर बेचते हैं उन्हें ज्यादा नुकसान हो सकता हैं क्योंकि वह स्थानीय बाजारों की मोनोपोली का शिकार हो जायेंगे और न्यूनतम समर्थन मूल्य की बाध्यता नहीं रहने पर मजबूरन औने-पौने दामों पर बेच देंगे।

दूसरी अहम बात जो इस बिल का हिस्सा नहीं है वो यह कि सरकार किसान कार्ड धारक या पेशेवर किसानों के लिये पेंशन योजना बनाए न कि उन किसानों के लिये जो खेती करवाते हैं या बटाईदारी करवाते हैं।

सरकार को चाहिए के इस कानून की समीक्षा करे और किसानों के हित में बिल में संशोधन करे।

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