SIR की प्रक्रिया से लेकर सॉफ्टवेयर तक उठाई जवाबदेही की मांग
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रशांत भूषण, अंजलि भारद्वाज और नेहा बोरा ने भी रखे सवाल; चुनाव आयोग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस तेज
नई दिल्ली : एशिया टाइम्स l चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर चुनाव आयोग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव और पश्चिम बंगाल में सामने आए कथित अनियमितताओं के मामलों को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता एवं चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने चुनाव आयोग के सामने सात अहम सवाल रखे हैं।
शुक्रवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में योगेंद्र यादव ने चुनाव आयोग की ओर से दाखिल हलफनामे के विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि SIR की प्रक्रिया में कई ऐसे बिंदु हैं जिन पर आयोग को स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब देना चाहिए।
इस प्रेस वार्ता में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और नेहा बोरा भी शामिल हुईं। वक्ताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक अधिकारों के इस्तेमाल और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
योगेंद्र यादव के चुनाव आयोग से सात सीधे सवाल
योगेंद्र यादव ने SIR और मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के सामने सात सवाल रखे। ये सवाल केवल तकनीकी प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि चुनावी व्यवस्था में संस्थागत जवाबदेही और पारदर्शिता से भी जुड़े हैं।
1. SIR का फैसला किसने लिया?
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराने का निर्णय आखिर किस स्तर पर लिया गया? इसके पीछे निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या थी और इसका आधिकारिक आधार क्या है?
2. फॉर्म-6 में चुनाव आयोग ने बदलाव कैसे किया?
नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में आयोग ने क्या बदलाव किए और इन बदलावों के पीछे क्या तर्क था?
3. ERO के अधिकार दिल्ली के IT डिविजन को क्यों सौंपे गए?
इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) के अधिकारों और निर्णय प्रक्रिया में दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के IT डिविजन की भूमिका क्यों और किस आधार पर बढ़ाई गई? क्या इससे स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के अधिकार प्रभावित होते हैं?
4. पश्चिम बंगाल में 16 लाख मामले किसने और किस आधार पर दर्ज किए?
पश्चिम बंगाल में सामने आए 16 लाख मामलों को किसने दर्ज कराया? इन मामलों का आधार क्या था और इनके पीछे इस्तेमाल की गई प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?
5. ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ का सॉफ्टवेयर सार्वजनिक क्यों नहीं है?
मतदाता सूची की जांच में इस्तेमाल किए जा रहे ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ सॉफ्टवेयर और उसकी कार्यप्रणाली को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? नागरिकों और राजनीतिक दलों को यह जानने का अधिकार क्यों न हो कि इस तकनीकी प्रक्रिया के तहत मतदाताओं की जांच कैसे की जा रही है?
6. क्या फॉर्म-7 बल्क में दाखिल किया जा सकता है?
किसी मतदाता का नाम हटाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-7 को क्या एक साथ बड़ी संख्या में दाखिल किया जा सकता है? यदि हां, तो ऐसे मामलों की जांच और सत्यापन की व्यवस्था क्या है?
7. SIR की फाइनल लिस्ट के बाद भी फॉर्म-8 क्यों भरे जा रहे हैं?
जब SIR की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हो चुकी है, तो उसके बाद भी फॉर्म-8 क्यों और किस प्रक्रिया के तहत स्वीकार किए जा रहे हैं? क्या इसके लिए कोई स्पष्ट नियम और समय-सीमा निर्धारित है?
तकनीक के पीछे छिपी प्रक्रिया पर सवाल
इस पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक महत्वपूर्ण पहलू चुनावी प्रक्रिया में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल और उसकी जवाबदेही का मुद्दा रहा। विशेष रूप से ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ जैसे तकनीकी मानकों और सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली सार्वजनिक नहीं होने का सवाल उठाया गया।
वक्ताओं के सवालों का मूल आधार यह है कि जब किसी तकनीकी प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची में नामों की जांच, वर्गीकरण या संभावित गड़बड़ियों की पहचान की जाती है, तो उसकी कार्यप्रणाली भी पारदर्शी होनी चाहिए। आखिर मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियादी दस्तावेज है और इसमें किसी भी तरह के बदलाव का सीधा असर नागरिकों के मतदान के अधिकार पर पड़ सकता है।
चुनाव आयोग की जवाबदेही का सवाल
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हुई इस प्रेस वार्ता ने SIR को केवल मतदाता सूची के प्रशासनिक पुनरीक्षण का मामला न मानकर लोकतांत्रिक पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के बड़े सवाल के रूप में सामने रखा है।
योगेंद्र यादव द्वारा उठाए गए सात सवालों का केंद्र यह है कि चुनाव आयोग अपने निर्णयों, तकनीकी प्रक्रियाओं और प्रशासनिक अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर कितनी जानकारी सार्वजनिक करता है।
हालांकि, इन सवालों के जवाब में चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष और संबंधित प्रक्रियाओं का विस्तृत स्पष्टीकरण सामने आना अभी महत्वपूर्ण है। यह भी जरूरी है कि लगाए गए सवालों और आशंकाओं की जांच आधिकारिक दस्तावेजों तथा तथ्यों के आधार पर हो।
बड़ा सवाल यह है कि जिस संस्था पर देश के लोकतंत्र और चुनावी निष्पक्षता की जिम्मेदारी है, उसकी प्रक्रियाएं आम नागरिकों की निगरानी और समझ के लिए कितनी खुली हैं?
SIR पर उठे ये सात सवाल अब चुनाव आयोग के सामने पारदर्शिता और जवाबदेही की एक बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।
