अमुबा दिल्ली एनसीआर: आसमान से गिरे खजूर में अटके

क़मर क्रांति

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ओल्ड बॉयज असोसिएशन (अमुबा) दिल्ली जो अब अमुबा दिल्ली एनसीआर है, एक बार फिर चर्चे में है। वजह वही घिसा पिटा व पूराना मसलन इलेक्शन, मेंबरशिप, डायरेक्टरी, सब्सक्रिप्शन फी, आर ओ की बहाली बगैरह बगैरह ।


ग़ौरतलब है कि अमुबा दिल्ली की रिवायत रही है कि चुनकर आई एक्जीक्यूटिव कमेटी न तो समय पर चुनाव कराती है और न‌ ही आसानी से। अलबत्ता जिनको चुनाव लड़ना होता है या युं कह लीजिए कि जिनको एक्जीक्यूटिव कमेटी में शामिल होना होता है वह चुनाव की देरी को देखते हुए पहले तो ज़ुबानी जंग शुरू करते हैं। फिर व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अपना विरोध दर्ज कराते हैं और धीरे धीरे यह सब एक ज़बरदस्त नूराकुश्ती में तब्दील हो जाता है । तब जाकर कहीं चुनाव होता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि चुनाव ख़त्म होते ही सारे विवाद ख़त्म हो जाते हैं, सारे गिले शिकवे मिट जाते हैं।


मगर इस बार एक ऐसा नया मामला सामने आया है जिसे पढ़ने और सुनने के बाद एक ही कहावत चरितार्थ होगा कि अमुबा दिल्ली एनसीआर आसमान से गिरकर खजूर में अटक गया है। आइये विस्तार से आसमान और खजूर वाली बात समझते हैं।
सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के मुताबिक़ रजिस्टर्ड सोसायटी पांच साल के लिए ही वैध होता है । और उसकी वैधता बाक़ी रहे इसके लिए उसे हर पांच साल पर रिनिवल कराना अनिवार्य होता है। यानी यदि सोसायटी ने रिनिवल नहीं कराया तो उसका रजिस्ट्रेशन सरकार सीज कर लेती है और फिर उसकी संवैधानिक मान्यता ख़त्म हो जाती है। अमुबा दिल्ली जो 27 नवंबर 1973 में बना था उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 


जिस AMUOBA ASSOCIAION DELHI को मरहूम मोईनुल हक़ चौधरी ( भूतपूर्व मंत्री , भारत सरकार), मरहूम चौधरी तैय्यब हुसैन ( भूतपूर्व सांसद ) , मरहूम चौधरी मुहम्मद आरिफ  ( भूतपूर्व वैज्ञानिक,कॄषि मंत्रालय, भारत सरकार), सैय्यद हामिद ( भूतपूर्व उप-राष्ट्रपति) जैसे कद्दावर शख्सियतों ने एक नेक उम्मीद के साथ आज से लगभग 50 साल पहले 1973 में दिल्ली में रजिस्टर्ड कराया था उसका रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट तक अलीग बिरादरी संभाल कर नहीं रख पाए और न ही उससे जुड़े हुए दस्तावेज। नतीजतन आगे चलकर असोसिएशन रिनिवल के लाइक ही नहीं बचा और न ही विधिवत विघटन यानी डिजौल्व हो सका। कुल मिलाकर समझने वाली बात यह है कि अमुबा दिल्ली ( 1973 वाली असोसिएशन ) का विधिवत रिनिवल नहीं होने की वजह से रजिस्ट्रेशन सीज हो गया । 


चंद सालों पहले 2017 में भी असोसिएशन के चुनाव को लेकर काफी बवाल मचा था और उसी दौरान इस मुद्दे को भी जोर शोर से उठाया गया था। लेकिन हमेशा की तरह अलीग बिरादरी ने चुनाव कराना ज़रूरी समझा । लेकिन चुनाव के बाद भी असोसिएशन के रिनीवल और लीगल इन्टीटी को लेकर तनाव बरक़रार था। बहरहाल नई एक्जीक्यूटिव कमेटी ने रिनीवल के लिए पूरी कोशिश की लेकिन पचास साल पूरानी असोसिएशन जिसका एक बार भी रिनीवल नहीं हुआ हो , भला उसका रजिस्ट्रेशन कैसे बाक़ी रह सकता था और कैसे रिनीवल संभल था । अंतोगत्वा नए एक्जीक्यूटिव बॉडी ने कानूनी अड़चनों के सामने हार मानते हुए नया रजिस्ट्रेशन कराना उचित समझा । जबकि काफी अरसे से कई सारे उलुमनाई यही समझा जा रहे थे कि एक नया असोसिएशन बनाना ही एकमात्र उपाय है। ख़ैर आनन फानन में एजीएम बुलाकर नए रजिस्ट्रेशन का एजेंडा पास किया गया।


लेकिन जब बायलॉज सामने आया है तो जानकारों के मुताबिक इस नए असोसिएशन जिसका नाम अब अमुबा दिल्ली एनसीआर है के बायलाज में ढेरों गलतियां हैं। नए असोसिएशन के बायलॉज के मुताबिक जो सदस्य पिछले दस सालों से असोसिएशन के मेंबर हैं वही अध्यक्ष का चुनाव लड़ सकते हैं और इसी तरह उपाध्यक्ष सचिव सह सचिव कोषाध्यक्ष बगैरह के लिए सभी पदों के लिए न्यूनतम सदस्यता अवधि क्रमशः सात साल, पांच साल, तीन साल, दो साल तय कर दिया गया है। अब कानून के जानकारों का कहना है कि जो असोसिएशन बना ही 2019 में है उसके चुनाव के लिए दस साल सात साल पांच साल पूराना सदस्य कहां से लाएंगे और कैसे फिर नियमानुसार एक्जीक्यूटिव बॉडी का हर दो साल बाद चुनाव होगा।


