उर्स-ए-निज़ामी 25-26 नवंबर को अगया में होगा आयोजित
शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए किया सैकड़ों स्कूलों की स्थापना।
के.डी.सिद्दीकी/संत कबीर नगर: प्रख्यात सूफी बुजुर्ग एवं इस्लामिक विद्वान हजरत सूफी निजामुद्दीन मुहद्दिस बस्तवी बरकाती का 10 वां उर्स-ए पाक 25-26 नवम्बर को अगया स्थित खानकाहे निजामिया पर आयोजित होगा।आयोजन कमेटी के लोगों ने उर्स के कार्यक्रम की तैयारियां शुरु कर दिया है।देश के विभिन्न प्रांतों, पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं खाड़ी देशों में उनके अनुयाई बड़ी संख्या में मौजूद हैं। हर वर्ष उनका वार्षिक उर्स भव्य रूप में मनाया जाता है, जिसमें देश के विभिन्न प्रांतों से श्रद्धालु पहुंचते हैं।25 नवम्बर सुबह में फर्ज की नमाज के बाद सूफी साहब की मजार पर कुरान खानी के साथ ही उर्स का कार्यक्रम शुरू होगा।दोपहर बाद जुमा की नमाज के बाद मजार पर चादर पोशी और गुल पोशी का सिलसिला शुरू होगा और देर शाम तक चलेगा। रात में ईशा की नमाज के बाद निजामी कांफ्रेंस का आयोजन होगा जिसमें देश के कई बड़े इस्लामिक विद्वान प्रतिभाग करेंगे।26 नवम्बर की सुबह में मजार पर कुल शरीफ के आयोजन के बाद उर्स का कार्यक्रम समाप्त हो जाएगा।
सूफ़ी साहब का जन्म सेमरियांवा विकास खण्ड के अगया गांव में 15 जनवरी 1928 में हुआ था।इस्लामी शिक्षा जगत को हजरत सूफी साहब ने एक नया आयाम दिया।सूफी साहब ने शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सैकड़ों मदरसों का शिलान्यास किया।अमन व शांति के प्रतीक सूफी साहब की किताबों को पढ़ कर लोग अमन व शांति का संदेश दे रहे हैं।उन्होंने पूरी जिन्दगी अपने अमल व किरदार से सीधा रास्ता दिखाने का कार्य किया।
सूफी साहब के पौत्र मौलाना जियाउल मुस्तफा निजामी ने बताया कि हमारे दादा खतीबुल बराहीन अलहाज अश्शाह हजरत सूफी निजामुद्दीन मुहद्दिस बस्तवी पूरी जिन्दगी शिक्षा को बढावा देने के लिए सैकड़ों मदरसे की स्थापना किया।अपनी कलम व जुबान से समाज को एक अच्छा रास्ता दिखाते रहे।उन्होंने बताया कि हमारे दादा खतीबुल बराहीन हजरत सूफी निजामुद्दीन मुहद्दिस बस्तवी का जन्म सेमरियावाँ के अगया में 15 जनवरी 1928 को हुआ था।घर पर प्रारम्भिक शिक्षा लेने के बाद 1947 में आगे की शिक्षा बसडीला में लिया।उच्च शिक्षा के लिए 1948 में अल्जामीयतुल अशरफिया मुबारकपुर से लिया।मुबारकपुर में शिक्षा लेने के बाद 1952 में हजरत की दस्तार बंदी हुई। जन्म से ही सीधे व सरल स्वभाव के होने के कारण इनका नाम सूफी पड़ गया।हजरत सूफी निजामुद्दीन शिक्षा को बढ़ावा देते हुए 14 मार्च 2013 को पैत्रिक गांव अगया में मृत्यू हुई थी।
सूफ़ी साहब के अंतिम संस्कार में देश-विदेश से लाखों की संख्या में पहुंचे थे उनके चाहने वाले
सूफी साहब का सालाना उर्स अरबी महीने की एक जुमादल अव्वल को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।यहां हर साल देश-विदेश से लाखों की संख्या में अकीदत मंद पहुंचकर खराजे अकीदत पेश करते हैं।सूफी साहब ने अपने हयाते जिन्दगी में शिक्षा की खिदमत को अंजाम देते हुए समाज को सीघा रास्ता दिखाने के लिए एक दर्जन से अधिक किताबेंं लिखी।इनमें प्रमुख रुप से बरकाते रोजा, हुक़ूके वालिदैन, फजाइले मदीना, फलसफए कुर्बानी, बरकाते मिस्वाक, दाढ़ी की अहमियत, फजाइले तिलावते कुरान मजीद, इख्तियारते इमामुन नबियीन, खाने पीने का इस्लामी तरीका जो काबिले जिक्र है।
सूफी साहब की ज़िंदगी पर कई लेखकों ने किताबें लिखी हैं जो आज भी लोगों को उनके बाताए संदेशों पर चलने की सीख देती है।इनके जिन्दगी की प्रमुख किताबों में दो अजीम शख्सियत,खतीबुलबराहीन एक मुनफरद मिसाल शख्सियत, आईने मोहद्दिस बस्तवी,खतीबुल बराहीन अपने खुतबात के आईने में, खतीबुल बराहीन आईने अशआर में, मोहद्दिस बस्तवी सुन्नते रसूल के आईने में,तोहफ-ए-निजामी आदि प्रमुख हैं।
सूफी साहब ने चार मदरसों में शिक्षण कार्य किया।सबसे पहले दारुल उलूम फैजुल इस्लाम मेंहदावल,दारुल उलूम शाह आलम अहमदाबाद गुजरात,दारुल उलूम फजले रहमानिया पचपेड़वा में शिक्षण कार्य किया।आख़ीर में दारुल उलूम तनवीरुल इस्लाम अमरडोभा में शैखुल हदीस के पद पर रहे।उन्होंने 20 वर्ष तक बिना वेतन के ही शिक्षण कार्य किया।

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