यूपी की राजनीति असमंजस का शिकार ; किस के सर बंधेगा ताज ?
माजिद अली खां
जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे ही राजनीतिक सरगर्मियां बढ़नी शुरू हो गई हैं. देश में राजनीतिक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में बढ़ता सियासी पारा सभी राजनीतिक दलों को बेचैन कर रहा है. ये बेचैनी राजनीतिक रूप से पैदा हो रहे असमंजस को लेकर है कि जनता के मूड का अनुमान लगाना इस चुनाव में बहुत मुश्किल हो रहा है. फिलहाल तो सत्तारूढ़ भाजपा और समाजवादी पार्टी में मुख्य मुकाबला नज़र आ रहा है लेकिन कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी की बढ़ती सक्रियता और उनकी रैलियों में भीड़ सभी दलों खासतौर से भाजपा को बेचैन कर रही है तो दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी के यूपी के दौरे समाजवादी पार्टी की नींद उड़ा रहे हैं. इस चुनाव में सभी दलों के लिए एक परेशानी का सबब बसपा की उदासीनता भी है क्योंकि लंबे समय से दलित वोटों पर एकाधिकार रखने वाली बसपा का मुख्य मुकाबले से बाहर होना इसलिए अन्य दलों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है कि आखिर दलित वोट किसका रुख करेगा और दलितों के वोटों से राजनीतिक उठा-पटक ज्यादा हो सकती है.

यदि सत्तारूढ़ भाजपा की बात की जाए तो भाजपा भी चुनाव में जीत को लेकर बहुत आश्वस्त नजर नहीं आ रही लेकिन अपने परंपरागत धार्मिक मुद्दों को हवा देकर माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, सबसे बड़ा सवाल उसके लिए और सबके लिए है कि क्या सिर्फ धार्मिक भावनाओं के आधार पर भाजपा दोबारा सत्ता पर काबिज हो सकती है, यदि भाजपा के पास विकास आधारित उपलब्धियां हैं तो फिर धार्मिक एजेंडा चलाने की जरूरत क्यों पड़ रही है. भाजपा को खुद भी खूब अंदाजा है कि जनता के बीच उसके पास बताने के लिए कुछ खास नहीं है इसलिए हिन्दू ध्रुवीकरण ही एक सहारा है. अब ध्रुवीकरण की बात करें तो किसान आंदोलन के जरिए बनी परिस्थितियों में हिंदू समाज भाजपा के पक्ष में लामबंद होता नजर नहीं आ रहा है और ना उसकी उम्मीद की जा सकती है. भाजपा की योगी सरकार पर दबे शब्दों में ही सही ठाकुरवाद को बढ़ावा देने के आरोप लग रहे हैं जो उसे राज्य के पूर्वी क्षेत्र में काफी नुक़सान पहुंचा सकते हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो पहले ही जाटों द्वारा किया जा रहा विरोध भाजपा के ऊपर भारी पड़ रहा है. कुल मिलाकर कहा जाए तो भाजपा भी बहुत निश्चितता की स्थिति में दिखाई नहीं दे रही है.अब मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी की चर्चा करते हैं. समाजवादी पार्टी लगातार राज्य के छोटे-छोटे दलों से गठबंधन कर रही है.
ये नीति समाजवादी पार्टी को काफी फायदा पहुंचा सकती है. पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव समाज पार्टी साथ गठबंधन कर यह बात सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि उसके साथ हिंदू समाज की बड़ी पिछड़ी जातियों का समर्थन इकट्ठा हो जाए. इसके साथ ही वह दलितों के बीच अपनी गहरी पैठ बना चुके चंद्रशेखर उर्फ रावण की पार्टी आजाद समाज पार्टी के साथ भी गठबंधन करने की कोशिश कर रहे हैं जिसके जरिए वह दलितों का समर्थन पाने की भी कोशिश कर रहे हैं. बहुत दिनों से यादव परिवार में चल रहे अखिलेश और शिवपाल के बीच विवाद भी खत्म होता दिख रहा है. अखिलेश अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के साथ लंबी मीटिंग कर चुके हैं जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि शिवपाल भतीजे को मदद अवश्य पहुंचाएंगे. समाजवादी पार्टी वैसे तो बहुत निश्चितता के साथ काम रही है लेकिन असदुद्दीन ओवैसी के यूपी में किए जा रहे ताबड़तोड़ दौरे अखिलेश यादव की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं. इसका कारण भी यह है कि मुसलमानों को समाजवादी पार्टी का बेस वोट समझा जाता है. मुस्लिम नौजवान बड़ी संख्या में ओवैसी की रैलियों में शामिल हो रहे हैं जिससे यह आशंका पैदा हो गई है कहीं मुस्लिम समाज के वोटों का बंटवारा समाजवादी पार्टी के विजय रथ को रास्ते में ही ना रोक दे.
इसके अलावा प्रियंका गांधी की रैलियों में हो रही भीड़ सभी दलों की नींदे उड़ा रही है. किसी भी राजनीतिक दल को यह अंदाजा नहीं हो रहा है की कांग्रेस की रैलियों में शामिल होने वाले लोग किस दल के समर्थक रहे हैं और आने वाले समय में यह भीड़ किसके लिए नुकसान दे साबित होगी. कांग्रेस के पास खोने के लिए तो कुछ भी नहीं है, अब तो जो कुछ भी मिलेगा उसे फायदा ही पहुंचाएगा, यही सोचकर प्रियंका गांधी जीतोड़ मेहनत यूपी में कर रही हैैं. प्रियंका गांधी के यूपी में आने से राज्य का कांग्रेस नेतृत्व सक्रिय हुआ है और लोगों की जुबान पर भी कांग्रेस का नाम आने लगा है, हो सकता है कि इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कुछ खास न कर पाए लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी समर्थन इस मेहनत की बदौलत मिल सकता है.
इस विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा आश्चर्य बसपा को लेकर है जो प्रदेश में चार बार सरकार बनाने में कामयाब रही है. राजनीतिक विश्लेषकों को यह बात खल रही है कि आखिर बसपा जैसी मजबूत पार्टी इस चुनाव में कुछ जिलों को छोड़कर वोट कटवा की स्थिति में क्यों आ गई. और अगर बसपा ने बहुत दमखम से चुनाव नहीं लड़ा तो उसके परंपरागत दलित वोटों का क्या होगा. हालांकि बसपा के नेता आज भी बसपा के बहुत मजबूत होने का दावा करते हैं लेकिन पार्टी की चुनाव की तैयारियां इन दावों का समर्थन नहीं कर रही हैं. आने वाले कुछ दिनों में ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी कि बसपा कैसा चुनाव लड़ती है. विधानसभा चुनाव में राजनीतिक असमंजस ने सभी दलों की नींद उड़ा रखी है, अब तो समय के गर्भ में छिपा है किसी को क्या मिलेगा और जनता किस पर भरोसा जताती है.

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