क्या भारत की अर्थव्यवस्था मुस्लिम देशों में काम कर रहे भारतीयों द्वारा भेजी गई विदेशी मुद्रा से चल रही?

लखनऊ | क्या भारत की अर्थव्यवस्था मुस्लिम देशों में काम करने वाले भारतीयों, कामगारों से चल रही है? यह एक ऐसा बड़ा सवाल है और हो सकता है कि आप इससे सहमत भी न हों। जबकि हकीकत में सच्चाई यही है।

भारत में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने, मुस्लिम समुदाय के लोगों को टारगेट करके उनका उत्पीड़न करने, हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच नफरत फैलाने, धर्म संसद के जरिए मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच देने और हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच नफरत का माहौल बनाकर हिन्दू ध्रुवीकरण करने तथा उसके ज़रिए सत्ता हासिल करने का काम भारतीय जनता पार्टी ने अब तक बखूबी किया है। इन कामों से भाजपा ने सत्ता ज़रूर हासिल कर ली है।

हालांकि, देश की व्यवस्था को चलाने के लिए धन की ज़रूरत होती है और बिना पैसे के अर्थव्यवस्था नहीं चलाई जा सकती है। यही वजह है कि अब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके रणनीतिकार सलाहकारों को यह अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने से कुछ नहीं हासिल होने वाला है बल्कि देश संकट में घिर सकता है और देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो सकती है। इसी सबको ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी नीतियों में बदलाव कर रहे हैं और इसका असर बहुत जल्द देखने को मिल सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकारों ने जब साल 2000 से लेकर 2021 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया, तो उनकी आंखें खुली रह गईं। खाड़ी देशों में सऊदी अरब, यूएई, ओमान और कतर में काम करने वाले भारतीयों, कामगारों में केवल 70-80 लाख मुसलमान हैं। इनके अलावा हिंदू भी काफी तादाद में यहां पर काम करते हैं। यहां पर काम करने वाले यह सभी भारतीय भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजते हैं। इनके द्वारा भारत को विदेशी मुद्रा भेजने से सीधे-सीधे भारत की अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलती है और यह भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बड़ा योगदान करते हैं।

खाड़ी देशों में काम करने वालों के इस बड़े योगदान को हम आपको एक आकंड़े के ज़रिए समझाते हैं। साल 2000 में मुस्लिम देशों में काम करने वाले कामगारों ने भारत को 12.07, 2005 में 24.55, 2010 में 55.06, 2015 में 66.30 और 2021 में 87.00 बिलियन विदेशी मुद्रा भेजा और भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा योगदान दिया। यह रकम लगभग 6-7 लाख करोड़ रुपए है और यह रकम बढ़ भी सकती है।

इस बड़ी रकम के आंकड़े की जानकारी प्राप्त होने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकार अवाक रह गए। किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि मुस्लिम देशों में काम करने वाले भारतीयों से देश को इतनी बड़ी विदेशी मुद्रा मिल रही है। इतनी बड़ी विदेशी मुद्रा का ही कमाल है कि भारत की अर्थव्यवस्था का ढांचा अभी चरमराया नहीं है, जबकि विश्व के अधिकांश देशों को आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और उनकी अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है।

मुस्लिम देशों से आने वाली यह विदेशी मुद्रा भारतीय अर्थव्यवस्था को संभालने में बड़ी भूमिका निभा रही है। यही कारण है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम देशों के शासकों को किसी भी तरह से नाराज़ नहीं करना चाहते। क्योंकि मुस्लिम देशों के शासकों के नाराज़ होने पर भारत की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लग सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम देशों के शासकों को खुश करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते हैं और वह उनसे मुलाकात कर संबंधों को मज़बूत बनाने का काम करते हैं।

इसका सबसे बड़ा सबूत अभी कुछ समय पूर्व विदेश यात्रा से लौटते वक्त नरेंद्र मोदी का अचानक यूएई में रुकना और वहां के शासक से मुलाकात करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में मुसलमानों के उत्पीड़न पर भले ही नहीं बोलते हैं, लेकिन मुस्लिम देशों में जाकर और वहां के शासकों से मिलकर यह संदेश देने का काम ज़रूर करते हैं कि मोदी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम समुदाय के सबसे बड़े हितैषी हैं।

नरेंद्र मोदी यह सब इसलिए करते हैं, क्योंकि उनको यह हमेशा डर बना रहता है कि मुस्लिम देशों के शासकों के नाराज़ होने से भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो सकती है। इसी जगह पर अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में काम करने वाले भारतीयों से भारत को विदेशी मुद्रा केवल कहने के लिए मिलती है यानी न के बराबर मिलती है। इन जगहों पर काम करने वाले भारतीयों द्वारा अधिकांश पैसा अपने पर ही खर्च कर दिया जाता है।

ऐसी स्थिति में मुस्लिम देशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा अपने देश को विदेशी मुद्रा भेजकर देश की आर्थिक स्थिति को मज़बूत बनाने का काम किया जाना, भारत की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने में बड़ा योगदान है। अगर मुस्लिम देशों में काम करने वाले यह भारतीय भारत को विदेशी मुद्रा न भेजें, तो भारत की अर्थव्यवस्था की गाड़ी तुरंत पटरी से उतर जाएगी और उसको फिर पटरी पर लाना बड़ा मुश्किल होगा।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम देशों के शासकों को यह समझाने का काम करने जा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी और वह खुद मुस्लिम समुदाय के लोगों के सबसे बड़े हितैषी हैं। वह इसके लिए भारतीय मुसलमानों को रिझाने के लिए और उनको भाजपा से जोड़ने के लिए एक “स्नेह यात्रा” शुरू करने जा रहे हैं। इसके लिए नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना के भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में इस “स्नेह यात्रा” की विधिवत घोषणा की।

कोई माने या न माने, लेकिन यह कड़वी सच्चाई है कि आज की तारीख में भारत की अर्थव्यवस्था को चलाने में मुस्लिम देशों में काम करने वाले भारतीयों में खासतौर से मुसलमान बड़ा योगदान दे रहे हैं। साथ मुस्लिम देशों में काम करने वाले हिंदू भी अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने में सहयोग कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सलाहकारों को यह अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि अब देश की तरक्की के लिए अपने नज़रिये और अपनी नीतियों में बदलाव लाना होगा अन्यथा मुस्लिम देशों के शासकों और वहां पर काम करने वाले कामगारों, भारतीयों ने अगर विदेशी मुद्रा भेजना बंद कर दिया, तो भारत को बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है।

यही वजह है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम दे

 

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