इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोविड-19 पीड़ितों के लिए मुआवज़े का दिया निर्देश

नई दिल्ली | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि कोविड-19 से संक्रमित किसी व्यक्ति की यदि अस्पताल में उपचार के दौरान मौत हो जाती है तो उसे ‘कोविड से मौत’ माना जाना चाहिए, भले ही तात्कालिक कारण हृदय गति रुकना या किसी अन्य अंग की शिथिलता क्यों न हो.

रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति ए आर मसूदी और न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की खंडपीठ ने कुसुम लता यादव और अन्य लोगों द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 30 दिन की अवधि के भीतर कोविड पीड़ितों के आश्रितों को अनुग्रह राशि का भुगतान जारी करें.

कोर्ट ने अपने निर्देश में यह भी कहा कि अगर एक माह में राशि का भुगतान नहीं किया गया तो नौ प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान करना होगा.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में मुआवज़े का निर्देश देते हुए कहा कि, “हम पाते हैं कि कोविड -19 के कारण अस्पतालों में होने वाली मौतें पूरी तरह से प्रमाण की कसौटी पर खरी उतरती हैं.”

कोर्ट ने कहा, “यह तर्क कि हृदय की विफलता या अन्यथा का उल्लेख करने वाली चिकित्सा रिपोर्ट को कोविड-19 के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. अदालत को इन कारणों से प्रभावित नहीं करती है कि कोविड -19 एक संक्रमण है, जिसके परिणामस्वरूप किसी भी अंग को प्रभावित करने से व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है, चाहे वह फेफड़े हों या दिल आदि.”

इस मामले में अदालत ने निर्देश दिया कि सभी याचिकाकर्ता, जिनके दावों को यहां अनुमति दी गई है, उसे 25000 रुपये का भुगतान किया जाए.

याचिकाकर्ताओं ने 1 जून, 2021 के सरकारी आदेश (शासनादेश) के खंड 12 को मुख्य रूप से इस आधार पर चुनौती दी थी कि यह अधिकतम सीमा प्रदान करता है, जो केवल 30 दिनों के भीतर मृत्यु होने पर मुआवजे के भुगतान को प्रतिबंधित करता है.

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस शासनादेश का उद्देश्य उस परिवार को मुआवजा देना है, जिसने कोविड के कारण पंचायत चुनाव के दौरान अपनी रोटी कमाने वाले को खो दिया है.

 

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