सरकारी दस्तावेज के अनुसार असोसिएशन को बने अभी मात्र तीन साल हुए हैं फिर यह कैसे संभव है कि दस साल पुराना मेंबर अध्यक्ष का सात साल पुराना मेंबर उपाध्यक्ष का और पांच साल पुराना मेंबर सचिव का चुनाव लड़ेगा। यानी जो बच्चा पैदा ही 2019 में हुआ है उसकी उम्र कैसे बढ़ाया जा सकता है।
हैरानी की बात यह है कि मौजूदा एक्जीक्यूटिव बॉडी ने आर ओ यानी चुनाव के लिए रिटर्निंग ऑफिसर जाने माने वकील और सिनीयर अलीग एडवोकेट नौशाद साहब को नियुक्त भी कर दिया है। इस मामले को लेकर चौतरफा हमला भी हो रहा है। अलीग बिरादरी तरह तरह के सवाल खड़ा कर रही है। अपनी सफाई में एक्जीक्यूटिव बोर्ड का कहना है कि एजीएम करके हमने पुराने वाले असोसिएशन के मेंबर को नए वाले में मर्ज कर दिया है यानी ट्रांसफर कर दिया है।

जबकि जानकारों का कहना है कि कानूनी मामलों में आप ज़ुबानी बातें नहीं कर सकते। यानी आप ज़ुबानी कोई भी कदम नहीं उठा सकते। मिसाल के तौर पर अगर असोसिएशन में बायलॉज या नियम कानून में कोई बदलाव करना होगा तो वह विधिवत यानी कानून के मुताबिक़ होगा न कि ज़ुबानी । एक असोसिएशन जिसकी संवैधानिक वैधता ही नहीं बची थी उसके सदस्य की सदस्यता अवधि को कैसे एक नए असोसिएशन के नए सदस्यों के साथ एडजस्ट कर देंगे या जोड़ देंगे या कैरी फॉरवर्ड कर देंगे और फिर यह कैसे मान्य हो जाएगा ? अब सवाल यह उठता है कि जब ऐसा करना विधिवत संभव ही नहीं है तो फिर कैसे नए असोसिएशन का चुनाव होगा ? 
सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 की बात करें तो असोसिएशन के किसी भी कानून या नियम में बदलाव सेक्शन 12 और 12 ए के तहत ही हो सकता है। यानी अमुबा दिल्ली एनसीआर के बायलॉज के नियम 14 में बदलाव के लिए असोसिएशन को पहले सेक्शन 12 और 12 ए में निहित प्रक्रिया का पालन करना होगा तब कहीं जाकर सदस्यता अवधि वाला नियम बदलेगा और तब कहीं जाकर चुनाव कराया जा सकता है क्योंकि अमुबा दिल्ली एनसीआर के नियमावली क्रमांक 14 में संशोधन किए बगैर असोसिएशन का चुनाव वैध नहीं हो सकता क्योंकि आज की तारीख में कोई भी सदस्य तीन साल से अधिक समय से सदस्य नहीं हैं। इसलिए जानकारों का साफ कहना है कि पूराने असोसिएशन के सदस्यों की सदस्यता अवधि को ज़ुबानी तौर पर जोड़ना या उसकी सदस्यता अवधि को मानते हुए चुनाव कराना एक नए रजिस्टर्ड असोसिएशन को कानूनी पचड़े में डालना होगा। बेहतर यही होगा कि सेक्शन 12 और 12 ए के तहत नियमों का संशोधन कराया जाए भले ही इसमें थोड़ा वक्त लगे। ताकि असोसिएशन सुचारू रूप से संचालित होता रहे और भविष्य के तमाम विवादों और कानूनी पचड़ों से भी बचा रहे।


अब देखने वाली बात यह होगी कि हमेशा कि तरह अलीग बिरादरी चुनाव कराकर सो जाती है या इसको दुरूस्त करके एक नया मिसाल कायम करती है। फिल्हाल जो नूराकुश्ती अमुबा दिल्ली एनसीआर में इस बायलॉज को लेकर चल रहा है उससे यही लगता है कि पूराने वाले असंवैधानिक  असोसिएशन को नए नाम से रजिस्टर्ड कराकर लीगल इन्टीटी बनाने की कोशिश तो गई लेकिन विवादित नियमों के कारण आसमान से गिरकर खजूर में अटक गया है।

1 comments

  • Mohammed Khalid Rasheed

    मुहावरत्न आपकी बात ठीक हो सकती है लेकिन वास्तविकता ये है के खजूर की ऊंचाई भी मौजूदा AMUOBA के कद से बहुत ज्यादा है दूसरी बात ये है के अमुबा दिल्ली कभी आसमान पे थी ही नहीं इसलिए आसमान से गिरने का सवाल ही खान है ये कुछ लोगों ने टाइम पास का एक प्लेटफार्म बना रखा है जहां न कोई rule है ना रेगुलेशन
    बस अलीगढ़ के नाम पे लोगों को बुला लेते है और मछली बाजार की तरह लड़ झगड़ कर अपने अपने घर चले जाते है आपका पता नहीं लेकिन मे भी उन्हीं में से एक हूं .

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