हम से कहाँ चूक हो रही है : एक परिवार को अपने घर की दीवार पर Help Us का पोस्टर लगाना पड़ा
हम ने यह कैसे मान लिया कि जो शक्ल से मुफलिस है या जिसका टूटा फूटा घर है सिर्फ वो ही ज़रूरतमंद है ?
नई दिल्ली : ( एशिया टाइम्स ) लॉक डाउन का ऐलान होने के बाद बहुत लोग और संगठन ज़रूरतमंदो की मदद के लिए आगे आये । मदद करने वालों की मंशा पर कोई शक नहीं है लेकिन को ऑर्डिनेशन की कमी और बिना सोचे समझे बस किसी को भी मदद पहुंचाने के चक्कर में असल मक़सद को नुकसान हो रहा है ,जिसके नतीजे में एक परिवार को अपने घर की दीवार पर Help Us का पोस्टर लगाना पड़ा , एक लम्हे के लिए यहां ठहरें और सोचें कि हम से कहाँ चूक हो रही है।
रज़ी अहमद ने एशिया टाइम्स को बताया कि दिल्ली के जामिया नगर में लॉक डाउन के पहले मरहले में हमें कुछ संगठनों के वालंटियर मिले और कहा कि ज़रूरतमंदों को हमें रेफेर करें हम उन्हें राशन पहुंचाएंगे , हम ने कुछ नाम उनको भेजा और उन्हों ने उनकी मदद की , उन्ही को जब लॉक डाउन के दूसरे मरहले में कुछ नाम भेजा गया तो उन्हों ने हमें बताया कि अब हमरे पास मदद की फंडिंग में कमी आई है लेकिन ज़रुरत मंदों की तादाद में काफी इज़ाफ़ा हुआ है अब हमारे पास मध्यवर्गीय परिवारों के नाम आरहे हैं। हम कोशिश करेंगे।
हम ने यह कैसे मान लिया कि जो शक्ल से मुफलिस है या जिसका टूटा फूटा घर है सिर्फ वो ही ज़रूरतमंद है ?
जी हाँ लॉक डाउन के पहले दस दिन में हाल ये था कि लोग अंधी दौड़ लगा रहे थे। जो लोग इस तरह के काम करते रहे हैं उनसे कोई सलाह लेने या उनका तरीक़ा पूछने की ज़हमत किसी ने नहीं की मदद करने वालों में कुछ बहुत ही ईमानदार लेकिन नौसिखिए थे तो कुछ का अपना एजेंडा था लेकिन इनके पास रोड मैप नहीं था। बस ये मान लिया गया कि जो शक्ल से मुफलिस है या जिसका टूटा फूटा घर है वो ही ज़रूरतमंद है।
आपस में को ऑर्डिनेशन रखें
नतीजा ये हुआ कि कुछ घरों में दर्जन भर लोग मदद के साथ पहुंच गए। यहां इन लोगों ने भी मना करने की ज़हमत नहीं उठाई और जो मिलता गया समेटे गए। नौसिखिया लोगों के समाजसेवी बनने की अंधी होड़ में बाज़ार में ज़रूरी चीज़ों की कमी हुई अलग। मांग बढ़ने से दाम बढ़े और जिन लोगों का हाथ तंग था उनकी मुश्किल दोगुना हो गई। ये भी हुआ कि शुरू में तो भरमार हो गई मदद की और दूसरे तीसरे दौर के लॉक डाउन तक अब ना देने को कुछ बचा है और न अब हिम्मत बाक़ी है.
निजी तौर पर जानने वालों से पूछते रहें कि कोई परेशानी तो नहीं
इस दौरान ऐसे भी लोग थे जो हुलया सही बनाकर रखते हैं लेकिन तंगी में थे। उनसे किसी ने पूछा नहीं और उन्होंने किसी से मांगा नहीं। बहरहाल तब का पता नहीं, लेकिन अब लोगों की मुश्किलें पहले से ज़्यादा बढ़ी है। जिनके पास काम नहीं है, पैसे नहीं हैं और उनको हाथ फैलाने के आदत नहीं है, वो सच में मुसीबत में हैं। इस सबका इलाज ये है कि निजी तौर पर जानने वालों से पूछते रहें कि कोई परेशानी तो नहीं। कुछ लोगों के चेहरे पढ़कर मुसीबत पता लग जाती है। कुछ के हालात का अंदाज़ा हो जाता है। इन लोगों की पहचान करके जो बन सके करें । किसी मुहल्ले में अगर दो चार लोग ऐसे काम में लगे हैं तो आपस में को ऑर्डिनेशन रखें। दूसरे मुहल्ले में जाएं तो वहां पहले से काम कर रहे लोगों से संपर्क करें ध्यान रखो कि ये ग़लती दोबारा से न हो। बाक़ी आपने जिस भी नीयत से लोगों की मदद की है उसका अज्र आपको मिले।
मदद करने का एक अंदाज़ यह भी हो सकता है
एक आखिरी बात। मदद करने का एक अंदाज़ यह भी हो सकता है. मध्यमवर्ग के जरूरत मंदों के सम्मान का पूरा ख्याल रखते हुए आप अपने मोहल्ले में बिलकुल मुफ्त नहीं बल्कि स्पेशल ऑफ़र वाली राशन की दूकान खोलें जहां हर प्रकार की सब्जी 15 रूपए किलो, मसाला फ़्री, आटा- चावल-दाल 25 रूपए किलो हो। न जाने कितने मध्यमवर्ग के लोग अपनी आंखों में ज़रूरत का प्याला लिए फ़्री राशन की लाइन को देखते हैं पर अपने आत्मसम्मान के कारण करीब नहीं आते वह यहां से सामान हासिल कर लेंगे और उनके आत्मसम्मान को ठेस भी नहीं पहुंचेगी। मदद किजिए पर किसी के आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचाइए । ज़रूरतमंद सफ़ेद पोशों का ख़्याल रखिए इज़्ज़तदार मजबूरों का आदर किजिए। और याद रहे आप का कि ईश्वर आप पर गहरी नजर रखता है।

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