क्या रामविलास पासवान के निधन के बाद अब बिहार की दलित राजनीति बदल जाएगी , कौन होगा दलितों का नया नेता?

 

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के बाद बिहार में दलित राजनीति बदल गई है। बिहार में दलितों का नया नेता कौन होगा, इसके लिए चुनाव परिणाम तक इंतजार करना होगा। क्योंकि, इस बार दलित मतदाता चुनाव के केंद्र में हैं। पचास साल बाद यह पहला चुनाव है, जिसमें दलित राजनीति का बड़ा चेहरा नहीं होगा।

लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान अकेले चुनाव मैदान में उतर चुके हैं। उनकी नजर दलित वोटों पर है। राजनीति में उनका मुकाबला करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी अशोक चौधरी और जीतनराम मांझी को आगे किया है। महागठबंधन की नजर भी 16 फीसदी दलित वोटों पर है। लिहाजा, परिणाम के बाद यह तय होगा कि दलितों का अगला नेता कौन है।

चुनाव के बीच रामविलास पासवान के निधन से चिराग की चुनौतियां बढ़ी हैं। यह सही है कि लोजपा को कुछ सहानुभूति वोट मिल सकता है, पर चिराग के सामने लक्ष्य खुद को दलित नेता के तौर पर स्थापित करना है। इसके लिए उन्हें पासवान के साथ रविदास और मुसहरों का भी समर्थन जुटाना होगा। क्योंकि, दलितों में 70 फीसदी से अधिक यह तीनों जातियां हैं।

पिछले दो विधानसभा चुनाव में लोजपा को दो -तीन सीट मिलती रही है। वर्ष 2010 में पार्टी को तीन सीट के साथ करीब सात फीसदी वोट मिला था। जबकि 2015 में दो सीट और पांच फीसदी वोट मिला था। जबकि लोकसभा में भाजपा और जेडीयू के साथ चुनाव लड़कर लोजपा आठ फीसदी वोट और छह सीट जीतने में सफल रही थी। ऐसे में चिराग की राह आसान नहीं है।

लोजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि बिहार में करीब डेढ़ दर्जन सीट पर पासवान मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। इसके साथ लगभग 50 सीट पर भी पासवान मतदाता हैं। ऐसे में लोजपा पासवान के साथ भाजपा समर्थक वोट जुटाने में सफल रहती है, तो जीत के दहलीज तक पहुंच सकते हैं। पार्टी इसी रणनीति के तहत विधानसभा चुनाव लड़ रही है।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि रामविलास पासवान का कद बहुत बड़ा था। इसके साथ वह परिवार के सभी सदस्यों को साथ लेकर चलते थे। कार्यकर्ताओं की भी उन तक सीधी पहुंच थी। ऐसे में चिराग के लिए पासवान समुदाय को एकजुट रखते हुए परिवार को भी साथ लेकर चलना होगा। क्योंकि, कई नेता मानते हैं कि उन्हें परिवार के अंदर भी चुनौती मिल सकती है।

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